अगर किसी भारतीय टू-व्हीलर मालिक से पूछा जाए कि उसने किसी खास ब्रांड को क्यों चुना, तो जवाब सिर्फ माइलेज, डिजाइन या कीमत तक सीमित नहीं होता। भरोसेमंद नजदीकी सर्विस सेंटर, वाहन को समझने वाला मैकेनिक, स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता और जरूरत पड़ने पर तुरंत मदद मिलने जैसी बातें भी इसमें शामिल होती हैं। भारत में मोबिलिटी से जुड़े फैसले लंबे समय से भरोसे पर आधारित रहे हैं। टू-व्हीलर सेगमेंट देश के कुल ऑन-रोड वाहनों में 70% से अधिक हिस्सेदारी रखता है। ऐसे में इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर्स के शुरुआती ग्राहकों से आगे बढ़कर आम परिवारों तक पहुंचने के साथ, यही भरोसा ईवी ब्रांड्स की लंबी अवधि की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
भारत का ईवी बाजार तेजी से विस्तार कर रहा है। FY2025-26 में देश में कुल ईवी रजिस्ट्रेशन 25 लाख यूनिट को पार कर गए, जबकि कुल वाहन रजिस्ट्रेशन में ईवी की हिस्सेदारी करीब 8.5% रही। इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर्स कुल ईवी बिक्री में करीब 58% हिस्सेदारी के साथ सबसे बड़ा योगदान देने वाला सेगमेंट रहे। यह संकेत देता है कि इलेक्ट्रिक स्कूटर और मोटरसाइकिल अब सिर्फ शुरुआती खरीदारों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि रोजाना आने-जाने, पारिवारिक जरूरतों, लास्ट-माइल मोबिलिटी और छोटे कारोबार से जुड़े कामों में भी इस्तेमाल किए जा रहे हैं।
हालांकि, ईवी की सफलता को केवल बिक्री के आंकड़ों से नहीं मापा जा सकता। वाहन शोरूम से निकलने के बाद ग्राहक को मिलने वाला अनुभव भी उतना ही महत्वपूर्ण है। बैटरी, चार्जिंग और डायग्नोस्टिक्स जैसी नई तकनीकों को लेकर ग्राहकों की समझ अभी विकसित हो रही है। ऐसे में कमजोर सर्विस नेटवर्क एक छोटी तकनीकी समस्या को भी बड़ी परेशानी में बदल सकता है। ईवी ओनरशिप को बेहतर बनाने के लिए हाई-वोल्टेज सिस्टम, बैटरी और कंट्रोल यूनिट्स की जानकारी रखने वाले प्रशिक्षित तकनीशियनों के साथ पर्याप्त स्पेयर पार्ट्स और तेज सर्विस की जरूरत होगी। सर्विस के दौरान किए गए काम और लिए गए शुल्क की स्पष्ट जानकारी देना भी ग्राहक के भरोसे के लिए महत्वपूर्ण है।
ईवी बाजार में ब्रांड लॉयल्टी भी एक महत्वपूर्ण चुनौती बन रही है। Deloitte के 2025 Global Automotive Consumer Study के अनुसार, भारत में 72% उपभोक्ता वाहन ब्रांड बदलने के लिए तैयार हैं और टेक्नोलॉजी व फीचर्स इसके प्रमुख कारणों में शामिल हैं। ऐसे में ईवी में टेक्नोलॉजी का मतलब केवल डैशबोर्ड या वाहन के फीचर्स तक सीमित नहीं होना चाहिए। डायग्नोस्टिक्स, सर्विस रिमाइंडर, बैटरी हेल्थ मॉनिटरिंग और कस्टमर सपोर्ट जैसे फीचर्स भी पूरी ओनरशिप जर्नी का हिस्सा हैं। बेहतर डिजिटल और सर्विस अनुभव ग्राहकों को वाहन के रखरखाव और बैटरी से जुड़ी जानकारी समझने में मदद कर सकता है।
ईवी सर्विसिंग के लिए पारंपरिक ICE वाहनों की तुलना में अलग तरह की विशेषज्ञता की जरूरत होती है। इसमें इलेक्ट्रॉनिक्स, बैटरी सिस्टम, डायग्नोस्टिक्स और चार्जिंग से जुड़े सिस्टम की समझ आवश्यक है। हैंड्स-ऑन ट्रेनिंग, स्टैंडर्डाइज्ड ट्रेनिंग मॉड्यूल और योग्य ट्रेनर्स की कमी इस क्षेत्र के सामने चुनौती है। इसलिए EV कंपनियों को प्रशिक्षित सर्विस वर्कफोर्स तैयार करने के साथ-साथ सर्विस नेटवर्क को बड़े शहरों से बाहर तक विस्तार देना होगा। पर्याप्त स्पेयर पार्ट्स, तेज टर्नअराउंड और बेहतर डायग्नोस्टिक्स में निवेश से ग्राहक के लिए ओनरशिप अनुभव अधिक भरोसेमंद बनाया जा सकता है।
भारत के इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर बाजार का भविष्य सिर्फ नए मॉडल, बेहतर रेंज या आकर्षक फीचर्स से तय नहीं होगा। ग्राहकों के लिए यह भी महत्वपूर्ण होगा कि वाहन खरीदने के बाद उन्हें कितनी आसानी से सर्विस और सपोर्ट मिलता है। उन्हें भरोसा होना चाहिए कि जरूरत पड़ने पर मदद उपलब्ध होगी, रिपेयर का समय अनुमानित होगा और सर्विस सपोर्ट बड़े शहरों के बाहर भी मिलेगा। भारत का ईवी ट्रांजिशन केवल पेट्रोल से बिजली की ओर बढ़ने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि अनिश्चितता से भरोसे की ओर बढ़ने की प्रक्रिया भी है। इसलिए ईवी कंपनियों को केवल शोरूम में मौजूद प्रोडक्ट पर नहीं, बल्कि वाहन की पूरी लाइफ-साइकिल और भारतीय सड़कों पर उसके ओनरशिप अनुभव पर ध्यान देना होगा।
(अंकित गग्गर, को-फाउंडर, BGauss | विचार व्यक्तिगत हैं।)