अब तक के वैश्विक व्यापार में, इनलैंड लॉजिस्टिक्स यानी बंदरगाह से अंदरूनी इलाकों तक माल ले जाने की व्यवस्था में कई कमियां आम तौर पर स्वीकार कर ली गई थीं। अक्सर ऐसा होता है कि कंटेनर सामान पहुंचाने के बाद खाली लौट आते हैं और ट्रक माल उतारकर बिना लोड के वापस चले जाते हैं। इससे ईंधन, समय और पैसा तो खर्च होता है, लेकिन न तो सर्विस बेहतर होती है और न ही सिस्टम ज्यादा भरोसेमंद बनता है।
इनलैंड लॉजिस्टिक्स ऐसे पक्षों के बीच काम करता है जो अपने-अपने स्तर पर अनुकूलन करते हैं। आयातक डिलीवरी समय को प्राथमिकता देते हैं, निर्यातक बुकिंग की निश्चितता पर ध्यान देते हैं, ट्रांसपोर्टर फ्लीट उपयोगिता देखते हैं और शिपिंग लाइनें क्षेत्रीय कंटेनर संतुलन चाहती हैं। इन हितों के बीच समन्वय ऐतिहासिक रूप से सीमित रहा है और अक्षमता को बड़े पैमाने का अपरिहार्य परिणाम माना जाता रहा है। लेकिन जब यही अक्षमता लगातार ऑपरेटिंग मार्जिन और एसेट उपलब्धता पर असर डालने लगी, तो इसे स्वीकार करना कठिन हो गया।
जब अक्षमता ऑपरेशंस से फाइनेंस तक पहुंची
इस दशक की शुरुआत तक कई व्यापारिक गलियारों में इनलैंड लॉजिस्टिक्स की लागत, पोर्ट हैंडलिंग और ओशन फ्रेट से तेज़ी से बढ़ने लगी। आंकड़ों के अनुसार, उभरती अर्थव्यवस्थाओं में डोर-टू-डोर लॉजिस्टिक्स लागत का 50% से अधिक हिस्सा इनलैंड ट्रांसपोर्ट से जुड़ा होता है, जिसमें खाली या कम उपयोग वाले मूवमेंट की बड़ी भूमिका होती है। इसी दौरान ईंधन की कीमतों में उतार-चढ़ाव और कड़े उत्सर्जन मानकों ने ट्रांसपोर्ट ऑपरेटर्स की लागत संवेदनशीलता बढ़ा दी।
कंटेनर असंतुलन ने समस्या को और गंभीर किया। निर्यात के पीक समय में, पोर्ट पर पर्याप्त कंटेनर उपलब्ध होने के बावजूद इनलैंड क्षेत्रों में उनकी कमी दिखाई देने लगी। शिपिंग लाइनों ने महंगे और अनिश्चित री-पोजिशनिंग के जरिए इसका समाधान किया। जब ये दबाव बार-बार होने वाली लागत के रूप में फाइनेंशियल प्लानिंग में दिखने लगे, तो अक्षमता को संरचनात्मक मानकर स्वीकार करना मुश्किल हो गया। यहीं से वैकल्पिक ऑपरेटिंग मॉडल्स पर गंभीरता से विचार शुरू हुआ।
इनलैंड चुनौतियों का समाधान: सर्कुलर लॉजिस्टिक्स
सर्कुलर लॉजिस्टिक्स को गति इसलिए मिली क्योंकि यह सीधे इनलैंड समस्या को संबोधित करता है। ट्रेड रूट या शिपिंग शेड्यूल बदलने के बजाय, इसका ध्यान इस बात पर है कि इनलैंड नेटवर्क में प्रवेश के बाद एसेट्स को कैसे क्रमबद्ध किया जाए। मूल सिद्धांत सरल है—कंटेनर और वाहन सिस्टम के किनारे लौटने से पहले जितने संभव हों उतने उत्पादक चक्र पूरे करें।
व्यवहार में इसका मतलब था कि कंटेनरों को उनके डिस्चार्ज पॉइंट के पास ही दोबारा उपयोग में लाया जाए, आयात और निर्यात मूवमेंट को एक ही भौगोलिक क्षेत्र में जोड़ा जाए और अनावश्यक री-पोजिशनिंग घटाई जाए। जहां पर्याप्त वॉल्यूम था, वहां इसके फायदे तुरंत दिखे—टर्नअराउंड टाइम कम हुआ, प्रभावी कंटेनर सप्लाई बढ़ी और पोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर पर दबाव घटा। सर्कुलर मूवमेंट अब अनौपचारिक तालमेल पर निर्भर नहीं रहा, बल्कि योजनाबद्ध लॉजिस्टिक्स निष्पादन का हिस्सा बन गया।
डिजिटल तालमेल ने सोच को हकीकत बना दिया
