इसकी शुरुआत उससे कई साल पहले स्कूलों, घरों और सीखने के माहौल में होती है, जहां बच्चे पहली बार टेक्नोलॉजी के जरिए जिज्ञासा, रचनात्मकता और प्रॉब्लम-सॉल्विंग स्किल्स विकसित करते हैं।
स्कूल छात्रों के साथ काम करने वाले विशेषज्ञों का मानना है कि आज भारत के इनोवेशन इकोसिस्टम में योगदान देने वाले कई युवा कॉलेज तक इंतजार नहीं कर रहे हैं। कुछ छात्र स्कूल में पढ़ाई के दौरान ही कोडिंग, ऐप डेवलपमेंट, ऑटोमेशन और एआई जैसे क्षेत्रों में प्रयोग कर रहे हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि बच्चे इनोवेशन करने में सक्षम हैं या नहीं, बल्कि यह है कि क्या देशभर के सभी छात्रों तक सही समय पर सही अवसर पहुंच पा रहे हैं।
भारत में डिजिटल लर्निंग गैप अभी भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। यूडीआईएसई+ 2024-25 के आंकड़ों के अनुसार, देश के लगभग 64.7 प्रतिशत स्कूलों में कंप्यूटर उपलब्ध हैं, जबकि 63.5 प्रतिशत स्कूलों में इंटरनेट सुविधा है। हालांकि राज्यों के बीच बड़ा अंतर देखने को मिलता है। केरल के 99 प्रतिशत से अधिक स्कूलों में फंक्शनल कंप्यूटर्स हैं, जबकि बिहार के कई सरकारी स्कूलों में इंटरनेट सुविधा अब भी 10 प्रतिशत से कम है।
शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, यह अंतर सीधे तौर पर छात्रों में कम्प्यूटेशनल थिंकिंग के विकास को प्रभावित करता है। कोडिंग और डिजिटल प्रॉब्लम-सॉल्विंग की शुरुआती शिक्षा केवल तकनीकी कौशल नहीं सिखाती, बल्कि बच्चों को समस्याओं को छोटे हिस्सों में बांटकर समझना, समाधान तैयार करना, प्रयोग करना और तार्किक तरीके से सोचना भी सिखाती है। ये क्षमताएं आगे चलकर उनके अकादमिक और पेशेवर जीवन में भी मदद करती हैं।
आज जिन छात्रों को इनोवेशन करते हुए देखा जा रहा है, उनमें से अधिकांश को कम उम्र में ही कोडिंग और टेक्नोलॉजी की स्ट्रक्चर्ड लर्निंग मिली थी। विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल प्रतिभा का मामला नहीं है, बल्कि सही अवसर मिलने का परिणाम है। जब बच्चों को सही गाइडेंस, टूल्स और लर्निंग एनवायरनमेंट मिलता है, तो वे नई चीजें बनाने और समस्याओं के समाधान खोजने में अधिक रुचि दिखाते हैं।
कई युवा छात्र पहले ही रियल-वर्ल्ड सॉल्यूशंस तैयार कर रहे हैं। नोएडा के छात्र आर्यन शर्मा ने पाइथन और हार्डवेयर इंटीग्रेशन की मदद से एक फंक्शनल होम असिस्टेंट सिस्टम बनाया। इस प्रोजेक्ट में उन्हें सॉफ्टवेयर और फिजिकल डिवाइसेस दोनों के साथ काम करना पड़ा, जो आमतौर पर छात्रों को हायर एजुकेशन में जाकर सिखाया जाता है।
इसी तरह फरीदाबाद के छात्र हयान ने अलग-अलग वेब प्लेटफॉर्म्स के बीच बार-बार स्विच करने की समस्या को देखते हुए एक वेब व्यूअर ऐप तैयार किया। उन्होंने केवल कोडिंग पर नहीं, बल्कि यूजर एक्सपीरियंस और प्रैक्टिकल प्रॉब्लम सॉल्विंग पर भी ध्यान दिया।
पुणे के आरव ने चार साल की उम्र में कोडिंग सीखने में रुचि दिखानी शुरू की और दस साल की उम्र तक फंक्शनल वेबसाइट्स बनाना सीख लिया। उनकी कहानी यह दिखाती है कि यदि बच्चों की शुरुआती जिज्ञासा को सही दिशा और समय मिले, तो उनकी स्किल्स धीरे-धीरे काफी मजबूत हो सकती हैं।
बेंगलुरु के छात्र प्रज्वल एनएच (Prajwal NH) ने लोगों द्वारा पढ़ी जाने वाली खबरों और उनकी वास्तविक रुचियों के बीच के अंतर को समझते हुए “न्यूज़सर” नाम का पर्सनलाइज्ड न्यूज ऐप बनाया। यह ऐप यूजर्स को अपनी पसंद के अनुसार न्यूज फीड तैयार करने की सुविधा देता है। बाद में उन्होंने स्कूल की पढ़ाई के दौरान ही एक क्लाउड कंप्यूटिंग कंपनी की सह-स्थापना भी की।
विशेषज्ञों का मानना है कि ये छात्र किसी असाधारण अपवाद की तरह नहीं हैं, बल्कि यह इस बात का उदाहरण हैं कि सही उम्र में कोडिंग एजुकेशन मिलने पर बच्चे टेक्नोलॉजी के केवल कंज्यूमर नहीं, बल्कि क्रिएटर भी बन सकते हैं।
भारत की शिक्षा व्यवस्था भी अब इस दिशा में आगे बढ़ रही है। नेशनल एजुकेशन पॉलिसी (NEP) 2020 में शुरुआती कक्षाओं से कम्प्यूटेशनल थिंकिंग और डिजिटल लर्निंग को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया था। हाल ही में सीबीएसई ने 2026-27 से क्लास 3 से एआई और कोडिंग शुरू करने की योजना की घोषणा भी की है।
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि सबसे बड़ी चुनौती इम्प्लीमेंटेशन होगी। देशभर में मीनिंगफुल कोडिंग एजुकेशन देने के लिए प्रशिक्षित शिक्षकों, मजबूत डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, बेहतर करिकुलम और दीर्घकालिक निवेश की आवश्यकता होगी। एडटेक प्लेटफॉर्म्स और सप्लीमेंट्री लर्निंग इंस्टीट्यूशंस फिलहाल इस अंतर को कुछ हद तक कम करने में मदद कर रहे हैं, लेकिन बड़े स्तर पर बदलाव के लिए मजबूत शिक्षा तंत्र जरूरी होगा।
Codingal के, को-फाउंडर और सीओओ सत्याम बरनवाल के अनुसार, अलग-अलग पृष्ठभूमि से आने वाले छात्र सही लर्निंग एनवायरनमेंट मिलने पर समान स्तर की जिज्ञासा और रचनात्मकता दिखाते हैं। उनके मुताबिक सबसे बड़ा अंतर टैलेंट नहीं, बल्कि क्वालिटी एजुकेशन, मेंटरशिप, डिजिटल टूल्स और एग्जाम प्रेशर से बाहर सीखने के अवसरों का होता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की अगली पीढ़ी के इनोवेटर्स अभी से देश के स्कूलों में तैयार हो रहे हैं। यदि कोडिंग, एआई और प्रॉब्लम-सॉल्विंग एजुकेशन को बड़े स्तर पर छात्रों तक पहुंचाया गया, तो यह भारत की भविष्य की इनोवेशन इकॉनमी को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
(लेखक: सत्याम बरनवाल, को-फाउंडर और सीओओ, Codingal, व्यक्त किए गए विचार निजी हैं)