इतनी बड़ी व्यवस्था के बावजूद अधिकांश संस्थानों में परीक्षाएं आज भी पारंपरिक कागज-आधारित प्रणाली पर निर्भर हैं, जो पिछले तीन दशकों में बहुत कम बदली है।
हाल के वर्षों में शिक्षा के क्षेत्र में डिजिटल तकनीक का तेजी से विस्तार हुआ है। KPMG की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत का एडटेक क्षेत्र अब महामारी के बाद अधिक टिकाऊ और परिणाम-केंद्रित मॉडल की ओर बढ़ रहा है। हालांकि छात्रों के सीखने के तरीकों में बदलाव आया है, लेकिन मूल्यांकन और परीक्षा प्रणाली अभी भी उसी गति से आधुनिक नहीं हो पाई है। यही कारण है कि अब डिजिटल परीक्षा प्रणाली की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महसूस की जा रही है।
सीखने का तरीका बदला, मूल्यांकन का नहीं
आज छात्र ऑनलाइन प्लेटफॉर्म, डिजिटल कंटेंट और वर्चुअल क्लासरूम के माध्यम से शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर परीक्षाओं का संचालन अभी भी प्रश्नपत्र छापने, उन्हें सुरक्षित रखने, परीक्षा केंद्रों तक पहुंचाने, उत्तर पुस्तिकाएं एकत्र करने और मैन्युअल मूल्यांकन जैसी प्रक्रियाओं पर आधारित है। इन प्रक्रियाओं में काफी समय, संसाधन और मानव श्रम लगता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक शिक्षा प्रणाली में केवल पढ़ाई का डिजिटलीकरण पर्याप्त नहीं है। छात्रों के मूल्यांकन की प्रक्रिया को भी डिजिटल और डेटा-आधारित बनाना आवश्यक है, ताकि सीखने के वास्तविक परिणामों को बेहतर ढंग से मापा जा सके।
ब्लॉकचेन और AI ला रहे हैं बड़ा बदलाव
नई तकनीकों जैसे ब्लॉकचेन और जनरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) ने शिक्षा क्षेत्र में नए अवसर पैदा किए हैं। ब्लॉकचेन तकनीक शैक्षणिक प्रमाणपत्रों के सत्यापन को अधिक सुरक्षित और पारदर्शी बना रही है, जबकि AI प्रश्न निर्माण, मूल्यांकन और कौशल आकलन को अधिक प्रभावी बना रहा है।
अब अगला बड़ा कदम पूरी परीक्षा प्रक्रिया का डिजिटलीकरण माना जा रहा है, जिसमें प्रश्नपत्र तैयार करने से लेकर परिणाम घोषित करने तक की पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन और स्वचालित हो सकती है।
डिजिटल परीक्षाओं से मिलेगा डेटा आधारित विश्लेषण
पारंपरिक परीक्षा प्रणाली की सबसे बड़ी कमी यह है कि इससे बहुत कम उपयोगी डेटा प्राप्त होता है। संस्थान यह नहीं जान पाते कि कौन-से प्रश्न कठिन थे, छात्रों का प्रदर्शन किस क्षेत्र में कमजोर रहा या किन विषयों में सुधार की आवश्यकता है।
डिजिटल परीक्षा प्लेटफॉर्म इस समस्या का समाधान प्रदान करते हैं। इनके माध्यम से प्रश्नों की कठिनाई, उत्तर देने का समय, छात्रों के प्रदर्शन और परीक्षा व्यवहार का विस्तृत विश्लेषण किया जा सकता है। इससे संस्थानों को शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने और रोजगार बाजार की आवश्यकताओं के अनुरूप पाठ्यक्रम तैयार करने में मदद मिलती है।
AI आधारित परीक्षा प्रणाली की बढ़ती लोकप्रियता
कई विश्वविद्यालय और कॉलेज अब पेपरलेस परीक्षा प्रणाली की ओर बढ़ रहे हैं। AI आधारित प्लेटफॉर्म प्रश्न तैयार करने, प्रश्नों को यादृच्छिक (Randomize) करने और प्रश्नपत्र लीक होने के जोखिम को कम करने में मदद कर रहे हैं। इसके अलावा उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन पहले की तुलना में कहीं अधिक तेजी से किया जा सकता है। कई मामलों में परिणाम कुछ ही मिनटों में तैयार किए जा सकते हैं, जिससे छात्रों और संस्थानों दोनों का समय बचता है।
चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं
हालांकि डिजिटल परीक्षा प्रणाली के कई लाभ हैं, लेकिन इसके सामने कुछ चुनौतियां भी हैं। सबसे बड़ी समस्या इंटरनेट कनेक्टिविटी और तकनीकी बुनियादी ढांचे की है। विशेष रूप से टियर-2 और टियर-3 शहरों के कई संस्थानों में इंटरनेट की गुणवत्ता अभी भी पर्याप्त नहीं है।