सर्कुलर लॉजिस्टिक्स का विस्तार डिजिटल कोऑर्डिनेशन के बिना संभव नहीं था। लंबे समय तक इनलैंड लॉजिस्टिक्स बिखरी हुई जानकारी पर निर्भर रहा, जहां कंटेनर लोकेशन, बुकिंग डिमांड और यार्ड क्षमता की स्पष्ट जानकारी नहीं होती थी। डेटा इंटीग्रेशन बेहतर होने के साथ, री-यूज़ के फैसले व्यवस्थित रूप से लिए जाने लगे। रियल-टाइम मैचिंग ने अनौपचारिक सीक्वेंसिंग की जगह ले ली। डिजिटल डॉक्यूमेंटेशन और मानकीकृत इंस्पेक्शन प्रक्रियाओं ने हैंडओवर में होने वाली देरी कम कर दी।
McKinsey के अनुसार, डिजिटल समन्वय के जरिए एसेट उपयोगिता बढ़ाने और खाली मूवमेंट घटाने से घने ट्रेड कॉरिडोर में इनलैंड लॉजिस्टिक्स लागत 10% से 15% तक कम हो सकती है। जैसे-जैसे भरोसा बढ़ा, सर्कुलर लॉजिस्टिक्स अपवाद से निकलकर नियमित योजना का हिस्सा बन गया।
इंफ्रास्ट्रक्चर ने अपनाया नया ऑपरेटिंग लॉजिक
डिजिटल सिस्टम के साथ-साथ भौतिक इंफ्रास्ट्रक्चर भी बदला। मैन्युफैक्चरिंग क्लस्टर्स के पास इनलैंड यार्ड विकसित या पुनः उपयोग में लाए गए, जहां इंस्पेक्शन, स्टोरेज और डॉक्यूमेंटेशन किया जा सके। इससे पोर्ट-साइड वैलिडेशन पर निर्भरता घटी और मूवमेंट लूप छोटे हुए। कंटेनरों को दोबारा उपयोग के लिए पोर्ट लौटने की जरूरत नहीं रही, जिससे ड्वेल टाइम घटा और उत्पादक चक्र बढ़े। समय के साथ ये सुविधाएं इनलैंड नेटवर्क के प्रमुख नोड बन गईं।
इलेक्ट्रिफिकेशन ने सर्कुलर मॉडल को और मजबूत किया
वर्ष 2025 में इलेक्ट्रिक ट्रकों के विस्तार ने सर्कुलर लॉजिस्टिक्स की अर्थव्यवस्था को और मजबूत किया। IEA के अनुसार, शॉर्ट और मीडियम-हॉल रूट्स पर इलेक्ट्रिक ट्रक तेजी से व्यवहार्य हो रहे हैं—और यही वे रूट्स हैं जहां सर्कुलर लॉजिस्टिक्स सबसे प्रभावी है। छोटे रूट और पूर्वानुमेय उपयोग पैटर्न इलेक्ट्रिक ऑपरेशंस के अनुकूल हैं। इससे ईंधन लागत और उत्सर्जन दोनों में कमी आई। कुल मिलाकर कम यात्राएं करनी पड़ीं और जो यात्राएं जरूरी थीं, उनका पर्यावरणीय प्रभाव भी घटा।
अनुमान की जगह माप ने ली
सस्टेनेबिलिटी रिपोर्टिंग में आए बदलाव ने भी इस मॉडल को गति दी। अब उत्सर्जन का हिसाब गतिविधि-आधारित होने लगा, जिससे खाली मूवमेंट और निष्क्रिय एसेट्स पर ध्यान गया। सर्कुलर लॉजिस्टिक्स ने कम दूरी, तेज़ टर्नअराउंड और बेहतर एसेट उपयोग जैसे सत्यापन योग्य डेटा दिए, जिन्हें ऑडिट किया जा सकता था। बढ़ती रिपोर्टिंग जरूरतों के बीच यह विश्वसनीयता खास बन गई।
2025 क्यों बना टर्निंग पॉइंट
वर्ष 2025 में दिखी रफ्तार कई कारकों के मेल का परिणाम थी—अक्षमता की वित्तीय स्पष्टता, डिजिटल स्केलिंग क्षमता, तेज़ चक्रों को सहारा देने वाला इंफ्रास्ट्रक्चर और वाहन तकनीक में प्रगति। सर्कुलर लॉजिस्टिक्स ने बिना पूरे सिस्टम को बदले लागत घटाने, भरोसेमंद संचालन और उत्सर्जन में कमी जैसे ठोस फायदे दिए।
जैसे-जैसे वैश्विक व्यापार बढ़ेगा, इनलैंड लॉजिस्टिक्स पर दबाव भी बढ़ेगा। जो मॉडल दोहराव कम करते हैं और एसेट उत्पादकता बढ़ाते हैं, वे लंबे समय तक प्रासंगिक रहेंगे। 2025 की प्रगति संकेत देती है कि सर्कुलर लॉजिस्टिक्स अब केवल दक्षता उपाय नहीं, बल्कि वैश्विक व्यापार की एक संरचनात्मक विशेषता बनता जा रहा है।
(ध्रुव तनेजा मैचलॉग सॉल्यूशंस के संस्थापक और वैश्विक सीईओ हैं। यह उनके निजी विचार है।)