भारत में लो-स्पीड इलेक्ट्रिक वाहनों के नियमों को लेकर Yulu Bikes Pvt. Ltd. ने सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) के हालिया ड्राफ्ट नोटिफिकेशन पर आपत्ति जताई है। कंपनी का कहना है कि अगर लो-स्पीड इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए मौजूदा वजन सीमा हटा दी जाती है, तो भारी और बिना रजिस्ट्रेशन वाले इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहनों के बाजार में आने का रास्ता खुल सकता है।
MoRTH ने 21 अगस्त को Central Motor Vehicles Rules (CMVR), 1989 के Rule 2(u) में बदलाव का प्रस्ताव रखा था। यह नियम उन कम गति वाले बैटरी चालित वाहनों को पारंपरिक मोटर वाहन की श्रेणी से बाहर रखने से जुड़ा है, जिनकी अधिकतम गति 25 किलोमीटर प्रति घंटा और मोटर पावर 0.6 kW (600 वाट) तक होती है। मौजूदा नियमों के तहत ऐसे वाहनों के लिए 60 किलोग्राम की अनलोडेड वजन सीमा भी निर्धारित थी। नए ड्राफ्ट में इस वजन सीमा को हटाने का प्रस्ताव है।
युलु ने MoRTH को औपचारिक आपत्ति भेजते हुए कहा है कि वजन सीमा हटाने से सड़क सुरक्षा पर असर पड़ सकता है और नियमों का पालन करने वाले घरेलू निर्माताओं को नुकसान हो सकता है। कंपनी के मुताबिक, इससे भारी इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहनों को लो-स्पीड श्रेणी में लाने की संभावना बढ़ सकती है, जबकि इन वाहनों पर सामान्य मोटर वाहनों की तरह रजिस्ट्रेशन, इंश्योरेंस, हेलमेट और ड्राइविंग लाइसेंस की अनिवार्यता नहीं होती।
युलु के को-फाउंडर और प्रेसिडेंट, ईकोसिस्टम पार्टनरशिप आरके मिश्रा (Ecosystem Partnerships RK Misra) के अनुसार, वाहन का वजन सड़क सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उन्होंने कहा कि समान गति पर भारी वाहन के टकराने से हल्के वाहन की तुलना में ज्यादा गंभीर प्रभाव हो सकता है। कंपनी का तर्क है कि 60 किलोग्राम की सीमा लो-स्पीड वाहनों के जोखिम को नियंत्रित करने के लिए एक भौतिक सुरक्षा सीमा के रूप में काम करती है।
कंपनी ने यह भी चिंता जताई है कि भारतीय ईवी बाजार में कुछ कम गति वाले आयातित इलेक्ट्रिक वाहनों में मोटर कंट्रोलर के साथ छेड़छाड़ की जा रही है। युलु के अनुसार, कुछ वाहन इलेक्ट्रॉनिक रूप से 25 किलोमीटर प्रति घंटा की गति तक सीमित दिखाई देते हैं, लेकिन स्विच या अन्य तरीकों से उनकी गति को 40-45 किलोमीटर प्रति घंटा तक बढ़ाया जा सकता है। कंपनी का कहना है कि वजन ऐसी चीज है जिसे सड़क पर आसानी से बदला या छिपाया नहीं जा सकता, जबकि सॉफ्टवेयर आधारित स्पीड लिमिट में बदलाव करना मुश्किल से पकड़ा जा सकता है।
युलु का कहना है कि वजन सीमा हटने से भारी फ्रेम, दो सीटों और बड़े कार्गो स्पेस वाले इलेक्ट्रिक वाहनों को लो-स्पीड कैटेगरी में लाने की संभावना बढ़ सकती है। कंपनी को डर है कि इससे बिना रजिस्ट्रेशन वाले वाहनों का इस्तेमाल बढ़ सकता है, जिससे सड़क सुरक्षा और बीमा व्यवस्था से जुड़े जोखिम पैदा हो सकते हैं।
इस मुद्दे का असर गिग और क्विक-कॉमर्स इकोसिस्टम पर भी पड़ सकता है। युलु के अनुसार, Swiggy, Zomato, Zepto और Blinkit जैसे प्लेटफॉर्म से जुड़े डिलीवरी वर्कर्स के बीच लो-स्पीड इलेक्ट्रिक वाहनों का इस्तेमाल बढ़ रहा है। कंपनी के मुताबिक, उसके पास 50,000 से अधिक लो-स्पीड इलेक्ट्रिक वाहनों का फ्लीट है और उसका माइक्रो-मोबिलिटी नेटवर्क करीब 1 लाख गिग वर्कर्स की आजीविका से जुड़ा हुआ है।
युलु अब इस मुद्दे को स्टार्टअप पॉलिसी फ़ोरम के माध्यम से सरकार के सामने उठाने की तैयारी कर रही है। कंपनी ने संकेत दिया है कि अगर अंतिम नियमों में सड़क सुरक्षा के लिए पर्याप्त भौतिक सुरक्षा उपाय शामिल नहीं किए गए, तो वह कानूनी विकल्पों पर भी विचार कर सकती है।
कंपनी ने MoRTH को अपने सुझावों में 60 किलोग्राम की मौजूदा वजन सीमा को बनाए रखने की मांग की है। साथ ही, आधुनिक बैटरी तकनीक के कारण वजन में मामूली बढ़ोतरी को देखते हुए सीमित टॉलरेंस देने का सुझाव दिया है। अगर सरकार वजन सीमा हटाने पर कायम रहती है, तो युलु ने सिंगल-सीट अनिवार्यता, लोड-कैरी करने की क्षमता पर सीमा और बिक्री के समय वाहनों की फिजिकल वेरिफिकेशन जैसे वैकल्पिक सुरक्षा उपाय लागू करने का सुझाव दिया है।
MoRTH के ड्राफ्ट पर आपत्तियां दर्ज कराने की 30 दिन की अवधि समाप्त होने के करीब है। ऐसे में ऑटोमोबाइल और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी सेक्टर की नजर अब सरकार के अंतिम फैसले पर है।