भारत में विदेश में पढ़ाई को लेकर छात्रों की सोच में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है और यह बदलाव अब केवल महानगरों तक सीमित नहीं है। हाल ही में ग्लोबल टैलेंट मोबिलिटी प्लेटफॉर्म TerraTern द्वारा किए गए एक सर्वे के अनुसार, टियर-2 और टियर-3 शहरों के छात्र तेजी से विदेश में शिक्षा और करियर के नए अवसरों की ओर बढ़ रहे हैं।
खास बात यह है कि अब जर्मनी छात्रों के बीच एक लोकप्रिय विकल्प बनकर उभर रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, अब छात्र केवल डिग्री हासिल करने के लिए विदेश नहीं जाना चाहते, बल्कि वे ऐसे देशों को प्राथमिकता दे रहे हैं जहां बेहतर करियर अवसर, कम शिक्षा खर्च और लंबी अवधि के माइग्रेशन विकल्प उपलब्ध हों। यही वजह है कि कनाडा जैसे पारंपरिक विकल्पों की तुलना में जर्मनी की लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही है।
छोटे शहरों से बढ़ रही विदेश शिक्षा की मांग
TerraTern के इस सर्वे में 24 से 35 वर्ष की आयु के 2,800 से अधिक छात्रों और शुरुआती करियर पेशेवरों को शामिल किया गया। यह सर्वे जयपुर, लुधियाना, चंडीगढ़, देहरादून, लखनऊ, पटना, भोपाल, सूरत, वडोदरा, इंदौर, नागपुर, कोयंबटूर, मैसूरु, विशाखापत्तनम और वारंगल जैसे कई शहरों में किया गया। सर्वे से पता चला कि अब टियर-2 और टियर-3 शहरों के छात्रों की आकांक्षाएं भी बड़े शहरों के स्टूडेंट्स जैसी हो गई हैं। उनके लिए विदेश में पढ़ाई केवल शिक्षा नहीं, बल्कि वैश्विक करियर की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बन चुकी है।
इस बदलाव के केंद्र में जर्मनी की बढ़ती लोकप्रियता है। जर्मनी कम या लगभग मुफ्त शिक्षा, मजबूत औद्योगिक आधार और व्यवस्थित जॉब-सीकर वीजा प्रणाली के कारण छात्रों के लिए आकर्षक विकल्प बन रहा है। दूसरी ओर, कनाडा जैसे देशों के प्रति छात्रों की रुचि में कमी देखी जा रही है। बढ़ती शिक्षा लागत, वीजा अनिश्चितता और पढ़ाई के बाद नौकरी को लेकर बढ़ती चिंताओं ने छात्रों को नए विकल्पों पर विचार करने के लिए प्रेरित किया है।
करियर और ROI पर बढ़ा फोकस
सर्वे में सामने आया कि 78.9 प्रतिशत छात्र विदेश में पढ़ाई करना चाहते हैं, लेकिन अब उनकी प्राथमिकताएं पहले से काफी बदल चुकी हैं। करीब 55 प्रतिशत छात्रों ने बताया कि शिक्षा का खर्च और नौकरी के अवसर उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती हैं। वहीं 77 प्रतिशत छात्र पढ़ाई के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय नौकरी के अवसरों की भी तलाश कर रहे हैं, जिससे साफ है कि अब उनका फोकस “करियर-फर्स्ट” सोच पर है। इसके अलावा 69 प्रतिशत छात्र किसी भी देश में आवेदन करने से पहले वहां पढ़ाई के बाद मिलने वाले रोजगार अवसरों को प्राथमिकता दे रहे हैं। यह दर्शाता है कि छात्र अब निवेश पर बेहतर रिटर्न (ROI) को ध्यान में रखकर निर्णय ले रहे हैं।
सर्वे में एक दिलचस्प तथ्य यह भी सामने आया कि छात्रों में वीजा रिजेक्शन का डर आर्थिक समस्याओं से भी अधिक है। इससे स्पष्ट होता है कि छात्र ऐसे देशों को प्राथमिकता दे रहे हैं जहां माइग्रेशन और रोजगार के स्पष्ट एवं भरोसेमंद रास्ते उपलब्ध हों। इस अध्ययन में तकनीक की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण रूप से सामने आई। अब टियर-3 और टियर-4 शहरों के छात्र AI आधारित टूल्स की मदद से अपनी पात्रता जांच रहे हैं, विभिन्न देशों के विकल्प समझ रहे हैं और विदेश शिक्षा से जुड़ी अनिश्चितताओं को कम कर रहे हैं। पहले विदेश में पढ़ाई से जुड़ी जानकारी और काउंसलिंग मुख्य रूप से मेट्रो शहरों तक सीमित रहती थी, लेकिन अब AI तकनीक की मदद से छोटे शहरों के छात्रों को भी वैश्विक अवसरों तक पहुंच मिल रही है।
AI तकनीक बदल रही है विदेश शिक्षा का परिदृश्य
सर्वे से यह भी स्पष्ट हुआ कि छात्रों की सोच में बड़ा व्यवहारिक बदलाव आया है। अब छात्र केवल किसी विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा देखकर देश नहीं चुन रहे, बल्कि वे लंबी अवधि के रोजगार अवसर, माइग्रेशन नीतियां और निवेश पर रिटर्न को प्राथमिकता दे रहे हैं। इन सभी मानकों पर जर्मनी छात्रों की उम्मीदों पर खरा उतरता दिखाई दे रहा है, जिसकी वजह से यह देश तेजी से पसंदीदा स्टडी डेस्टिनेशन बन रहा है।
इस संदर्भ में TerraTern के फाउंडर दिव्यांश चौधरी ने कहा कि भारत के युवा अब वैश्विक अवसरों को बिल्कुल नए नजरिए से देख रहे हैं। उनके अनुसार जर्मनी इसलिए तेजी से लोकप्रिय हो रहा है क्योंकि यह छात्रों की वर्तमान प्राथमिकताओं बेहतर करियर, कम खर्च और स्पष्ट माइग्रेशन मार्ग से मेल खाता है। उन्होंने यह भी कहा कि AI तकनीक इन अवसरों को मेट्रो शहरों से बाहर के छात्रों तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभा रही है।
वहीं विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में टियर-2, टियर-3 और यहां तक कि टियर-4 शहर भी भारत की वैश्विक शिक्षा प्रवृत्तियों को तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे। यह सर्वे इस बात को भी रेखांकित करता है कि छात्रों को विदेश शिक्षा से जुड़े जटिल निर्णयों में मदद करने के लिए पारदर्शी मार्गदर्शन, परिणाम-आधारित विकल्प और तकनीक आधारित सहायता प्रणालियों की आवश्यकता लगातार बढ़ रही है।