एडटेक प्लेटफॉर्म इस बात पर पुनर्विचार कर रहे हैं कि शिक्षार्थी उनके उत्पाद इकोसिस्टम में कैसे प्रवेश करते हैं और आगे बढ़ते हैं। अब, माइक्रो-लर्निंग कोर्स को केवल एडिशनल मटेरियल के रूप में नहीं बनाया जा रहा है। कई एडटेक प्लेटफॉर्म के लिए ये एक मुख्य उत्पाद परत बन रहे हैं, जिन्हें प्रवेश बाधाओं को कम करने, उपयोगकर्ता के निर्णय लेने की प्रक्रिया को तेज करने और उच्च-मूल्य वाले कार्यक्रमों तक पहुंचने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
आमतौर पर छोटे मॉड्यूलर प्रारूपों में उपलब्ध कराए जाने वाले और फुल लेंथ कोर्स की तुलना में बहुत कम कीमत पर, माइक्रो-लर्निंग पाठ्यक्रम विशिष्ट कौशल या परिणामों पर ध्यान केंद्रित करते हैं जिन्हें शिक्षार्थी तुरंत लागू कर सकते हैं, जबकि प्लेटफार्मों को सीखने की यात्रा के शुरुआती चरण में ही रुचि का मुद्रीकरण करने की अनुमति मिलती है।
उद्योग जगत के अनुमानों के अनुसार भारत का सूक्ष्म-शिक्षा बाजार वार्षिक रेवेन्यू में 300 से 400 मिलियन अमेरिकी डॉलर का है, जो सालाना 20 से 30 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है। वैश्विक स्तर पर, सूक्ष्म-शिक्षा बाजार 2025 में 1.8 बिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 2035 तक 6.2 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है, जो 13.5 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर (सीएजीआर) को दर्शाता है। यह वृद्धि संक्षिप्त, परिणाम-उन्मुख शिक्षण में निरंतर रुचि को दर्शाती है।
शुल्क सहित शिक्षा में प्रवेश करने का आसान और सरल तरीका
एडटेक के फाउंडर्स के लिए माइक्रो-लर्निंग एक व्यावसायिक हथियार के रूप में उभर कर सामने आया है। कम लागत वाले छोटे पाठ्यक्रम, लंबे कार्यक्रमों से जुड़ी भारी लागतों के बिना, उपयोगकर्ताओं को सशुल्क शिक्षा की ओर आकर्षित करने का एक सरल तरीका प्रदान करते हैं।
सिंपलीलर्न के फाउंडर और सीईओ कृष्णा कुमार कहते हैं "माइक्रो-लर्निंग हमें छोटे स्तर के पाठ्यक्रमों के साथ काम करने, विश्वसनीयता बनाने और शिक्षार्थियों को दीर्घकालिक कार्यक्रमों का पता लगाने के लिए एक मंच प्रदान करने की अनुमति देता है। ये प्रारूप प्रवेश की बाधा को कम करते हैं और शिक्षार्थियों को जल्द ही लाभ का अनुभव करने और समय के साथ दीर्घकालिक कार्यक्रमों की ओर बढ़ने में सक्षम बनाकर हमारे मंच को व्यापक बनाने में मदद करते हैं।"
उद्योग जगत में माइक्रो-लर्निंग मॉड्यूल की कीमत मात्र 49 रुपये से 199 रुपये तक है, जो हजारों रुपये तक के पारंपरिक पाठ्यक्रमों से बिलकुल अलग है। इस तरह की 'छोटे मॉड्यूल' वाली मूल्य निर्धारण प्रणाली से प्लेटफॉर्म को सीखने वालों की जिज्ञासा को भुनाने में मदद मिलती है, जैसे कि कार्यस्थल पर कोई नया उपकरण सीखना, किसी नियामक अपडेट को समझना या कोई विशिष्ट कौशल हासिल करना और इसके लिए उन्हें किसी बड़ी राशि की आवश्यकता नहीं होती।
इमार्टिकस लर्निंग में माइक्रो-लर्निंग युवा शिक्षार्थियों के लिए एक रणनीतिक प्रवेश द्वार बन गया है। इमार्टिकस लर्निंग के फाउंडर और सीईओ निखिल बरशिकर कहते हैं "माइक्रो-लर्निंग पहले से ही हमारे व्यापक शिक्षण इकोसिस्टम का हिस्सा है। हमारे किकस्टार्टर कार्यक्रम के माध्यम से हमने 500 कॉलेजों में तीन लाख से अधिक पंजीकरण देखे हैं, जिनकी पूर्णता दर सामान्य एमओओसी की तुलना में लगभग दस गुना अधिक है। यह दर्शाता है कि छात्र उच्च-गुणवत्ता वाली सामग्री को महत्व देते हैं जिसे वे बिना किसी दबाव के जल्दी से पूरा कर सकते हैं।"
शुल्क सहित पाठ्यक्रमों का परीक्षण
इस बदलाव का एक प्रमुख कारण यह है कि उद्योग अब केवल सहभागिता मापदंडों के बजाय भुगतान करने की तत्परता पर अधिक ध्यान केंद्रित कर रहा है। फाउंडर्स का कहना है कि छोटे भुगतान भी शिक्षार्थी के व्यवहार में महत्वपूर्ण परिवर्तन लाते हैं।
