इलेक्ट्रिक वाहन (EV) अब केवल परिवहन का साधन नहीं रह गए हैं, बल्कि वे ऊर्जा सुरक्षा, औद्योगिक विकास और राष्ट्रीय रणनीति का अहम हिस्सा बन चुके हैं। इस पूरे बदलाव की नींव जिन तत्वों पर टिकी है, उन्हें क्रिटिकल मिनरल्स कहा जाता है। इनमें लिथियम, कोबाल्ट, निकल और रेयर अर्थ एलिमेंट्स शामिल हैं, जो EV बैटरी और मोटर के लिए अनिवार्य हैं।
आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 ने साफ तौर पर चेताया है कि इन खनिजों को लेकर दुनिया भर में प्रतिस्पर्धा तेज़ हो रही है। कई देश इन्हें सुरक्षित करने में जुटे हैं, जिससे एक तरह की “नई औपनिवेशिक होड़” जैसी स्थिति बनती दिख रही है। रिन्यूएबल एनर्जी, इलेक्ट्रिक वाहन, सेमीकंडक्टर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे सेक्टर अब रणनीतिक प्राथमिकता बन चुके हैं। इसी वजह से EV सेक्टर सिर्फ पर्यावरण या ट्रांसपोर्ट का मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जुड़ गया है।
EV के लिए क्रिटिकल मिनरल्स क्यों ज़रूरी हैं?
ईवी बैटरी की क्षमता, वाहन की रेंज, चार्जिंग स्पीड और कीमत सब कुछ इन्हीं खनिजों पर निर्भर करता है। लिथियम और निकल बैटरी की ऊर्जा क्षमता और लाइफ तय करते हैं, जबकि कोबाल्ट स्थिरता और सुरक्षा में मदद करता है। वहीं रेयर अर्थ एलिमेंट्स ईवी मोटर को अधिक ताकतवर और कुशल बनाते हैं।
ईवियम (EVeium) स्मार्ट मोबिलिटी के फाउंडर एवं सीईओ समीर मोइदीन ने कहा इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए कुछ खास खनिज बहुत ज़रूरी होते हैं, क्योंकि इन्हीं से बैटरी की क्षमता, कीमत और ईवी सेक्टर का भविष्य तय होता है। लिथियम और निकल वाहन की रेंज और चार्जिंग पर असर डालते हैं, जबकि रेयर अर्थ तत्व मोटर को ज़्यादा मजबूत और असरदार बनाते हैं। इसलिए ये खनिज आम लोगों के उपयोग के अनुभव और वाहन बनाने की लागत दोनों से सीधे जुड़े हैं।
इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहनों में, जहाँ लोग कम कीमत और भरोसेमंद विकल्प चाहते हैं, खनिजों की कमी या उनकी कीमतों में तेज़ बढ़ोतरी से वाहन महंगे हो जाते हैं और बाज़ार की रफ्तार धीमी पड़ जाती है।
इसी वजह से आर्थिक सर्वेक्षण में महत्वपूर्ण खनिजों पर दिया गया ज़ोर बहुत अहम है। यह बताता है कि सिर्फ बैटरी फैक्ट्रियाँ लगाना काफी नहीं है, जब तक उनके लिए ज़रूरी कच्चा माल सुरक्षित न हो।
दुनिया भर में बढ़ती प्रतिस्पर्धा यह भी दिखाती है कि आगे चलकर ईवी से जुड़ी नीतियाँ सिर्फ उद्योग पर नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय साझेदारी और सहयोग पर भी निर्भर करेंगी। अगर हमें ईवी सेक्टर को लंबे समय तक मज़बूत बनाना है, तो विदेशों से सप्लाई, देश में रीसाइक्लिंग और ऐसे नए बैटरी विकल्पों पर साथ-साथ काम करना होगा, जिनमें दुर्लभ खनिजों की ज़रूरत कम हो। तभी ईवी का विकास स्थिर और भरोसेमंद बना रह पाएगा।
इस पर लिको मैटिरीयल्स LICO Materials के सीईओ एवं फाउंडर गौरव डोलवानी ने कहा “इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए क्रिटिकल मिनरल्स बहुत ज़रूरी हैं, क्योंकि इन्हीं से बैटरी बनती है और ईवी सेक्टर लंबे समय तक टिकाऊ बना रहता है। जैसे-जैसे भारत में ईवी का उपयोग बढ़ेगा, इन खनिजों की उपलब्धता ही कीमत, सप्लाई और आत्मनिर्भरता तय करेगी।
आर्थिक सर्वेक्षण ने सही कहा है कि इन खनिजों की सप्लाई सुरक्षित करना जरूरी है, लेकिन भारत केवल आयात पर निर्भर नहीं रह सकता। इसके लिए देश में बैटरी रीसाइक्लिंग को मजबूत करना होगा। पुरानी बैटरियों से खनिज निकालकर दोबारा इस्तेमाल करने से संसाधनों का जोखिम कम होगा और आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को भी मजबूती मिलेगी। इसके लिए साफ नीतियां और उद्योग का सहयोग बहुत जरूरी है।”
आर्थिक सर्वेक्षण का नजरिया
आर्थिक सर्वेक्षण में भारत की ACC बैटरी PLI योजना का जिक्र किया गया है, जिसके तहत 18,100 करोड़ के निवेश से 50 GWh बैटरी क्षमता विकसित की जा रही है। यह ईवी इकोसिस्टम को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम है।
