गांधीजी का शिक्षा दर्शन: शिक्षण से ही होगा समाजिक समस्याओं का समाधान

गांधीजी का शिक्षा दर्शन: शिक्षण से ही होगा समाजिक समस्याओं का समाधान

गांधीजी का शिक्षा दर्शन: शिक्षण से ही होगा समाजिक समस्याओं का समाधान
महात्मा गांधी की 'बुनियादी शिक्षा' का उद्देश्य बच्चों को मातृभाषा में, काम करते हुए सीखने की शिक्षा देना था। वे चाहते थे कि बच्चे कुशल, मेहनती और आत्मनिर्भर बनें।


आज राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 78वीं पुण्यतिथि है, उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर हम उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। गांधीजी ने अहिंसा, सत्य और सेवा के मार्ग पर चलकर न केवल भारत को स्वतंत्रता दिलाई, बल्कि हमें सत्य, नैतिकता और सामाजिक जिम्मेदारी का पाठ भी दिया। उनका आदर्श आज भी समाज और राष्ट्र के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

महात्मा गांधी की 'बुनियादी शिक्षा' का उद्देश्य बच्चों को मातृभाषा में, काम करते हुए सीखने की शिक्षा देना था। वे चाहते थे कि बच्चे कुशल, मेहनती और आत्मनिर्भर बनें। गांधीजी का मानना था कि शिक्षा को स्थानीय शिल्प से जोड़ना चाहिए, ताकि बच्चे का मानसिक, शारीरिक और नैतिक विकास हो सके। साथ ही वे समाज के लिए उपयोगी बनें और भारतीय संस्कृति से जुड़ें, जिससे सर्वांगीण विकास हो सके। महात्मा गांधी के ये विचार आज भी बेरोजगारी, गरीबी और सामाजिक समस्याओं के समाधान में उपयोगी हैं।

गांधीजी के शैक्षिक विचारों को विस्तार से जानें 

गांधीजी की बुनियादी शिक्षा उनके शिक्षा विचारों का व्यवहारिक रूप थी। इसका उद्देश्य बच्चों को अच्छे संस्कारों वाला, आत्मनिर्भर, जिम्मेदार और समाज के लिए उपयोगी नागरिक बनाना था। वे चाहते थे कि शिक्षा के जरिए युवाओं को कौशल मिले, ताकि वे स्वरोजगार अपना सकें और बेरोजगारी की समस्या कम हो। गांधीजी मानते थे कि शिक्षा से बच्चे की सभी क्षमताओं का विकास होना चाहिए, जिससे वह एक पूर्ण इंसान बन सके। उनके अनुसार, जब व्यक्ति का विकास संतुलित रूप से होता है, तभी वह जीवन के अंतिम लक्ष्य 'सत्य या ईश्वर' को समझ सकता है।

गांधीजी ने कहा था कि शिक्षा का मतलब केवल पढ़ना-लिखना नहीं है। उनके शब्दों में, शिक्षा वह है जिससे बच्चे और मनुष्य के शरीर, मन और आत्मा का पूरा विकास हो। साक्षरता सिर्फ एक साधन है, शिक्षा का अंत नहीं।

गांधीजी की बुनियादी शिक्षा के मुख्य सिद्धांत

निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा: 7 से 14 वर्ष तक सभी बच्चों के लिए शिक्षा अनिवार्य और निःशुल्क होनी चाहिए।

मातृभाषा में शिक्षा: शिक्षा का माध्यम मातृभाषा होना चाहिए, ताकि बच्चे सहजता से सीख सकें और अपनी संस्कृति से जुड़ें।

हस्तशिल्प आधारित शिक्षा:
शिक्षा केवल किताबों तक सीमित न हो, बल्कि किसी व्यावहारिक कार्य या शिल्प से जुड़ी हो, जिससे बच्चे में आत्मनिर्भरता और कौशल विकसित हो।

चरित्र निर्माण और मानवीय मूल्य:
शिक्षा का उद्देश्य केवल किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि नैतिक मूल्यों, अच्छे संस्कार और मजबूत चरित्र का विकास होना चाहिए।

सर्वांगीण विकास:
शिक्षा से बच्चे के शरीर, मन, हृदय और आत्मा का समान रूप से विकास होना चाहिए।

