रविवार, 1 फरवरी 2026 को पेश किए गए अपने नौवें बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने साफ कहा कि अब भारत के विकास का मुख्य आधार ग्रामीण बुनियादी ढांचा है। इस बजट में गांवों को सिर्फ सरकारी योजनाओं का लाभ लेने वाला नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने वाली एक अहम ताकत माना गया है।
केंद्रीय बजट 2026-27 सरकार के इरादों को ज़मीन पर उतारने की दिशा में एक और मज़बूत कदम है। यह दिखाता है कि “विकसित भारत” केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक सुव्यवस्थित और गंभीर राष्ट्रीय लक्ष्य है। उत्पादकता, मजबूती और समावेशन पर आधारित इस बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर को भारत की विकास यात्रा का केंद्र बताया है। गांवों को अब केवल कल्याण योजनाओं का लाभार्थी नहीं, बल्कि देश की आर्थिक ताकत के रूप में देखा गया है।
1 अप्रैल 2026 से शुरू होने वाले वित्त वर्ष के लिए रिकॉर्ड ₹12.2 लाख करोड़ के पूंजीगत खर्च की घोषणा करते हुए वित्त मंत्री ने दोहराया कि इंफ्रास्ट्रक्चर विकास का माध्यम भी है और सामाजिक समानता लाने का ज़रिया भी। अपने लगभग डेढ़ घंटे के भाषण में उन्होंने MSME, पर्यटन, आतिथ्य, आयुर्वेद, लॉजिस्टिक्स कॉरिडोर, सिंचाई, भंडारण और डिजिटल कनेक्टिविटी जैसे क्षेत्रों पर ज़ोर दिया। बजट यह बताता है कि अंतिम छोर तक बुनियादी सुविधाएं पहुंचाना ग्रामीण मांग बढ़ाने, कृषि उत्पादन सुधारने और गांवों को शहरी बाज़ारों से जोड़ने के लिए बेहद ज़रूरी है। ग्रामीण आवास, पीने के पानी, नवीकरणीय ऊर्जा और कृषि मूल्य श्रृंखलाओं को मिला बढ़ावा इस आधार को और मज़बूत करता है।
अपने भाषण की शुरुआत में वित्त मंत्री ने कहा कि 2014 से अब तक के 12 वर्षों में भारत की अर्थव्यवस्था स्थिरता, वित्तीय अनुशासन, लगातार विकास और नियंत्रित महंगाई के रास्ते पर आगे बढ़ी है। उन्होंने कहा, “यह उन सोच-समझकर लिए गए फैसलों का नतीजा है, जो हमने अनिश्चितता और वैश्विक संकट के दौर में भी किए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में हमारी सरकार ने हमेशा असमंजस की बजाय कार्रवाई, भाषणों की बजाय सुधार और लोगों को लुभाने वाले फैसलों की बजाय जनता को प्राथमिकता दी है।”
उन्होंने देश के सामने मौजूद वैश्विक चुनौतियों की ओर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा, “आज दुनिया में व्यापार और बहुपक्षीय सहयोग कमजोर पड़ रहा है। संसाधनों और सप्लाई चेन तक पहुंच मुश्किल हो रही है। नई तकनीकें उत्पादन के तरीकों को बदल रही हैं, जिससे पानी, ऊर्जा और महत्वपूर्ण खनिजों की मांग तेज़ी से बढ़ रही है। ऐसे माहौल में भी भारत विकसित भारत की दिशा में आत्मविश्वास से आगे बढ़ता रहेगा, जहां विकास के साथ समावेशन का संतुलन बना रहेगा। एक बढ़ती अर्थव्यवस्था के रूप में भारत को वैश्विक बाज़ारों से जुड़े रहना होगा, ज़्यादा निर्यात करना होगा और लॉन्ग-टर्म इन्वेस्टमेंट को आकर्षित करना होगा।”
बजट-2026 ग्रामीण विकास को मैन्युफैक्चरिंग, MSME और रोज़गार सृजन से जोड़ने में सहायक
खास बात यह है कि यह बजट ग्रामीण विकास को मैन्युफैक्चरिंग, MSME और रोज़गार सृजन से जोड़ता है। बेहतर ऋण सुविधा, लक्षित MSME फंड और लॉजिस्टिक्स सुधारों के ज़रिए ग्रामीण उद्यमों को आगे बढ़ने, औपचारिक बनने और राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन से जुड़ने में मदद मिलेगी। कौशल विकास, कृषि तकनीक, मत्स्य पालन और अन्य सहायक गतिविधियों पर ज़ोर यह दिखाता है कि सरकार केवल गुज़ारे लायक सहायता नहीं, बल्कि आय के नए स्रोत तैयार करना चाहता है।
वित्तीय अनुशासन बनाए रखते हुए भी विकास की रफ्तार से समझौता नहीं किया गया है। राज्यों को लंबी अवधि के ब्याज-मुक्त ऋण और विकेंद्रीकृत परियोजना क्रियान्वयन के ज़रिए केंद्र ने सहकारी संघवाद को विकास का अहम स्तंभ बनाया है। कुल मिलाकर, बजट 2026-27 ग्रामीण भारत की भूमिका को नए सिरे से परिभाषित करता है - अब वह केवल नीति का विषय नहीं, बल्कि एक संतुलित, समावेशी और इंफ्रास्ट्रक्चर-आधारित विकसित भारत की यात्रा में एक रणनीतिक साझेदार है। हालांकि बजट भाषण के बाद दिन भर शेयर बाज़ार के प्रमुख सूचकांकों ने सतर्क प्रतिक्रिया दी और उनमें हल्की गिरावट देखने को मिली।
