लखनऊ: केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने लखनऊ में प्रकृति ज्ञान धाम (Prakriti Gyan Dham) का उद्घाटन किया। यह CSIR-राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान (CSIR-NBRI) द्वारा विकसित पहला Eco-Educational Hub है। इसका उद्देश्य जैव विविधता संरक्षण, भारतीय वनस्पति विरासत, पर्यावरण शिक्षा और Experiential Learning यानी अनुभव के जरिए सीखने को बढ़ावा देना है।
यह केंद्र लखनऊ के बंथरा स्थित महर्षि पराशर बायोरिसोर्स सेंटर में स्थापित किया गया है। प्रकृति ज्ञान धाम को एक ऐसे जीवंत शैक्षिक केंद्र के रूप में विकसित किया गया है, जहां छात्र और शोधकर्ता किताबों तक सीमित न रहकर पौधों, जैव विविधता और पर्यावरण को सीधे देखकर और समझकर सीख सकेंगे। यहां वैज्ञानिक शोध को समाज से जोड़ने पर विशेष जोर दिया गया है।
छात्रों और शोधकर्ताओं के लिए बनेगा Experiential Learning का केंद्र
CSIR-NBRI के निदेशक डॉ. ज़बीर अहमद ने बताया कि Eco-Educational Hub को भारत की वनस्पति विविधता के एक जीवंत भंडार के रूप में विकसित किया गया है। यह छात्रों, शोधकर्ताओं, शिक्षकों, प्रकृति प्रेमियों और आम लोगों को प्रकृति के साथ सीधे जुड़ने का अवसर देगा। केंद्र में जीवित पौधों के संग्रह, हेरिटेज ट्रेल, डिजिटल जानकारी और तकनीक आधारित गतिविधियों को एक साथ जोड़ा गया है। इससे छात्रों को पर्यावरण और वनस्पति विज्ञान को वास्तविक अनुभवों के माध्यम से समझने में मदद मिलेगी। साथ ही, यह वैज्ञानिक संस्थानों, समाज और प्रकृति के बीच संबंध को मजबूत करने का भी काम करेगा।
PAaVan Path से समझ सकेंगे भारत की वनस्पति विविधता
प्रकृति ज्ञान धाम में PAaVan Path (Plants and Associated Vegetations for Appreciating Nature) एक प्रमुख आकर्षण है। यह विशेष हेरिटेज पाथ अलग-अलग पारिस्थितिक क्षेत्रों और पौधों की प्रजातियों को प्रदर्शित करता है। इसका उद्देश्य लोगों को भारत की वनस्पति विविधता और विभिन्न पौधों के प्राकृतिक परिवेश के बारे में जानकारी देना है। यह पाथ छात्रों के लिए एक तरह की ओपन-एयर लर्निंग लैब के रूप में काम कर सकता है, जहां वे पौधों और उनके पर्यावरण को प्रत्यक्ष रूप से देखकर समझ सकेंगे।
Indian Heritage Garden में ऐतिहासिक पेड़ों का संग्रह
प्रकृति ज्ञान धाम में Indian Heritage Garden भी विकसित किया गया है। इसमें भारत के ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण स्थानों से जुड़े पेड़ों को प्रदर्शित किया गया है। इनमें फतेहपुर का बावन इमली इमली का पेड़, लखनऊ का मदर दशहरी आम का पेड़ और प्रयागराज का ऐतिहासिक पातालपुरी बरगद का पेड़ शामिल हैं। बावन इमली का पेड़ 52 स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान से जुड़ी ऐतिहासिक घटना को दर्शाता है। इसके अलावा, यहां ऐसे पेड़ों के वंशज भी लगाए गए हैं, जिनका संबंध महात्मा गांधी से रहा है। इनमें बिहार के चंपारण स्थित भितिहरवा में महात्मा गांधी द्वारा लगाए गए आम के पेड़ की वंशज प्रजाति भी शामिल है।
QR कोड से मिलेगी पेड़ों की डिजिटल जानकारी
