भारत में MSME फाइनेंसिंग की चुनौती अब केवल क्रेडिट की उपलब्धता का सवाल नहीं रह गई है, बल्कि यह सही समय पर फंड मिलने से भी जुड़ गई है।
किसी बिजनेस ने अपना ऑर्डर पूरा कर इनवॉइस जारी कर दिया हो, तो लेनदेन भले ही पूरा हो गया हो, लेकिन उसका कैश कई हफ्तों या महीनों बाद मिल सकता है। इस बीच कर्मचारियों की सैलरी, सप्लायर पेमेंट, इन्वेंट्री खरीद और अगले ऑर्डर का साइकिल चलता रहता है। इसलिए रेवेन्यू कमाने और कैश मिलने के बीच का यह अंतर MSMEs के वर्किंग कैपिटल मैनेजमेंट में लगातार महत्वपूर्ण होता जा रहा है।
जब रेवेन्यू का मतलब उपलब्ध कैश नहीं होता
किसी MSME के लिए अनपेड इनवॉइस ऐसी कमाई को दर्शाता है, जो हासिल तो हो चुकी है, लेकिन अभी इस्तेमाल के लिए उपलब्ध नहीं है। जब रिसीवेबल्स लंबे समय तक बकाया रहते हैं, तो बिजनेस को खरीदारी टालनी पड़ सकती है, सप्लायर्स के साथ लंबी पेमेंट टर्म्स पर बातचीत करनी पड़ सकती है या रोजमर्रा का संचालन जारी रखने के लिए अतिरिक्त उधार लेना पड़ सकता है।
सीमित वर्किंग कैपिटल बफर वाले बिजनेस के लिए इसका असर और ज्यादा हो सकता है। किसी एक ग्राहक की देरी से हुई पेमेंट कंपनी की सप्लायर को भुगतान करने की क्षमता को प्रभावित कर सकती है और इसका असर आगे अगले ऑर्डर को पूरा करने की क्षमता पर पड़ सकता है। इस तरह एक पेमेंट डिले आगे चलकर बड़ी फाइनेंसिंग जरूरत में बदल सकता है।
कई MSMEs के लिए चुनौती बिजनेस की कमी नहीं, बल्कि ऑर्डर पूरा होने और उस ट्रांजैक्शन का कैश बिजनेस तक पहुंचने के बीच का अंतर है।
ट्रेडिशनल क्रेडिट और तत्काल जरूरतों के बीच गैप
ट्रेडिशनल वर्किंग कैपिटल प्रोडक्ट्स MSMEs के लिए अभी भी महत्वपूर्ण हैं, लेकिन हर लिक्विडिटी जरूरत एक जैसी नहीं होती।
किसी बिजनेस ने किसी स्थापित एंटरप्राइज को सामान या सर्विस दे दी है, तो जरूरी नहीं कि उसे बड़ा और लंबे समय का लोन ही चाहिए। उसे केवल किसी खास रिसीवेबल के आधार पर तब तक लिक्विडिटी की जरूरत हो सकती है, जब तक पेमेंट साइकिल पूरा न हो जाए। इससे ऐसी फाइनेंसिंग मॉडल्स की उपयोगिता बढ़ रही है, जो संबंधित ट्रांजैक्शन और उससे मिलने वाले संभावित कैश फ्लो से ज्यादा करीब से जुड़ी हों।
इनवॉइस क्यों बन रहे हैं अधिक महत्वपूर्ण
यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे चर्चा केवल इस सवाल तक सीमित नहीं रहती कि कोई MSME क्रेडिट हासिल कर सकता है या नहीं। अब यह सवाल भी महत्वपूर्ण हो गया है कि क्या उसे अपने कैश साइकिल के सही समय पर सही तरह का क्रेडिट मिल सकता है। इनवॉइस-लिंक्ड फाइनेंसिंग इस गैप को दूर करने का एक तरीका है। इसके जरिए योग्य बिजनेस पूरे रिसीवेबल साइकिल के खत्म होने का इंतजार किए बिना बकाया इनवॉइस के आधार पर लिक्विडिटी हासिल कर सकते हैं।