कर्तव्य से प्रेरित बजट
नव-निर्मित कर्तव्य भवन में पेश किए गए अपने पहले केंद्रीय बजट को प्रस्तुत करते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि यह बजट सरकार के ‘तीन कर्तव्यों’ से प्रेरित है।
ये तीन कर्तव्य इस प्रकार हैं:
पहला- उत्पादकता और प्रतिस्पर्धा बढ़ाकर आर्थिक विकास को तेज़ और लगातार बनाए रखना, तथा वैश्विक उतार-चढ़ाव के बीच अर्थव्यवस्था को मज़बूत बनाना, दूसरा- लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करना और उनकी क्षमताओं का विकास करना, ताकि वे भारत की समृद्धि की यात्रा में मज़बूत साझेदार बन सकें और तीसरा- “सबका साथ, सबका विकास” की भावना के अनुरूप यह सुनिश्चित करना कि हर परिवार, समुदाय, क्षेत्र और क्षेत्रक (सेक्टर) को संसाधनों, सुविधाओं और विकास के अवसरों तक समान पहुंच मिले।
आर्थिक विकास को तेज़ और टिकाऊ बनाने के पहले कर्तव्य के तहत सरकार ने छह प्रमुख क्षेत्रों में हस्तक्षेप का प्रस्ताव रखा है। इनमें सात रणनीतिक और उभरते क्षेत्रों में मैन्युफैक्चरिंग का विस्तार, पुराने औद्योगिक क्षेत्रों का पुनर्जीवन, मजबूत MSME तैयार करना, इंफ्रास्ट्रक्चर को तेज़ी से बढ़ावा देना, दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना और सिटी इकोनॉमिक रीजन का विकास शामिल है।
पुराने उद्योग क्षेत्रों को फिर से मज़बूत बनाना
सरकार ने 200 पुराने उद्योग क्षेत्रों को फिर से मज़बूत बनाने के लिए एक योजना की घोषणा की है। इसके तहत इंफ्रास्ट्रक्चर और तकनीक को बेहतर बनाकर इन क्षेत्रों की लागत प्रतिस्पर्धा और कार्यक्षमता बढ़ाई जाएगी।
‘चैंपियन MSME’ तैयार करने और सूक्ष्म उद्यमों को समर्थन देने के तहत वित्त मंत्री ने ₹10,000 करोड़ का एक विशेष SME ग्रोथ फंड शुरू करने की घोषणा की, जिससे भविष्य के मजबूत उद्यम तैयार किए जा सकें। इसके साथ ही आत्मनिर्भर भारत फंड के लिए अतिरिक्त ₹2,000 करोड़ आवंटित किए जाएंगे, ताकि सूक्ष्म उद्यमों को जोखिम पूंजी (रिस्क कैपिटल) की उपलब्धता बनी रहे। सरकार ICAI, ICSI और ICMAI जैसे पेशेवर संस्थानों को छोटे, व्यावहारिक और मॉड्यूलर कोर्स तैयार करने के लिए प्रोत्साहित करेगी, ताकि विशेष रूप से टियर-2 और टियर-3 शहरों में ‘कॉरपोरेट मित्र’ की एक कुशल टीम तैयार की जा सके।
कार्बन कैप्चर पर बड़ा दांव
बजट पर प्रतिक्रिया देते हुए PHDCCI के अध्यक्ष राजीव जुनेजा ने कहा कि सरकार ने अगले पांच वर्षों में कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण (CCUS) तकनीकों के लिए ₹20,000 करोड़ (लगभग 2.4 अरब अमेरिकी डॉलर) का प्रावधान किया है। इसका उद्देश्य बिजली, स्टील, सीमेंट, रिफाइनरी और रसायन जैसे अधिक प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों में इन तकनीकों को अपनाने को बढ़ावा देना है। इस फंड का उपयोग विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों में CCUS तकनीक को व्यावसायिक स्तर पर लागू करने के लिए प्रोत्साहन देने में किया जाएगा। यह आवंटन भारत की 2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन के लक्ष्य से जुड़ी व्यापक जलवायु रणनीति का हिस्सा है।
दिशा की स्पष्टता
किसी बड़े या चौंकाने वाले ऐलान के बिना भी केंद्रीय बजट 2026-27 अपनी स्पष्ट दिशा के लिए अलग पहचान बनाता है। यह बजट इस बात को मजबूत करता है कि भारत की विकास चुनौती अब विकास और स्थिरता, कल्याण और निवेश, या शहरी और ग्रामीण प्राथमिकताओं के बीच चयन करने की नहीं है। असली चुनौती सुधारों को सही क्रम में लागू करने, विकास की गति बनाए रखने और यह सुनिश्चित करने की है कि सरकारी खर्च ज़मीन पर ठोस नतीजों में बदले।
इंफ्रास्ट्रक्चर-आधारित विकास, उत्पादकता में सुधार और वित्तीय अनुशासन की रणनीति के ज़रिए यह बजट भारत की मध्यम अवधि की आर्थिक मज़बूती पर भरोसा जताता है। पूंजीगत खर्च, मैन्युफैक्चरिंग की प्रतिस्पर्धा, MSME विस्तार और कौशल विकास पर लगातार ज़ोर यह दिखाता है कि सरकार इंफ्रास्ट्रक्चर को खर्च नहीं, बल्कि निजी निवेश और रोज़गार सृजन का उत्प्रेरक मानती है। साथ ही, कृषि, ग्रामीण आजीविका और सामाजिक इंफ्रास्ट्रक्चर में लक्षित हस्तक्षेप यह संकेत देते हैं कि विकास के लाभों का दायरा व्यापक बनाने की निरंतर एकाग्रता के साथ कोशिश की जा रही है।