ब्राइटचैम्प्स के फाउंडर और सीईओ रवि भूषण कहते हैं "जब कंटेंट की कीमत कम और सुलभ होती है, तो लोग सोच-समझकर उसका इस्तेमाल करते हैं। परिवार स्पष्ट इरादे से जुड़ते हैं, ज़्यादा कीमत देकर मॉड्यूल पूरे करते हैं और नियमित रूप से वापस आते हैं। चुनाव करना और भुगतान करना, भले ही वह मामूली रकम हो, अक्सर प्रतिबद्धता और एकाग्रता का संकेत देता है।"
यह माइक्रो-लर्निंग पायलट प्रोजेक्ट से सामने आ रहे व्यापक सहभागिता डेटा के अनुरूप है। उद्योग की रिपोर्टों से पता चलता है कि उपयोगकर्ता माइक्रो-लर्निंग प्लेटफॉर्म पर प्रतिदिन औसतन 10-12 मिनट बिताते हैं और अक्सर एक सत्र में कई छोटे वीडियो देखते हैं। यह एक बार के प्रयोग के बजाय आदत निर्माण का प्रारंभिक संकेत है।
सिंपलीलर्न में व्यावसायिक दृष्टिकोण केवल कीमत तक सीमित नहीं है। कुमार कहते हैं "कई शिक्षार्थियों के लिए प्रभाव और प्रासंगिकता केवल कीमत से कहीं अधिक मायने रखती है।" वे आगे कहते हैं "भुगतान करने वाले शिक्षार्थी आमतौर पर एक निश्चित उद्देश्य के साथ आते हैं और इसलिए, उनके पाठ्यक्रम पूरा करने की संभावना अधिक होती है।"
रेवेन्यू से परे सफलता का मापन
हालांकि कम कीमत के कारण प्रति कोर्स मुनाफा स्वाभाविक रूप से सीमित हो जाता है, लेकिन एडटेक कंपनियां यह स्पष्ट करती हैं कि माइक्रो-लर्निंग का मूल्यांकन केवल रेवेन्यू के आधार पर नहीं किया जाता है। इसके बजाय, सफलता को कोर्स पूरा करने की दर, बार-बार भागीदारी और गहन कार्यक्रमों में आगे बढ़ने के आधार पर मापा जाता है। इस संदर्भ में बार्शिकर कहते हैं "हम मात्रा से अधिक प्रभाव पर ध्यान केंद्रित करते हैं। एक लघु-प्रारूप पाठ्यक्रम तब सफल होता है जब यह शिक्षार्थी को स्पष्ट कैरियर विकल्प या मापने योग्य कौशल परिणाम के करीब पहुंचने में मदद करता है।"
ब्राइटचैम्प्स भी इसी सिद्धांत का पालन करता है। भूषण कहते हैं " शॉर्ट फॉर्मेट कोर्सेस का असली मूल्य छात्रों की सहभागिता बढ़ाने, सीखने की आदतों को मजबूत करने और परिवारों के साथ दीर्घकालिक संबंध बनाने में निहित है, जिससे एक अधिक मजबूत व्यावसायिक मॉडल बनता है।
AI से लेकर स्थानीय भाषा में सीखने तक
विषयवस्तु की प्रासंगिकता और बदलाव की गति, दोनों ही सूक्ष्म-शिक्षा की मांग को बढ़ा रहे हैं, विशेष रूप से एआई, साइबर सुरक्षा और डेटा जैसे क्षेत्रों में। सिंपलीलर्न के सबसे लोकप्रिय शॉर्ट-टर्म कोर्स आज जनरेटिव एआई और एप्लाइड एआई के उपयोग के मामलों पर केंद्रित हैं, जो करियर के विभिन्न चरणों और भौगोलिक क्षेत्रों के शिक्षार्थियों को आकर्षित करते हैं।
कुमार कहते हैं "अमेरिका, मध्य पूर्व और भारत में माइक्रो-क्रेडेंशियल की मांग तेजी से बढ़ रही है। वास्तव में, वरिष्ठ पेशेवरों की ओर से भी इसमें बढ़ती रुचि देखी जा रही है, क्योंकि यह प्रारूप उनकी केंद्रित, लक्षित शिक्षा की आवश्यकता को पूरा करता है जिसे तुरंत लागू किया जा सकता है।" इसलिए पहुंच को और व्यापक बनाने के लिए प्लेटफ़ॉर्म क्षेत्रीय भाषा संस्करणों और उद्यम-केंद्रित तैनाती के साथ भी प्रयोग कर रहे हैं।
क्या यह एक स्वतंत्र रेवेन्यू है?
भविष्य को देखते हुए फाउंडर मोटे तौर पर इस बात से सहमत हैं कि माइक्रो-लर्निंग दोहरी भूमिका निभाएगी: एक प्रवेश बिंदु के रूप में और तेजी से, उच्च मांग वाले क्षेत्रों में एक सार्थक स्वतंत्र पेशकश के रूप में। इस संदर्भ में कुमार का कहना है "तेजी से हो रहे तकनीकी विकास के साथ, त्वरित और संक्षिप्त सामग्री की मांग बढ़ रही है।" उन्होंने आगे कहा कि “सिंपलीलर्न के एआई पोर्टफोलियो का 30-40 प्रतिशत हिस्सा अंततः माइक्रो-क्रेडेंशियल प्रारूपों के माध्यम से वितरित किया जा सकता है।“
बरशीकर भी इस विचार से सहमत हैं। वे कहते हैं "माइक्रो-लर्निंग निश्चित रूप से एक स्वतंत्र विकल्प के रूप में योगदान देगी, खासकर उन शुरुआती और वरिष्ठ पेशेवरों के लिए जो अपने कौशल को तेजी से उन्नत करना चाहते हैं।" यह देखा जा सकता है कि जैसे-जैसे भारत का एडटेक बाजार अपने अगले चरण में प्रवेश कर रहा है, माइक्रो-लर्निंग इस बात का संकेत दे रहा है कि प्लेटफॉर्म कैसे बनाए जाते हैं, इसमें बदलाव आ रहा है, जो आकार और अवधि के बजाय गति, प्रासंगिकता और बार-बार मुद्रीकरण पर अधिक केंद्रित है।