इस तरीके की उपयोगिता केवल फाइनेंसिंग मैकेनिज्म तक सीमित नहीं है। जैसे-जैसे डिजिटल रिकॉर्ड्स, ट्रांजैक्शन हिस्ट्री और बिजनेस कैश फ्लो का आकलन आसान हो रहा है, वैसे-वैसे लेंडर्स और फिनटेक प्लेटफॉर्म्स बिजनेस की वास्तविक गतिविधियों से जुड़ी ज्यादा जानकारी के आधार पर उसका मूल्यांकन कर सकते हैं।
क्रेडिट की पहुंच से सही समय पर क्रेडिट तक
छोटे बिजनेस के लिए यह खास तौर पर महत्वपूर्ण हो सकता है, क्योंकि उनकी ग्रोथ की क्षमता केवल नए ऑर्डर हासिल करने पर नहीं, बल्कि उन ऑर्डर्स को पूरा करने और पेमेंट मिलने के बीच की अवधि को मैनेज करने पर भी निर्भर कर सकती है। इससे लेंडर्स के लिए भी एक अवसर बनता है कि वे क्रेडिट जरूरतों का आकलन संबंधित बिजनेस ट्रांजैक्शन के करीब जाकर करें, बजाय इसके कि हर वर्किंग कैपिटल जरूरत को एक सामान्य उधारी की जरूरत माना जाए।
इसलिए MSME फाइनेंस में व्यापक बदलाव का मतलब जरूरी नहीं कि ट्रेडिशनल लेंडर्स की जगह नए सिस्टम ले लें। इसके बजाय, बिजनेस के कैश साइकिल के अलग-अलग चरणों के लिए अलग फाइनेंसिंग विकल्प तैयार करना इसका बड़ा हिस्सा हो सकता है।
MSMEs के लिए समय पर लिक्विडिटी क्यों जरूरी है
किसी MSME के लिए समय पर मिलने वाली लिक्विडिटी यह तय कर सकती है कि वह नया ऑर्डर स्वीकार कर पाएगा या नहीं, इन्वेंट्री खरीद पाएगा या नहीं, सप्लायर्स को भुगतान कर पाएगा या फिर असमान कलेक्शन के दौर में अपना संचालन जारी रख पाएगा। ऐसे मामलों में क्रेडिट की वैल्यू इस बात से भी जुड़ी होती है कि वह कब उपलब्ध होता है।
साथ ही, अल्टरनेटिव क्रेडिट के बढ़ने से रिस्पॉन्सिबल लेंडिंग की अहमियत भी बढ़ जाती है। MSMEs के लिए फाइनेंसिंग की कुल लागत, रिपेमेंट स्ट्रक्चर और एलिजिबिलिटी को लेकर स्पष्टता जरूरी है। वहीं, लेंडर्स और फिनटेक प्लेटफॉर्म्स को क्रेडिट की पहुंच बढ़ाते समय अनुशासित अंडरराइटिंग बनाए रखने की जरूरत है।
जब MSME के कैश फ्लो अधिक दिखाई देने लगें
भारत का बढ़ता डिजिटल लेंडिंग इकोसिस्टम अब ट्रांजैक्शन और कैश फ्लो से जुड़ी ज्यादा जानकारी के आधार पर बिजनेस का आकलन करना संभव बना रहा है। इसके साथ फाइनेंसिंग के योग्य एसेट की परिभाषा भी धीरे-धीरे पारंपरिक कोलेटरल से आगे बढ़कर पहचाने जा सकने वाले रिसीवेबल्स और बिजनेस कैश फ्लो तक पहुंच सकती है। इसका मतलब यह नहीं है कि देरी से होने वाली पेमेंट खत्म हो जाएंगी। हालांकि, किसी प्रोडक्ट या सर्विस की डिलीवरी और पेमेंट मिलने के बीच की अवधि को MSMEs जिस तरह मैनेज करते हैं, उसमें बदलाव जरूर आ रहा है।
फाइनेंशियल इकोसिस्टम के लिए बड़ा अवसर यह है कि इस गैप को अधिक सटीक तरीके से पहचाना जाए और बिजनेस की वास्तविक कैश फ्लो जरूरतों के आधार पर फाइनेंसिंग सॉल्यूशंस तैयार किए जाएं। वहीं MSMEs के लिए इसका मतलब यह हो सकता है कि धीरे-धीरे सवाल केवल “क्या मुझे क्रेडिट मिल सकता है?” तक सीमित न रहकर ज्यादा व्यावहारिक सवाल “क्या मुझे जरूरत के समय जरूरी लिक्विडिटी मिल सकती है?” बन जाए।
(लेखक: विनोद वर्मा, को-फाउंडर और सीईओ, UpTik | विचार व्यक्तिगत हैं)