विशेषज्ञों का सुझाव है कि ऐसे प्लेटफॉर्म विकसित किए जाने चाहिए जो कम इंटरनेट गति पर भी प्रभावी ढंग से काम कर सकें और आवश्यकता पड़ने पर ऑफलाइन मोड में भी परीक्षा संचालित कर सकें।
शिक्षकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण
डिजिटल परीक्षा प्रणाली को सफल बनाने के लिए शिक्षकों और संस्थानों की तैयारी भी आवश्यक है। शिक्षकों को पारंपरिक प्रश्न बैंक के बजाय सुव्यवस्थित, तकनीक-अनुकूल और विभिन्न कठिनाई स्तरों वाले प्रश्न तैयार करने होंगे।
जिन संस्थानों ने शिक्षकों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किए हैं, वहां डिजिटल परीक्षा प्रणाली को अपनाने की दर अधिक देखी गई है। इससे यह स्पष्ट होता है कि तकनीक के साथ-साथ मानव संसाधन विकास भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
डेटा सुरक्षा और गोपनीयता पर विशेष ध्यान
डिजिटल परीक्षा प्रणाली में छात्रों का डेटा अत्यंत संवेदनशील होता है। ऐसे में डेटा सुरक्षा और गोपनीयता सुनिश्चित करना जरूरी है। भारत का डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट 2023 इस दिशा में महत्वपूर्ण कानूनी ढांचा प्रदान करता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि संस्थानों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके तकनीकी साझेदारों की क्लाउड संरचना, डेटा स्टोरेज और एक्सेस कंट्रोल व्यवस्था इन नियमों का पूरी तरह पालन करती हो।
नई शिक्षा नीति को मिलेगा बल
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 ने शिक्षा व्यवस्था में तकनीक के अधिक उपयोग पर जोर दिया है। इसके अलावा UGC, NAAC और अन्य नियामक संस्थाएं भी डिजिटल मूल्यांकन और नवाचार आधारित शैक्षणिक प्रक्रियाओं को बढ़ावा दे रही हैं।
आज NIRF रैंकिंग, NAAC ग्रेडिंग, छात्र नामांकन, शिक्षक भर्ती और शोध अनुदान जैसे कई महत्वपूर्ण कारक संस्थानों की कार्यक्षमता और पारदर्शिता पर निर्भर करते हैं। ऐसे में डिजिटल परीक्षा प्रणाली संस्थानों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
वैश्विक स्तर पर बढ़ रही मांग
भारतीय उच्च शिक्षा संस्थानों के सामने मौजूद चुनौतियां केवल भारत तक सीमित नहीं हैं। दक्षिण-पूर्व एशिया, मध्य-पूर्व और अफ्रीका के कई देशों में भी ऐसी ही समस्याएं देखने को मिलती हैं।
Allied Market Research के अनुसार, वैश्विक एडटेक बाजार वर्ष 2030 तक 17.6 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर के साथ 433.17 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। इसमें परीक्षा और मूल्यांकन तकनीक सबसे तेजी से बढ़ने वाले क्षेत्रों में शामिल है।
भविष्य का आधार बनेगी डिजिटल परीक्षा प्रणाली
विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल परीक्षा प्रणाली केवल एक प्रशासनिक सुधार नहीं है, बल्कि यह शिक्षा में जवाबदेही, पारदर्शिता और गुणवत्ता सुधार की दिशा में एक बड़ा परिवर्तन है।
जो संस्थान परीक्षा को केवल प्रशासनिक कार्य के बजाय एक रणनीतिक अवसंरचना (Infrastructure) के रूप में देख रहे हैं, वे भविष्य की प्रतिस्पर्धा में आगे निकल रहे हैं। डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली छात्रों की सीखने की क्षमता, संस्थानों की विश्वसनीयता और शिक्षा के परिणामों को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
लेखक का मानना है कि आने वाले वर्षों में डिजिटल परीक्षा प्लेटफॉर्म शिक्षा, मूल्यांकन और सीखने के परिणामों को एकीकृत करने वाले मजबूत ढांचे के रूप में उभरेंगे। यही प्रणाली भारत के डिजिटल-फर्स्ट कैंपस और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी उच्च शिक्षा संस्थानों की नींव तैयार करेगी।
(लेखक: दिनेश कुमार पूबालन, सीईओ एवं को-फाउंडर - Greatify, विचार व्यक्तिगत हैं)