भारत की डीप-टेक एनर्जी स्टोरेज कंपनी Offgrid Energy Labs ने ब्रिटेन की Keele University के साथ एक मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं। इस साझेदारी के तहत कंपनी अपनी पेटेंटेड ZincGel® लॉन्ग-ड्यूरेशन एनर्जी स्टोरेज (LDES) तकनीक को यूनिवर्सिटी के कैंपस में तैनात करेगी।
इस प्रोजेक्ट के तहत ऑफग्रिड एनर्जी लैब्स की हाल ही में Hook, Hampshire में स्थापित मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी में बनी ZincGel® बैटरियों को Keele University के Low Carbon Energy Generation Park में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर लगाया जाएगा। कंपनी के अनुसार, यह UK में पूरी तरह UK में निर्मित बैटरी का इस्तेमाल करने वाला पहला जिंक-LDES प्रोजेक्ट होगा।
एमओयू (MoU) के तहत कीले यूनिवर्सिटी (Keele University) के कैंपस में ZincGel® बैटरी सिस्टम को पूरी तरह islanded configuration में तैनात करने की योजना है। पायलट प्रोजेक्ट में यह आकलन किया जाएगा कि तकनीक हर महीने करीब 1 MWh अतिरिक्त रिन्यूएबल एनर्जी को कैप्चर और स्टोर करने में किस तरह मदद कर सकती है।
इसके साथ बैटरी की सुरक्षा, डीप डिस्चार्ज क्षमता और round-trip performance का वास्तविक परिस्थितियों में परीक्षण किया जाएगा। प्रोजेक्ट के दौरान Keele में रिन्यूएबल एनर्जी उत्पादन में होने वाले मौसमी बदलावों के आधार पर भी तकनीक के प्रदर्शन का मूल्यांकन किया जाएगा।
पायलट प्रोजेक्ट से मिलने वाले परिणामों के आधार पर कीले यूनिवर्सिटी (Keele University) में बड़े multi-MWh ZincGel® deployment के लिए प्रस्ताव तैयार किया जाएगा। इसका उद्देश्य कैंपस में अतिरिक्त और अन्यथा curtailed होने वाली रिन्यूएबल बिजली को स्टोर करना होगा।
कीले यूनिवर्सिटी (Keele University) का लो कार्बन एनर्जी जेनरेशन पार्क (Low Carbon Energy Generation Park) दो विंड टर्बाइनों से लैस है और कैंपस की 50% तक बिजली की जरूरत पूरी करता है। ऐसे में लॉन्ग-ड्यूरेशन एनर्जी स्टोरेज तकनीक अतिरिक्त रिन्यूएबल बिजली को स्टोर करने में मदद कर सकती है।
ऑफग्रिड एनर्जी लैब्स (Offgrid Energy Labs) की ZincGel® तकनीक भारत में विकसित की गई है और यह जिंक-ब्रोमीन केमिस्ट्री पर आधारित है। कंपनी के अनुसार, इसे 6 से 16 घंटे की डिस्चार्ज अवधि के लिए डिजाइन किया गया है, जिससे अतिरिक्त रिन्यूएबल ऊर्जा को स्टोर कर बाद में अधिक मांग के समय इस्तेमाल किया जा सकता है।
इस तकनीक में लिथियम, कोबाल्ट, निकेल या रेयर-अर्थ मटेरियल की जगह जिंक और ब्रोमीन का इस्तेमाल किया जाता है। कंपनी इसे गैर-ज्वलनशील डिजाइन के साथ विकसित कर रही है और इसका इस्तेमाल रिन्यूएबल एनर्जी इंटीग्रेशन, इंडस्ट्रियल एनर्जी रेजिलिएंस, माइक्रोग्रिड और ग्रिड-स्केल स्टोरेज जैसे क्षेत्रों में करने की योजना है।
ऑफग्रिड एनर्जी लैब्स के को-फाउंडर तेजस कुसुरकर ने कहा कि भारत में विकसित डीप-टेक तकनीकों को ग्लोबल मार्केट तक ले जाना अगला अवसर है। उन्होंने कहा कि कीले यूनिवर्सिटी (Keele University) के साथ साझेदारी भारत-origin तकनीक, UK मैन्युफैक्चरिंग और वास्तविक रिन्यूएबल एनर्जी वातावरण को एक साथ लाकर ZincGel® की क्षमता को प्रदर्शित करेगी।
कीले यूनिवर्सिटी (Keele University) के डिजिटल सोसाइटी इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर प्रो. राफेल हिर्शी ने कहा कि यह प्रोजेक्ट रिन्यूएबल एनर्जी की intermittency और लॉन्ग-ड्यूरेशन एनर्जी स्टोरेज की चुनौतियों को समझने में मदद करेगा। पायलट के जरिए जिंक-ब्रोमीन बैटरी को लिथियम-आधारित तकनीक के विकल्प के रूप में एक दिन तक की स्टोरेज अवधि के लिए भी परखा जाएगा।