प्रकृति ज्ञान धाम में शिक्षा को डिजिटल तकनीक से जोड़ने के लिए QR-Code Digitalisation की सुविधा भी दी गई है। परिसर में मौजूद पेड़ों और अन्य प्रदर्शनों पर QR कोड लगाए गए हैं। इन्हें स्कैन करके विजिटर संबंधित पेड़ या पौधे की कहानी और उसके ऐतिहासिक, वैज्ञानिक एवं पर्यावरणीय महत्व के बारे में पढ़ और सुन सकते हैं। यह पहल खास तौर पर छात्रों के लिए सीखने को अधिक इंटरैक्टिव और रोचक बनाने में मदद कर सकती है।
Bamboosteum में बांस की 43 प्रजातियों की जानकारी
केंद्र का एक अन्य प्रमुख आकर्षण Bamboosteum है। यहां बांस की 43 प्रजातियों को प्रदर्शित किया गया है। इसके साथ बांस के पर्यावरण संरक्षण, पारिस्थितिक बहाली और कार्बन अवशोषण जैसे क्षेत्रों में उपयोग को भी समझाया गया है।
विज्ञान आधारित तकनीकों को उद्योग और रोजगार से जोड़ने पर जोर
कार्यक्रम के दौरान CSIR-NBRI ने विज्ञान आधारित कुछ तकनीकों के हस्तांतरण की भी जानकारी दी। Rudra Perfume और Herbal Nano Serum से जुड़ी तकनीकें केरल की Kudumbashree State Poverty Eradication Mission को हस्तांतरित की गईं। इसका उद्देश्य विज्ञान आधारित उत्पादों के माध्यम से महिला उद्यमिता और आजीविका के अवसरों को बढ़ावा देना है। प्रकृति ज्ञान धाम में Indian Heritage Garden भी विकसित किया गया है। इसमें भारतइसके अलावा, कम लागत वाले Photobioreactor के डिजाइन और विकास से जुड़ी तकनीक लखनऊ में स्थित Witwake Solutions Pvt. Ltd. को हस्तांतरित की गई। इससे वैज्ञानिक अनुसंधान और औद्योगिक उपयोग के बीच संबंध मजबूत होने की उम्मीद है।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि तकनीक हस्तांतरण को केवल अलग-अलग परियोजनाओं तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। ऐसी तकनीकों को व्यवस्थित तरीके से प्रदर्शित किया जाना चाहिए, ताकि संभावित उपयोगकर्ता और हितधारक उन वैज्ञानिक समाधानों की पहचान कर सकें, जो रोजगार और आर्थिक अवसर पैदा कर सकते हैं। उन्होंने विभिन्न सरकारी विभागों, मंत्रालयों और वैज्ञानिक संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय की जरूरत पर भी जोर दिया। मंत्री ने CSIR-NBRI द्वारा पौध विज्ञान से जुड़े शोध को किसानों, उद्योग और आम जनता के लिए उपयोगी तकनीकों और उत्पादों में बदलने के प्रयासों की सराहना की।
पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का मेल
डॉ. जितेंद्र सिंह ने पर्यावरण और जलवायु से जुड़ी चुनौतियों से निपटने के लिए पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों के साथ जोड़ने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। कार्यक्रम के दौरान उन्होंने भारत के Heritage Gardens पर आधारित एक डॉक्यूमेंट्री भी जारी की, जिसमें देश की वनस्पति संपदा और उससे जुड़े ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय महत्व को दिखाया गया।
अत: प्रकृति ज्ञान धाम इस तरह शिक्षा, विज्ञान, डिजिटल तकनीक और पर्यावरण संरक्षण को एक साथ जोड़ने वाला केंद्र बनकर उभर रहा है। इसका सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह छात्रों और आम लोगों को प्रकृति को केवल पढ़ने के बजाय उसे देखकर, समझकर और अनुभव के जरिए सीखने का अवसर प्रदान करेगा।