ईवी ग्रोथ की असली चाबी: फाइनेंसिंग इकोसिस्टम

ईवी ग्रोथ की असली चाबी: फाइनेंसिंग इकोसिस्टम

ईवी ग्रोथ की असली चाबी: फाइनेंसिंग इकोसिस्टम
भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों की तकनीक बेहतर हो गई है, लेकिन लोग उन्हें खरीदने में फाइनेंस की दिक्कत महसूस कर रहे हैं। जब तक लोन और किस्तें आसान और सस्ती नहीं होंगी, ईवी आम लोगों की पहली पसंद नहीं बन पाएंगी।

बढ़ती डिस्पोज़ेबल आय, वायु प्रदूषण की गंभीर होती समस्या और टिकाऊ समाधानों की ओर झुकता उपभोक्ता रुझान भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) को लेकर नई कहानी गढ़ रहे हैं। आज हर तीन में से एक संभावित खरीदार अपनी अगली गाड़ी के तौर पर ईवी पर विचार कर रहा है। तकनीक, बैटरी एफिशिएंसी, रेंज और फास्ट चार्जिंग जैसी इंजीनियरिंग चुनौतियां काफी हद तक सुलझ चुकी हैं, लेकिन बड़े पैमाने पर ईवी अपनाने में सबसे बड़ी रुकावट अब भी बनी हुई है—फाइनेंसिंग।

सरल शब्दों में कहें तो भारत का ईवी भविष्य सिर्फ लैब में होने वाले इनोवेशन पर नहीं, बल्कि क्रेडिट इनोवेशन पर भी निर्भर करता है। जब तक ईवी फाइनेंसिंग सुलभ, किफायती और जोखिम-समायोजित नहीं होती, तब तक ईवी आम परिवहन का साधन बनने की बजाय एक आकांक्षात्मक खरीद ही बने रहेंगे।

उद्योग विशेषज्ञों के मुताबिक, आज ईवी के सामने प्रदर्शन से जुड़ी धारणा की समस्या नहीं, बल्कि वित्तीय प्रतिरोध सबसे बड़ी चुनौती है। ऊंची शुरुआती लागत, खासकर ई-टू व्हीलर (e2W) और ई-थ्री व्हीलर (e3W) जैसे कोर सेगमेंट्स में सीमित क्रेडिट एक्सेस और बैंकों व एनबीएफसी की सतर्क लेंडिंग नीति ईवी पैठ को धीमा कर रही है। भले ही दो-तिहाई ईवी खरीदार आज भी लोन के जरिए वाहन खरीदते हों, लेकिन ऐतिहासिक डेटा की कमी, एसेट लाइफ को लेकर अनिश्चितता और मानकीकृत वैल्यूएशन के अभाव में ईवी लोन अब भी आईसीई वाहनों की तुलना में जोखिम भरे माने जाते हैं। नतीजतन, ब्याज दरें अधिक, लोन-टू-वैल्यू (LTV) कम और पात्रता मानदंड सख्त रहते हैं।

यही कारण है कि जहां फाइनेंसिंग मजबूत है—जैसे ई-रिक्शा और कमर्शियल e3W सेगमेंट—वहां ईवी अपनाने की दर तेज़ है, जबकि 2W और छोटे कमर्शियल फ्लीट्स में यह रफ्तार थमती दिखती है। इस संदर्भ में फाइनेंस को ईवी ग्रोथ का इंजन कहा जा सकता है।

एक और बड़ी चुनौती बैटरी लागत है, जो कुल ईवी कीमत का 40–50% तक होती है। पारंपरिक ऑटो लोन ईवी को एक ही एसेट मानते हैं, जबकि बैटरी के लिए अलग फाइनेंसिंग मॉडल की जरूरत है। यहीं बैटरी लीज़िंग और यूज़-आधारित भुगतान जैसे इनोवेटिव फाइनेंसिंग समाधानों की संभावना बनती है।

आंकड़ों पर नज़र डालें तो भारत में ईवी पैठ अभी भी सिंगल डिजिट में है। वित्त वर्ष 2025-26 की दूसरी तिमाही में ईवी की हिस्सेदारी कुल ऑटो बिक्री में 8% रही, जिसमें तीन लाख से ज्यादा e2W और e3W की अहम भूमिका रही। अक्टूबर 2025 में e2W रजिस्ट्रेशन 1.4 लाख यूनिट के पार गया, जबकि e3W बिक्री 65,000 यूनिट से अधिक रही। इससे साफ है कि आने वाले दशक में यही सेगमेंट ईवी ग्रोथ के मुख्य चालक रहेंगे।

विशेषज्ञों का मानना है कि मास अडॉप्शन के लिए भारत को ईवी लीज़िंग, पे-पर-किलोमीटर और सब्सक्रिप्शन जैसे मॉडल्स को बढ़ावा देना होगा। साथ ही फाइनेंसिंग को पूरे ईवी वैल्यू चेन तक फैलाने की जरूरत है—चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, बैटरी स्वैपिंग, कंपोनेंट सप्लायर्स और बैटरी रीसाइक्लिंग तक। इसके लिए लंबी अवधि के प्रोजेक्ट फाइनेंस, वर्किंग कैपिटल स्ट्रक्चर और भरोसेमंद क्रेडिट लाइनों की आवश्यकता होगी।

पॉलिसी स्तर पर सेकेंडरी यूज़्ड-ईवी मार्केट का विकास भी जरूरी माना जा रहा है। बैटरी हेल्थ सर्टिफिकेशन, मानकीकृत वैल्यूएशन और रिसेल बेंचमार्क्स से बैंकों का जोखिम घटेगा, क्रेडिट फ्लो बढ़ेगा और रीसाइक्लिंग व लोकलाइजेशन को भी बढ़ावा मिलेगा।

ग्रीन फाइनेंस और ईएसजी-कैपिटल भारत के लिए बड़ा अवसर पेश कर रहे हैं। ग्रीन बॉन्ड्स, सस्टेनेबिलिटी-लिंक्ड लोन और ब्लेंडेड फाइनेंस जैसे इंस्ट्रूमेंट्स के जरिए कम लागत पर पूंजी उपलब्ध कराई जा सकती है, जिससे ईवी, बैटरी, चार्जिंग एसेट्स और फ्लीट ऑपरेटर्स के लिए फाइनेंस सस्ता होगा।

चीन, अमेरिका और यूरोप जैसे देशों ने बैटरी लीज़िंग, रेसिडुअल वैल्यू गारंटी और मजबूत सेकेंडरी मार्केट के जरिए ईवी अपनाने को तेज़ किया है। भारत के लिए चुनौती इन मॉडलों को सीधे अपनाने की नहीं, बल्कि उन्हें भारतीय संदर्भ—जहां e2W और e3W का दबदबा है और अफोर्डेबिलिटी अहम है—के अनुरूप ढालने की है। सही फाइनेंसिंग ढांचा तैयार कर भारत बिना भारी सब्सिडी के भी ईवी अपनाने की रफ्तार को नई ऊंचाई दे सकता है।

(विकास सिंह ग्रीव्स इलेक्ट्रिक मोबिलिटी के मैनेजिंग डायरेक्टर है। यह उनके निजी विचार है।)

 

 

Subscribe Newsletter
Submit your email address to receive the latest updates on news & host of opportunities