बजट 2026 से एडटेक की मांग: सस्ती शिक्षा, रोजगारपरक स्किलिंग और जिम्मेदार एआई

बजट 2026 से एडटेक की मांग: सस्ती शिक्षा, रोजगारपरक स्किलिंग और जिम्मेदार एआई

बजट 2026 से एडटेक की मांग: सस्ती शिक्षा, रोजगारपरक स्किलिंग और जिम्मेदार एआई
जीएसटी में राहत और परिणाम-आधारित फंडिंग से लेकर स्किलिंग और जिम्मेदार एआई अपनाने तक, एडटेक उद्योग के नेता बजट 2026 से अपनी अपेक्षाएं साझा कर रहे हैं।

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जैसे-जैसे केंद्रीय बजट 2026 नज़दीक आ रहा है, भारत का एडटेक सेक्टर शिक्षा खर्च, रोजगार-योग्यता के परिणामों और दीर्घकालिक स्किलिंग प्राथमिकताओं के बीच बेहतर तालमेल की मांग कर रहा है। तेज़ विस्तार, नियामकीय सख्ती और एकीकरण के दौर के बाद, उद्योग जगत के लीडर्स का कहना है कि अब ध्यान किफायती शिक्षा, जवाबदेही और ऐसे मानव संसाधन के निर्माण पर होना चाहिए जो वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सके।

किफायती शिक्षा एडटेक फाउंडर्स के लिए एक प्रमुख चिंता बनी हुई है, खासकर तब जब कराधान का बोझ शिक्षार्थियों और परिवारों की लागत को और बढ़ा रहा है। फिजिक्सवाला के, को-फाउंडर प्रतीक माहेश्वरी का कहना है कि इस दबाव को कम करना देश भर में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक समान पहुंच सुनिश्चित करने के लिए बेहद ज़रूरी है।

माहेश्वरी कहते हैं “बजट से मेरी अपेक्षा है कि शिक्षा को किफायती और जवाबदेह बनाया जाए। मैं शैक्षणिक सेवाओं पर जीएसटी में कटौती देखना चाहता हूं। मौजूदा 18 प्रतिशत की दर एक बोझ है। इसे कम करना हर परिवार तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पहुंचाने के लिए आवश्यक है।”

वह शिक्षा खर्च के मूल्यांकन के तरीके में भी बदलाव की मांग करते हैं और इनपुट-आधारित मॉडल की बजाय परिणाम-आधारित बजट आवंटन की वकालत करते हैं। माहेश्वरी के अनुसार, सार्वजनिक खर्च को सीखने के परिणामों और रोजगार-योग्यता से जोड़ना भारत के लिए परिवर्तनकारी साबित हो सकता है, जिससे यह सुनिश्चित होगा कि फंडिंग केवल बुनियादी ढांचे तक सीमित न रहकर वास्तविक प्रभाव में बदले।

स्किलिंग और बौद्धिक पूंजी केंद्र में

किफायती शिक्षा से आगे बढ़ते हुए, सेक्टर के नेताओं का मानना है कि स्किलिंग भारत की आर्थिक रणनीति के केंद्र में बनी रहनी चाहिए। अपग्रेड (upGrad) के, को-फाउंडर, उद्यमी और निवेशक रॉनी स्क्रूवाला का कहना है कि बजट में इस बात पर स्पष्ट फोकस होना चाहिए कि भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था को क्या पेश कर सकता है।

स्क्रूवाला कहते “मेरे लिए यहां सबसे अहम बात यह है कि एकल फोकस इस पर होना चाहिए कि भारत दुनिया को क्या देने की जरूरत रखता है और उसके लिए हम खुद को किस तरह प्रशिक्षित कर रहे हैं।”

वह स्किलिंग, उद्यमिता, स्टार्टअप्स, एमएसएमई और ग्रामीण सशक्तिकरण के इर्द-गिर्द बढ़ती गति को दीर्घकालिक विकास के प्रमुख चालक के रूप में देखते हैं। उनके अनुसार, भारत को श्रम-आधारित प्रतिस्पर्धा (लेबर आर्बिट्राज) से आगे बढ़कर उस दिशा में जाना चाहिए जिसे वह “कहीं अधिक उच्च बौद्धिक पूंजी” कहते हैं, जो अगले एक दशक में निरंतर अपस्किलिंग और उद्यमिता में निवेश के ज़रिये विकसित की जा सकती है।

