भारत में स्वच्छ ऊर्जा, जलवायु तकनीक और रिसर्च आधारित शिक्षा को नई दिशा देने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया गया है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने IIT बॉम्बे में आयोजित “भारत इनोवेट्स 2026” कार्यक्रम के दौरान देश की पहली एकीकृत CCUS (Carbon Capture, Utilisation and Storage) फील्ड प्रयोगशाला सुविधा का उद्घाटन किया। यह अत्याधुनिक सुविधा छात्रों, शोधकर्ताओं, वैज्ञानिकों और उद्योग जगत के लिए नई रिसर्च संभावनाओं के द्वार खोलेगी।
इस अवसर पर शिक्षा मंत्रालय के उच्चतर शिक्षा विभाग के सचिव विनीत जोशी, IIT बॉम्बे के निदेशक शिरीष केदारे, प्रो. मिलिंद अत्रे, प्रो. रविंद्र गुड़ी, संस्थान के वैज्ञानिक, शिक्षक, शोधकर्ता, उद्योग प्रतिनिधि, स्टार्टअप संस्थापक और बड़ी संख्या में छात्र मौजूद रहे।
स्वच्छ ऊर्जा और रिसर्च को नई दिशा
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि यह प्रयोगशाला भारत में स्वच्छ ऊर्जा और जलवायु तकनीक से जुड़े नवाचारों को मजबूत करने की दिशा में ऐतिहासिक पहल है। उन्होंने कहा कि IIT बॉम्बे द्वारा विकसित यह सुविधा केवल एक रिसर्च लैब नहीं, बल्कि भविष्य की टिकाऊ तकनीकों के विकास का राष्ट्रीय केंद्र बनेगी।
उन्होंने IIT बॉम्बे के SINE (Society for Innovation and Entrepreneurship) में विकसित स्टार्टअप “उर्जानोवासी” की भी सराहना की, जिसने इस तकनीक को बड़े स्तर पर विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मंत्री ने कहा कि यह परियोजना दिखाती है कि भारत अब केवल तकनीक का उपभोक्ता नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर उभरती प्रौद्योगिकियों का नेतृत्व करने की क्षमता भी रखता है।
छात्रों को मिलेगा आधुनिक रिसर्च का अवसर
विशेषज्ञों का मानना है कि यह सुविधा छात्रों और युवा शोधकर्ताओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित होगी। यहां उन्हें कार्बन कैप्चर तकनीक, क्लाइमेट साइंस, भूविज्ञान, केमिकल इंजीनियरिंग और पर्यावरण विज्ञान जैसे क्षेत्रों में अत्याधुनिक रिसर्च करने का अवसर मिलेगा।
शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, नई शिक्षा नीति (NEP 2020) के तहत रिसर्च और इनोवेशन आधारित शिक्षा पर जोर दिया जा रहा है। ऐसे में IIT बॉम्बे जैसी संस्थाओं में विश्वस्तरीय प्रयोगशालाओं की स्थापना छात्रों को वैश्विक स्तर की तकनीकी शिक्षा और व्यावहारिक अनुभव प्रदान करेगी।
क्या है CCUS तकनीक?