लेकिन सबसे बड़ी चुनौती यह है कि बैटरी निर्माण के बावजूद, लिथियम, कोबाल्ट और निकल जैसे कच्चे माल के लिए भारत अभी भी आयात पर निर्भर है। अगर वैश्विक सप्लाई बाधित होती है या कीमतें बढ़ती हैं, तो ईवी की लागत बढ़ेगी और अपनाने की गति पर असर पड़ेगा।
मेटास्टेबल मैटीरियल्स के सह-संस्थापक और चीफ ऑफ इंडस्ट्रियल इंजीनियरिंग मणिकुमार उप्पाला ने कहा इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) के पूरे इकोसिस्टम में क्रिटिकल मिनरल्स की बहुत अहम भूमिका है। ऊर्जा को संग्रहित करने वाली बैटरियां ईवी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होती हैं और लिथियम-आयन बैटरियों के निर्माण व चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए इन खनिजों की जरूरत होती है। इनके बिना बड़े पैमाने पर ईवी को अपनाना संभव नहीं है।
ईवी में हाई एनर्जी डेंसिटी वाली बैटरियां चाहिए। इसके लिए लिथियम और निकल जरूरी हैं लिथियम चार्ज को ले जाने में मदद करता है, जबकि निकल बैटरी की क्षमता बढ़ाता है। कोबाल्ट और मैंगनीज बैटरी की मजबूती और उम्र बढ़ाने में सहायक होते हैं। दुनिया भर में ईवी और एनर्जी स्टोरेज की मांग बढ़ने से इन खनिजों की मांग भी तेज़ी से बढ़ रही है, जिससे सप्लाई चेन पर भू-राजनीतिक जोखिम, कीमतों में उतार-चढ़ाव और कुछ देशों पर निर्भरता बढ़ रही है। भारत के लिए कम कार्बन अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ने में सबसे बड़ी चुनौती इन खनिजों की सप्लाई है, क्योंकि देश इन पर काफी हद तक आयात पर निर्भर है।
आर्थिक सर्वेक्षण ने सही तौर पर इस कमजोरी पर ध्यान दिया है और क्रिटिकल मिनरल्स की सप्लाई चेन को सुरक्षित करने को रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बताया है। इसमें खनिज स्रोतों में विविधता, विदेशों में खनिज संपत्तियों का अधिग्रहण, देश में खोज और रीसाइक्लिंग जैसे उपाय सुझाए गए हैं। सर्वेक्षण यह भी बताता है कि रीसाइक्लिंग और सर्कुलर इकोनॉमी लंबे समय में खनन पर निर्भरता कम करने के साथ-साथ पर्यावरण की चिंताओं को भी दूर कर सकती है। कुल मिलाकर, यह सर्वेक्षण भारत की ईवी महत्वाकांक्षाओं और रणनीतिक आत्मनिर्भरता से क्रिटिकल मिनरल्स को जोड़ते हुए एक दूरदर्शी दृष्टिकोण अपनाता है।
सबसे बड़ा चैलेंज क्या है?
एटेरो (Attero) के सह-संस्थापक एवं सीईओ नितिन गुप्ता ने कहा इलेक्ट्रिक वाहनों में उपयोग होने वाले महत्वपूर्ण खनिज बहुत ज़रूरी होते हैं। बैटरी बनाने के लिए लिथियम, कोबाल्ट और निकल चाहिए, जबकि ईवी मोटर चलाने वाले मैग्नेट में रेयर अर्थ तत्वों का उपयोग होता है। जैसे-जैसे दुनिया भर में इलेक्ट्रिक वाहनों की संख्या बढ़ रही है, इन खनिजों की उपलब्धता यह तय करेगी कि कोई देश ईवी और ऊर्जा के क्षेत्र में कितना मज़बूत बन पाता है।
आर्थिक सर्वेक्षण सही तरीके से बताता है कि स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ते समय ये खनिज अब रणनीतिक रूप से बहुत अहम हो गए हैं। भारत के लिए यह एक अच्छा मौका है कि वह आयात पर निर्भरता कम करे और देश में रीसाइक्लिंग और रिकवरी को मजबूत बनाए।
पुराने इलेक्ट्रॉनिक सामान और उपयोग हो चुकी बैटरियों से खनिज निकालकर एक स्थिर और टिकाऊ सप्लाई बनाई जा सकती है। इससे भारत को वैश्विक ईवी और क्लीन-टेक सप्लाई चेन में अपनी स्थिति मज़बूत करने में मदद मिलेगी।
केवल मैन्युफैक्चरिंग काफी नहीं
लक्ज़री कार्ट (Luxury Cart) के फाउंडर एवं सीईओ हिमांशु आर्य का मानना है कि ईवी सेक्टर में अब बातचीत सिर्फ वाहनों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि जल्दी ही बैटरी और उनके रॉ मैटीरियल पर आ जाती है। उनका कहना है कि सिर्फ मैन्युफैक्चरिंग इंसेंटिव्स से ईवी सेक्टर आगे नहीं बढ़ सकता। लंबे समय में रॉ मैटीरियल की सोर्सिंग, प्रोसेसिंग और सप्लाई चेन को कैसे संभाला जाता है, वही टिकाऊ विकास तय करेगा।
आर्थिक सर्वेक्षण यह साफ संकेत देता है कि क्रिटिकल मिनरल्स अब सिर्फ व्यापार का विषय नहीं, बल्कि रणनीतिक आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल बन चुके हैं। भारत के लिए जरूरी है कि वह विदेशी सप्लाई, घरेलू रीसाइक्लिंग और ऐसे नए बैटरी विकल्पों पर एक साथ काम करे, जिनमें दुर्लभ खनिजों की जरूरत कम हो। इसी संतुलित रणनीति से ईवी सेक्टर का विकास स्थिर, भरोसेमंद और दीर्घकालिक बन सकेगा।