एआई के प्रति संतुलित और दीर्घकालिक दृष्टिकोण

आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (एआई) को लेकर एडटेक उद्योग के नेता नीति-निर्माताओं से अल्पकालिक विस्तार के पीछे भागने के बजाय संतुलित और दीर्घकालिक दृष्टिकोण अपनाने की अपील कर रहे हैं। स्क्रूवाला एआई सेक्टर में अत्यधिक पूंजी निवेश को लेकर सावधानी बरतने की बात कहते हैं और इस बात पर ज़ोर देते हैं कि इसका वास्तविक प्रभाव कई वर्षों में सामने आएगा।

“एआई कोई 12 महीने की कहानी नहीं है, यह दो-तीन-चार साल की यात्रा है, और इसका प्रभाव सबसे ज़्यादा स्वास्थ्य, स्किलिंग और आउटसोर्सिंग में दिखाई देगा,” वे कहते हैं।

वह आगे जोड़ते हैं कि भले ही डेटा सेंटर्स में बड़े स्तर पर निवेश आवश्यक है, लेकिन शिक्षा और स्किलिंग में नवाचार को चरणबद्ध तरीके से विकसित किया जाना चाहिए, जिसमें तेज़ी से कमाई करने के बजाय टिकाऊ अपनाने पर ध्यान हो।

डिजिटल लर्निंग को कक्षा के प्रभाव में बदलना

स्कूल शिक्षा के स्तर पर फाउंडर्स का कहना है कि अब चुनौती अपनाने (एडॉप्शन) की नहीं बल्कि प्रभाव की है। लीड ग्रुप (LEAD Group) के सीईओ और को-फाउंडर सुमीत मेहता का कहना है कि यदि तकनीक, विशेषकर एआई, को स्कूल प्रणालियों में सोच-समझकर शामिल किया जाए तो यह कक्षा शिक्षण को सार्थक रूप से मजबूत कर सकती है। इस संदर्भ में मेहता कहते हैं कि “जैसे-जैसे डिजिटल लर्निंग स्कूल शिक्षा का अभिन्न हिस्सा बनती जा रही है, असली चुनौती इसकी संभावनाओं को लगातार और प्रभावी कक्षा-स्तरीय असर में बदलने की है।”

वह आगे कहते हैं कि कक्षा के लिए डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर और शिक्षकों के निरंतर अपस्किलिंग के लिए बजटीय समर्थन बेहद महत्वपूर्ण होगा। मेहता शिक्षा से जुड़े आवश्यक इनपुट्स पर जीएसटी के युक्तिकरण की आवश्यकता भी रेखांकित करते हैं, जिसमें पाठ्यपुस्तकों में इस्तेमाल होने वाले कागज पर लगने वाले 18 प्रतिशत जीएसटी को हटाना, तथा स्कूलों द्वारा उपयोग किए जाने वाले डिजिटल लर्निंग टूल्स, इन्फ्रास्ट्रक्चर और कंटेंट पर करों को कम करना शामिल है। इससे अभिभावकों पर लागत का दबाव कम होगा और मल्टी-मोडल लर्निंग को व्यापक रूप से अपनाने में मदद मिलेगी।

बड़े पैमाने पर एआई लर्निंग को सुलभ बनाए रखना

पेशेवर और उच्च शिक्षा पर केंद्रित संस्थानों के लिए, जैसे-जैसे एआई कौशल रोजगार-योग्यता के लिए और अधिक महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं, सुलभता एक प्रमुख चिंता बनी हुई है। ग्रेट लर्निंग (Great Learning) के, को-फाउंडर अर्जुन नायर का कहना है कि किफायती शिक्षा ही यह तय करेगी कि एआई एक व्यापक क्षमता बनेगा या केवल कुछ लोगों का विशेषाधिकार रह जाएगा।

नायर कहते हैं “एआई आने वाले एक दशक में आर्थिक विकास के सबसे मजबूत कारकों में से एक बनने जा रहा है, लेकिन इसका वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि कितने व्यापक स्तर पर लोग इस तकनीक तक पहुंच बना पाते हैं और इसे सीख पाते हैं।”

वह बताते हैं कि अल्पकालिक, ऑनलाइन लर्निंग भारत की युवा कार्यशक्ति के लिए काम के साथ-साथ एआई कौशल विकसित करने का सबसे व्यावहारिक रास्ता बनकर उभरी है। उनके अनुसार, उचित कराधान, शिक्षार्थियों के लिए किफायती फाइनेंसिंग और शिक्षा व स्किलिंग प्रदाताओं के लिए निरंतर नीतिगत समर्थन सुनिश्चित करना एक भविष्य-तैयार और समावेशी कार्यबल के निर्माण के लिए अत्यंत आवश्यक है।

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