बजट 2026: रिटेल लोन, एमएसएमई और स्टार्टअप इकोसिस्टम की बड़ी अपेक्षाएं

बजट 2026: रिटेल लोन, एमएसएमई और स्टार्टअप इकोसिस्टम की बड़ी अपेक्षाएं

बजट 2026: रिटेल लोन, एमएसएमई और स्टार्टअप इकोसिस्टम की बड़ी अपेक्षाएं
यूनियन बजट 2026 से वित्तीय सेवाओं और स्टार्टअप इकोसिस्टम को ऐसी नीतियों की उम्मीद है जो एमएसएमई, रिटेल क्रेडिट और डीप-टेक इनोवेशन में मौजूद संरचनात्मक चुनौतियों को दूर करें।

जैसे-जैसे यूनियन बजट 2026 नज़दीक आ रहा है, भारत के वित्तीय सेवा और स्टार्टअप इकोसिस्टम में उम्मीदें तेज़ी से बढ़ रही हैं। उद्योग को ऐसे नीतिगत संकेतों की प्रतीक्षा है जो केवल बड़े बजटीय आवंटनों तक सीमित न हों, बल्कि क्रेडिट एक्सेस, उपभोक्ता वित्त और इनोवेशन-आधारित विकास में मौजूद संरचनात्मक चुनौतियों को भी दूर करें।

पिछला यूनियन बजट मुख्य रूप से राजकोषीय अनुशासन बनाए रखने और पूंजीगत व्यय को जारी रखने पर केंद्रित था। इसमें इंफ्रास्ट्रक्चर, एमएसएमई क्रेडिट गारंटी और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर पर विशेष जोर दिया गया। हालांकि, उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि अब अगला चरण तेज़ और प्रभावी क्रियान्वयन की मांग करता है—खासतौर पर वंचित उधारकर्ताओं, रिटेल क्रेडिट उपयोगकर्ताओं और डीप-टेक उद्यमों के लिए।

एमएसएमई और एनबीएफसी की भूमिका

बजट 2025 में सरकार ने क्रेडिट गारंटी फंड ट्रस्ट फॉर माइक्रो एंड स्मॉल एंटरप्राइजेज (CGTMSE) को मज़बूत किया, मुद्रा योजना का दायरा बढ़ाया और प्राथमिकता क्षेत्र ऋण (PSL) की सीमाएं बनाए रखीं। इन कदमों से एमएसएमई को ऋण प्रवाह बना रहा और एमएसएमई क्रेडिट में साल-दर-साल दो अंकों की वृद्धि देखी गई, हालांकि ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में बैंक अभी भी सतर्क बने रहे।

इस अंतर को भरने में गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFCs) की भूमिका लगातार बढ़ी है, जो अब छोटे उद्यमियों तक अंतिम छोर (लास्ट-माइल) क्रेडिट पहुंचाने में अहम भूमिका निभा रही हैं।

मनीबॉक्स फाइनेंस लिमिटेड के सह-संस्थापक, सह-सीईओ और सीएफओ दीपक अग्रवाल के अनुसार, बजट 2026 में इस भूमिका को औपचारिक रूप से मान्यता दी जानी चाहिए।

उन्होंने कहा,“हम उम्मीद करते हैं कि सरकार ग्रामीण और अर्ध-शहरी एमएसएमई और पहली बार ऋण लेने वाले उधारकर्ताओं को अपने वित्तीय समावेशन एजेंडे के केंद्र में रखे। एनबीएफसी इन क्षेत्रों में औपचारिक क्रेडिट का प्रमुख माध्यम बन चुके हैं, जो कृषि-संबंधित व्यवसायों, सेवाओं और छोटे मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स को सपोर्ट कर रहे हैं। एमएसएमई और प्राथमिकता क्षेत्र ऋण के लिए एक संरचित रिफाइनेंस मैकेनिज्म स्थापित करने से ग्रामीण और अर्ध-शहरी उद्यमियों को निरंतर और किफायती ऋण मिल सकेगा।”

भारत में इस समय लगभग 6.3 करोड़ एमएसएमई हैं, जो देश के जीडीपी का करीब 30 प्रतिशत, निर्यात का लगभग 45 प्रतिशत योगदान देते हैं और 11 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार प्रदान करते हैं।

एमएसएमई क्रेडिट आउटस्टैंडिंग अब ₹25 लाख करोड़ से अधिक हो चुकी है, जिसमें 10–12 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर्ज की जा रही है। इसके बावजूद ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में क्रेडिट पैठ अब भी असमान है।

एनबीएफसी कुल एमएसएमई क्रेडिट का 20–25 प्रतिशत और गैर-मेट्रो बाजारों में पहली बार और अनौपचारिक उधारकर्ताओं को दिए जाने वाले ऋण का 30–40 प्रतिशत हिस्सा प्रदान कर रही हैं। Mavenark रिपोर्ट के अनुसार, एमएसएमई क्रेडिट गैप अब भी ₹20–25 लाख करोड़ के स्तर पर बना हुआ है।

अग्रवाल ने आगे कहा,“रिकवरी मैकेनिज्म को लेकर स्पष्ट नीति और सरल अनुपालन नियम भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं, ताकि उधारकर्ताओं पर अतिरिक्त दबाव डाले बिना ऋण गति बनी रहे। बैंकों के समान नियामक और टैक्स समानता (parity) मिलने से एनबीएफसी जमीनी स्तर पर पूंजी का अधिक प्रभावी उपयोग कर सकेंगी। बजट 2026 को ग्रामीण और अर्ध-शहरी भारत की विकास गाथा में एनबीएफसी की प्रणालीगत भूमिका को स्वीकार करना चाहिए और उसे और सशक्त बनाना चाहिए।”