व्यावहारिक अनुभव:
पढ़ाई के साथ-साथ बच्चों को हाथ और दिमाग से काम करने का अनुभव भी मिले।

आर्थिक आत्मनिर्भरता:
शिक्षा से बच्चा आर्थिक रूप से सक्षम और आत्मनिर्भर बन सके।

नारी शिक्षा का महत्व:
महिलाओं की शिक्षा राष्ट्र के लिए लाभकारी है, क्योंकि वे बच्चों में संस्कार डालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

गांधीजी बाल-केंद्रित और जीवन से जुड़ी शिक्षा में विश्वास रखते थे। वे चाहते थे कि स्कूल में पढ़ाई के साथ-साथ हाथ, दिल और दिमाग तीनों का विकास हो, ताकि बच्चे का समग्र व्यक्तित्व निखर सके।

व्यावसायिक शिक्षा के संबंध में महात्मा गांधी के विचार

गांधीजी के अनुसार, शिक्षा के माध्यम से बच्चे को कोई ऐसा शिल्प सीखना चाहिए, जिससे वह भविष्य में किसी उद्योग या व्यवसाय में काम करके अपनी ज़रूरतें पूरी कर सके। उनका उद्देश्य यह था कि शिक्षा बच्चे को आत्मनिर्भर बनाए और उसे आजीविका कमाने की क्षमता दे। इसका मतलब यह नहीं कि बच्चे सिर्फ श्रमिक बनें, बल्कि सीखते हुए कमाएं और अनुभव भी प्राप्त करें।

गांधीजी ने यह भी कहा कि व्यावसायिक शिक्षा के साथ-साथ सांस्कृतिक और मानसिक विकास भी होना चाहिए। दोनों का विकास साथ-साथ होना चाहिए। गांधीजी ने रटने वाली शिक्षा को नकारा और इसे दोषपूर्ण माना। वे चाहते थे कि बच्चों के लिए स्थानीय शिल्प को शिक्षा का माध्यम बनाया जाए, ताकि उनका शरीर, मन और आत्मा सामंजस्यपूर्ण ढंग से विकसित हो और वे अपने भविष्य की जरूरतें पूरी कर सकें। मुख्य रूप से गांधीजी की शिक्षा का लक्ष्य ऐसे आत्मनिर्भर, चरित्रवान और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध व्यक्ति तैयार करना था जो राष्ट्र निर्माण में योगदान दे सकें, न कि केवल नौकरी ढूंढने वाले।

शिक्षा समाज की एक महत्वपूर्ण संस्था है 

महात्मा गांधी के अनुसार शिक्षा समाज की एक महत्वपूर्ण संस्था है, जो सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने और आगे बढ़ाने में मदद करती है। गांधीजी का शिक्षा के क्षेत्र में योगदान खास इसलिए है क्योंकि उन्होंने ब्रिटिश भारत में स्वदेशी शिक्षा प्रणाली विकसित करने का पहला प्रयास किया था।

आधुनिक शिक्षा प्रणाली के अधिकांश पहलू साकारात्मक हैं, लेकिन आधुनिक शिक्षा प्रणाली अक्सर भौतिकवाद, उपभोक्तावाद, अनुचित प्रतिस्पर्धा और कभी-कभी ज्वलंत मुद्दों को भी बढ़ावा देती है (उदाहरण के लिए वर्तमान में चल रहे UGC के नए नियमों को लेकर हो रहे विवाद), इससे नैतिक मूल्य घट रहे हैं, युवा अशांत हैं और समाज में संशय बढ़ रहा है। जबकि आजादी से पूर्व ही गांधीजी ने इन समस्याओं का अनुमान लगाया था और बुनियादी शिक्षा का नया विकल्प सुझाया था।

अत: गांधीजी की शिक्षा सत्य, प्रेम, अहिंसा, आत्म-बलिदान और चरित्र निर्माण पर आधारित थी। आज भी ये सिद्धांत उतने ही प्रासंगिक हैं। जरूरत है कि उनके विचारों को समय के अनुसार ढाला जाए और शिक्षा में पर्यावरण चेतना, नैतिक मूल्य, सामाजिक और समुदायिक जागरूकता शामिल की जाए, तभी देश का सच्चा विकास संभव है।

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