CCUS यानी Carbon Capture, Utilisation and Storage ऐसी तकनीक है, जिसके जरिए वातावरण या औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) को कैप्चर किया जाता है। इसके बाद इस गैस का उपयोग औद्योगिक उत्पादों में किया जाता है या फिर इसे सुरक्षित रूप से जमीन के भीतर संग्रहित किया जाता है, ताकि वातावरण में प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग को कम किया जा सके।
यह तकनीक भारत के “नेट-ज़ीरो उत्सर्जन” लक्ष्य को हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। प्रधानमंत्री Narendra Modi द्वारा घोषित “पंचामृत” जलवायु लक्ष्यों और 2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन हासिल करने की दिशा में इसे बड़ा कदम माना जा रहा है।
स्वदेशी तकनीक से तैयार हुआ अत्याधुनिक सिस्टम
IIT बॉम्बे में विकसित इस परियोजना की सबसे बड़ी खासियत इसकी स्वदेशी तकनीक है। यह उन्नत जलीय-आधारित कार्बन कैप्चर सिस्टम वातावरण और औद्योगिक गैसों से कार्बन डाइऑक्साइड को पकड़ने में सक्षम है।
इस तकनीक में समुद्री जल और औद्योगिक अपशिष्ट जल जैसे गैर-पीने योग्य जल स्रोतों का उपयोग किया जाता है, जिससे पानी की बर्बादी कम होती है। कैप्चर की गई CO₂ को उच्च-शुद्धता वाले कार्बोनेट और बाइकार्बोनेट लवणों में बदला जाता है, जिनका उपयोग इस्पात, सीमेंट, पेट्रोकेमिकल्स और फार्मास्यूटिकल्स उद्योगों में किया जा सकता है। विशेषज्ञ इसे “कचरे से संसाधन” (Waste to Wealth) मॉडल का मजबूत उदाहरण मान रहे हैं।
दक्कन ट्रैप में होगी वैज्ञानिक ड्रिलिंग
इस परियोजना का एक अहम हिस्सा भूवैज्ञानिक कार्बन पृथक्करण (Geological Carbon Sequestration) भी है। इसके तहत दक्कन ट्रैप क्षेत्र में वैज्ञानिक ड्रिलिंग की जाएगी, ताकि यह समझा जा सके कि बेसाल्ट चट्टानों के भीतर कार्बन डाइऑक्साइड को लंबे समय तक सुरक्षित तरीके से कैसे संग्रहित किया जा सकता है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि इस प्रक्रिया से कार्बन स्थायी खनिजों में बदल सकता है, जिससे वातावरण में दोबारा गैस के रिसाव का खतरा काफी कम हो जाएगा।
रिसर्च से इंडस्ट्री तक बनेगा मजबूत कनेक्शन
उच्चतर शिक्षा विभाग के सचिव विनीत जोशी ने कहा कि IIT बॉम्बे की यह पहल शिक्षा जगत, उद्योग और नीति निर्माताओं के बीच सहयोग का उत्कृष्ट उदाहरण है। उन्होंने कहा कि यह परियोजना दिखाती है कि कैसे रिसर्च आधारित तकनीकों को उद्योगों में लागू कर वास्तविक समस्याओं का समाधान किया जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि यह पहल देश के अन्य शिक्षण संस्थानों के लिए भी प्रेरणा बनेगी और भारत को 2047 तक “विकसित भारत” बनाने के लक्ष्य में मदद करेगी।
भारत को मिल सकती है वैश्विक पहचान
जलवायु तकनीक विशेषज्ञों का मानना है कि यह सुविधा भारत को कार्बन मैनेजमेंट और क्लाइमेट टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में वैश्विक पहचान दिला सकती है। इससे न केवल नई रिसर्च को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि स्टार्टअप्स, उद्योगों और वैज्ञानिक संस्थानों के बीच सहयोग भी मजबूत होगा।
विशेषज्ञों के अनुसार, आने वाले समय में कार्बन कैप्चर और क्लाइमेट टेक्नोलॉजी दुनिया के सबसे बड़े रिसर्च और रोजगार क्षेत्रों में शामिल हो सकते हैं। ऐसे में IIT बॉम्बे की यह पहल भारत के छात्रों और वैज्ञानिकों को भविष्य की तकनीकों के लिए तैयार करने में अहम भूमिका निभाएगी।
शिक्षा और नवाचार के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह पहल?
शिक्षा विश्लेषकों का कहना है कि यह परियोजना केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत में रिसर्च आधारित शिक्षा, स्टार्टअप संस्कृति और तकनीकी आत्मनिर्भरता को भी मजबूत करेगी और इससे छात्रों को वैश्विक स्तर की प्रयोगशालाओं में काम करने का अवसर मिलेगा, रिसर्च को उद्योगों से जोड़ा जा सकेगा और भारत जलवायु तकनीक में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ सकेगा।