रिटेल क्रेडिट से जुड़ी अपेक्षाएं

रिटेल स्तर पर, अनसिक्योर्ड लोन और क्रेडिट कार्ड के तेज़ विस्तार ने उपभोक्ता क्रेडिट स्वास्थ्य को लेकर बहस छेड़ दी है। वैश्विक मानकों की तुलना में भारत का डेब्ट-टू-जीडीपी अनुपात अभी भी मध्यम है, लेकिन पहली बार ऋण लेने वालों में डिफॉल्ट का जोखिम बढ़ रहा है।

आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार, रिटेल क्रेडिट में 15–18 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि हो रही है, जिसमें पर्सनल लोन और क्रेडिट कार्ड सबसे तेज़ी से बढ़ने वाले सेगमेंट हैं। पिछले तीन वर्षों में नए रिटेल उधारकर्ताओं में से लगभग 50 प्रतिशत पहली बार औपचारिक क्रेडिट सिस्टम से जुड़े हैं, जिनमें से कई को ब्याज की गणना या क्रेडिट स्कोर की पूरी समझ नहीं है।

आरबीआई ने हाल के क्वार्टरों में छोटे टिकट अनसिक्योर्ड लोन से जुड़े शुरुआती तनाव को देखते हुए रिस्क-वेट नॉर्म्स कड़े किए हैं।

बिलकट (BillCut) के सह-संस्थापक तनिश शर्मा ने कहा,“ऋण और क्रेडिट कार्ड पर बढ़ती निर्भरता यह दर्शाती है कि देश में उपभोक्ता क्रेडिट जागरूकता, पारदर्शी और निष्पक्ष ब्याज संरचना, तथा रीफाइनेंसिंग या कंसोलिडेशन जैसे विकल्पों की सख्त जरूरत है, जिससे उधारकर्ता अपने रिपेमेंट को बेहतर ढंग से प्रबंधित कर सकें।

ब्याज पर टैक्स लाभ जैसे प्रोत्साहन और बड़े पैमाने पर वित्तीय साक्षरता अभियानों से लोगों को उच्च ब्याज वाले कर्ज के चक्र से बाहर निकालने में मदद मिलेगी। क्रेडिट स्कोर को लेकर जागरूकता बढ़ाना समय की मांग है।”

इनोवेशन और डीप-टेक को सपोर्ट

क्रेडिट और रिटेल से आगे, इनोवेशन-आधारित सेक्टर्स, खासकर डीप-टेक, भी निरंतर और गहरे नीतिगत समर्थन की अपेक्षा कर रहे हैं।

हालांकि बजट 2025 में आरएंडडी और प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव्स (PLI) के लिए आवंटन बनाए रखा गया था, लेकिन डीप-टेक स्टार्टअप्स को लंबे समय तक विकास चक्र का सामना करना पड़ता है।

आज डीप-टेक स्टार्टअप्स कुल शुरुआती चरण की फंडिंग का 20–25 प्रतिशत हिस्सा हैं, जो पांच साल पहले लो-डबल डिजिट में थे। भारत में अब 3,500 से अधिक डीप-टेक स्टार्टअप्स हैं, जो क्लाइमेट टेक, एडवांस्ड मटीरियल्स, स्पेस, डिफेंस और इंडस्ट्रियल सिस्टम्स जैसे क्षेत्रों में काम कर रहे हैं।

जहां सॉफ्टवेयर स्टार्टअप्स को आमतौर पर 2–3 साल में कमर्शियलाइजेशन मिल जाता है, वहीं डीप-टेक कंपनियों को अक्सर 5–8 साल लग जाते हैं।

कैपिटल-ए (Capital-A) के संस्थापक और लीड इन्वेस्टर अंकित केडिया ने कहा,“डीप-टेक, एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग, क्लाइमेट सिस्टम्स और इंडस्ट्रियल इनोवेशन के संस्थापक पहले से कहीं अधिक तकनीकी गहराई, महत्वाकांक्षा और वैश्विक प्रासंगिकता के साथ निर्माण कर रहे हैं। पूंजी और प्रतिभा का संगम हो रहा है और शुरुआती वैलिडेशन अब केवल सॉफ्टवेयर मॉडल्स तक सीमित नहीं है।”

उन्होंने आगे कहा,“अब ध्यान देने की ज़रूरत एक्जीक्यूशन लेयर पर है। डीप-टेक और मैन्युफैक्चरिंग बिज़नेस को स्केल करने के लिए लंबे डेवलपमेंट साइकिल की आवश्यकता होती है—जिसमें सर्टिफिकेशन, वैलिडेशन, लंबे पायलट और शुरुआती डिप्लॉयमेंट शामिल हैं, खासकर उन सेक्टर्स में जहां भरोसा, सुरक्षा और विश्वसनीयता अहम होती है।

यहीं भारत को बढ़त मिलती है। राष्ट्रीय स्तर की मांग, मिशन-आधारित सरकारी खरीद और लागत अनुशासन का संयोजन घरेलू कंपनियों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी सप्लायर बनने में मदद कर सकता है।”

इस गति को स्थायी परिणामों में बदलने के लिए, बजट 2026 में साझा टेस्टिंग और सर्टिफिकेशन इंफ्रास्ट्रक्चर, पूर्वानुमेय नियामक ढांचा, और लंबे विकास चक्र के अनुरूप प्रोत्साहन को मजबूत करना आवश्यक होगा।

 

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