2040 के दशक तक भारत में ACC बैटरियों की मांग 700 GWh से ज्यादा होगी: IESA

2040 के दशक तक भारत में ACC बैटरियों की मांग 700 GWh से ज्यादा होगी: IESA

2040 के दशक तक भारत में ACC बैटरियों की मांग 700 GWh से ज्यादा होगी: IESA
आईईएसए की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में एसीसी  बैटरियों की मांग 2025 में 28 GWh से बढ़कर 2040 के दशक के मध्य तक 700 GWh से ज्यादा हो जाएगी।

इंडिया एनर्जी स्टोरेज अलायंस (IESA) की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में एडवांस्ड केमिस्ट्री सेल (ACC) बैटरियों की मांग 2025 में 28 GWh से बढ़कर 2040 के दशक के मध्य तक 700 GWh से ज्यादा हो जाएगी। भारत की बैटरी वैल्यू चेन का 2047 तक आकलन करने वाली यह रिपोर्ट गुरुवार को जारी की गई।

रिपोर्ट में कहा गया है कि इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और बड़े पैमाने पर एनर्जी स्टोरेज की ओर भारत का बदलाव, जलवायु लक्ष्यों और ‘विकसित भारत विजन 2047’ को हासिल करने में अहम भूमिका निभाएगा। अध्ययन में दो परिदृश्यों बिजनेस-एज़-यूजुअल (BAU) और विकसित भारत पाथवे (VBP) के आधार पर अनुमान लगाया गया है कि 2047 तक कुल बैटरी मांग 1.3 टेरावॉट-आवर (TWh) से 1.9 TWh के बीच पहुंच सकती है।

यह रिपोर्ट हैदराबाद में आयोजित इंडिया बैटरी मैन्युफैक्चरिंग एंड सप्लाई चेन समिट (IBMSCS) 2026 के दौरान जारी की गई। इस अवसर पर नवीन एवं रिन्यूएबल एनर्जी मंत्रालय के संयुक्त सचिव राजेश कुल्हारी ने कहा कि भारत की एनर्जी स्टोरेज क्रांति के लिए पूरे इकोसिस्टम में सहयोग जरूरी है। 

आईईएसए (IESA) के प्रेसिडेंट देबमल्य सेन ने कहा कि बैटरियों की तेजी से बढ़ती मांग भारत के लिए बड़ा अवसर होने के साथ-साथ घरेलू मैन्युफैक्चरिंग क्षमताओं के निर्माण की रणनीतिक आवश्यकता भी है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य को हासिल करने के लिए सेल असेंबली से आगे बढ़कर कच्चे माल, कंपोनेंट्स और रीसाइक्लिंग तक एक पूर्ण इकोसिस्टम विकसित करना होगा।

रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में कुल बैटरी मांग में इलेक्ट्रिक वाहनों की हिस्सेदारी करीब 60 प्रतिशत होगी, जो 2047 तक बढ़कर 74–77 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। भारत का ईवी बाजार 2035 तक 30 प्रतिशत से अधिक की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) से बढ़ने की उम्मीद है, जिसमें इलेक्ट्रिक दोपहिया और तिपहिया वाहन प्रमुख भूमिका निभाएंगे।

इसके साथ ही, स्थिर एनर्जी स्टोरेज (स्टेशनरी एनर्जी स्टोरेज) की तैनाती 2030 के बाद तेज होगी, जो रिन्यूएबल एनर्जी एकीकरण और ग्रिड संतुलन की जरूरतों से प्रेरित होगी और 2035 तक 23 प्रतिशत से अधिक CAGR से बढ़ेगी।

रिपोर्ट में यह भी अनुमान लगाया गया है कि लिथियम आयरन फॉस्फेट (LFP) और इसके वेरिएंट्स 2047 तक कुल बैटरी मांग का 60 प्रतिशत से अधिक हिस्सा होंगे, जिसका कारण कम लागत, बेहतर थर्मल स्थिरता और सुरक्षा है।

इस कार्यक्रम में चीन, जापान, कोरिया, फिनलैंड, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी और अमेरिका सहित कई देशों की अंतरराष्ट्रीय भागीदारी भी देखने को मिली, जो भारत के बैटरी इकोसिस्टम के वैश्विक महत्व को दर्शाती है।

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