भारत में इलेक्ट्रिक मोबिलिटी का दौर अब केवल वाहनों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह एक व्यापक संरचनात्मक बदलाव का रूप ले चुका है। आज इलेक्ट्रिक मोबिलिटी केवल एक तकनीकी परिवर्तन नहीं, बल्कि यह ऊर्जा सुरक्षा, मैन्युफैक्चरिंग क्षमता, पर्यावरणीय जिम्मेदारी और तकनीकी नवाचार से जुड़ा एक समग्र इकोसिस्टम बन चुका है।
फ्रैंचाइज इंडिया की सीईओ और ऑन्त्रेप्रेन्योर इंडिया की कंसल्टिंग एडिटर आशिता मार्या ने कहा इसी परिवर्तन को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से Entrepreneur लगातार ऐसे प्लेटफॉर्म तैयार कर रहा है, जो उद्योग, नीति निर्माताओं और तकनीकी विशेषज्ञों को एक साथ लाकर सार्थक संवाद को बढ़ावा दें। पिछले चार वर्षों में चेन्नई में आयोजित India EV Show देश के सबसे विश्वसनीय इलेक्ट्रिक मोबिलिटी मंचों में से एक बनकर उभरा है। इस वर्ष यह आयोजन 27 और 28 जून को चेन्नई में आयोजित किया जाएगा, जहां उद्योग से जुड़े प्रमुख हितधारक एक साथ मिलकर समाधान और रणनीतियों पर चर्चा करेंगे।
इसी कड़ी में “Mile” नामक एक नए प्लेटफॉर्म की शुरुआत की गई है, जिसकी शुरुआत वेस्ट इंडिया एडिशन से हो रही है। इसका उद्देश्य स्पष्ट है। भारत में इलेक्ट्रिक मोबिलिटी का विकास क्षेत्रीय स्तर पर अलग-अलग गति और परिस्थितियों के साथ हो रहा है, इसलिए इसके लिए स्थानीय ध्यान और सहयोग आवश्यक है।
भारत में ईवी अपनाने की तस्वीर हर राज्य में अलग है। उत्तर प्रदेश में इलेक्ट्रिक तीन-पहिया वाहनों और लास्ट-माइल कनेक्टिविटी का तेजी से विस्तार हो रहा है, जहां ईवी आज आजीविका का साधन बन चुके हैं। वहीं महाराष्ट्र शहरी मांग, मजबूत मैन्युफैक्चरिंग और नीति स्थिरता के कारण तेजी से आगे बढ़ रहा है। कर्नाटक तकनीकी हब के रूप में उभरकर सॉफ्टवेयर, चार्जिंग मैनेजमेंट और बैटरी एनालिटिक्स में अग्रणी भूमिका निभा रहा है।
दिल्ली में नीति-आधारित तेजी से ईवी अपनाने का विस्तार हुआ है, जहां सख्त नियमों और बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर ने बदलाव को गति दी है। वहीं तमिलनाडु मैन्युफैक्चरिंग और सप्लाई चेन के मजबूत आधार के रूप में ईवी इकोसिस्टम का महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है।
भारत में इलेक्ट्रिक मोबिलिटी का विकास निजी उपयोग से ज्यादा फ्लीट, पब्लिक ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक्स सेक्टर में हो रहा है। यहां रेंज से ज्यादा विश्वसनीयता, डिजाइन से ज्यादा अपटाइम और सबसे महत्वपूर्ण प्रति किलोमीटर लागत मायने रखती है। यही कारण है कि ईवी आज कठिन से कठिन उपयोग क्षेत्रों में भी अपनी जगह बना रहे हैं।
आंकड़ों के अनुसार, पिछले वित्त वर्ष में भारत में लगभग 22 लाख इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री हुई, जो करीब 46% की साल-दर-साल वृद्धि को दर्शाता है। वहीं जनवरी 2026 में इलेक्ट्रिक कारों की बिक्री 18,000 यूनिट्स से अधिक रही, जो 54% की वृद्धि को दिखाती है। यह बढ़ता उपभोक्ता विश्वास, निवेश और नीति समर्थन का परिणाम है।
सरकार की FAME-II योजना, प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम, एडवांस्ड केमिस्ट्री सेल्स और नेशनल इलेक्ट्रिक बस प्रोग्राम जैसे कदमों ने इस क्षेत्र को मजबूत आधार प्रदान किया है। 60,000 करोड़ रुपये से अधिक के निवेश ने घरेलू मैन्युफैक्चरिंग और सप्लाई चेन को नई ऊर्जा दी है।
हालांकि, आने वाला समय केवल बिक्री के आंकड़ों से नहीं, बल्कि स्थानीयकरण, नवाचार, सप्लाई चेन की मजबूती और वैश्विक प्रतिस्पर्धा से तय होगा। प्रमुख चुनौतियों में स्वदेशी तकनीक का विकास, बैटरी लाइफ साइकिल मैनेजमेंट और नवीकरणीय ऊर्जा का एकीकरण शामिल है।
वैश्विक स्तर पर जहां चीन मैन्युफैक्चरिंग और सब्सिडी के दम पर आगे बढ़ा, अमेरिका उपभोक्ता-आधारित मॉडल पर निर्भर है और यूरोप सख्त नियमों के जरिए ईवी अपनाने को बढ़ा रहा है। वहीं भारत अपनी अलग राह पर चलते हुए, फ्लीट-आधारित अपनाने, सॉफ्टवेयर दक्षता और ऊर्जा एकीकरण पर ध्यान केंद्रित कर रहा है।
आने वाले दशक में ईवी सेक्टर के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकताएं होंगी—विश्वसनीय चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, बेहतर बैटरी मैनेजमेंट, टिकाऊ फाइनेंसिंग मॉडल और उपभोक्ता विश्वास। यह केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि उद्योग, स्टार्टअप्स और उद्यमियों की साझा भूमिका है।
“Mile” जैसे प्लेटफॉर्म इसी सहयोग को मजबूत करने का प्रयास हैं, जो नीति, पूंजी, तकनीक और जिम्मेदारी को एक साथ जोड़ते हैं। अंततः, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी का भविष्य केवल उत्पादों पर नहीं, बल्कि मजबूत सिस्टम और साझेदारियों पर निर्भर करेगा, जो भारत को एक टिकाऊ और आत्मनिर्भर मोबिलिटी इकोसिस्टम की ओर ले जाएगा।