देश में स्कूल छोड़ चुके और शिक्षा से दूर हो चुके बच्चों को फिर से पढ़ाई की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए शिक्षा मंत्रालय ने नई पहल शुरू की है। इसी दिशा में शिक्षा मंत्रालय के स्कूली शिक्षा और साक्षरता विभाग (DoSEL) ने एक उच्चस्तरीय बैठक आयोजित की, जिसकी अध्यक्षता डीओएसईएल के सचिव संजय कुमार ने की।
बैठक का मुख्य उद्देश्य विशेष रूप से 14 से 18 वर्ष आयु वर्ग के उन बच्चों के लिए नई रणनीति तैयार करना था, जो किसी कारणवश स्कूल नहीं जा पा रहे हैं। इसके साथ ही राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान (NIOS) की प्रस्तावित नई पहल को लागू करने की योजना पर भी विस्तार से चर्चा की गई।
बैठक में DoSEL की संयुक्त सचिव प्राची पांडे, NIOS के अध्यक्ष प्रोफेसर अखिलेश मिश्रा, सचिव कर्नल शकील अहमद, शिक्षा मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी, विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधि, चयनित पायलट जिलों के जिला कलेक्टर और शिक्षा विभाग के अधिकारी शामिल हुए। शिक्षाविदों के अनुसार, यह पहल देश में बढ़ती ड्रॉपआउट दर को कम करने और हर बच्चे तक शिक्षा पहुंचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
कक्षा 1 से 12 तक पहुंचने में बड़ी चुनौती
बैठक को संबोधित करते हुए स्कूली शिक्षा और साक्षरता विभाग के सचिव संजय कुमार ने कहा कि देश में बड़ी संख्या में बच्चे बीच में ही पढ़ाई छोड़ देते हैं। उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि कक्षा 1 में दाखिला लेने वाले हर 100 बच्चों में से केवल 62 बच्चे ही कक्षा 12 तक पहुंच पाते हैं। इसके अलावा, नवीनतम पीएलएफएस (PLFS) आंकड़ों के अनुसार, 14 से 18 वर्ष आयु वर्ग के दो करोड़ से अधिक बच्चे फिलहाल स्कूल नहीं जाते हैं।
उन्होंने बताया कि आर्थिक समस्याएं, घरेलू जिम्मेदारियां और रोजगार से जुड़ी मजबूरियां बच्चों के स्कूल छोड़ने के प्रमुख कारण हैं। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि हर बच्चे को कम से कम माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर तक शिक्षा मिलनी चाहिए। साथ ही बच्चों को स्थानीय रोजगार अवसरों के अनुसार स्किल आधारित शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण भी दिया जाना जरूरी है।
ओपन और डिस्टेंस लर्निंग से जुड़ेगा शिक्षा से दूर वर्ग
शिक्षा मंत्रालय के अनुसार, जिन बच्चों का नियमित स्कूलों में लौटना संभव नहीं है, उन्हें ओपन एंड डिस्टेंस लर्निंग (ओडीएल) के माध्यम से शिक्षा से जोड़ा जाएगा। इसके लिए एनआईओएस और राज्य मुक्त विद्यालयों की मदद ली जाएगी, ताकि बच्चों को लचीले और आसान शिक्षण विकल्प उपलब्ध कराए जा सकें।
संजय कुमार ने इस मिशन को सफल बनाने में जिला प्रशासन और जिला कलेक्टरों की भूमिका को बेहद महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि इस पहल को केवल एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि देशव्यापी अभियान के रूप में चलाया जाएगा, ताकि हर जरूरतमंद बच्चे तक शिक्षा पहुंच सके।
डेटा आधारित रणनीति पर होगा काम
DoSEL की संयुक्त सचिव प्राची पांडे ने कहा कि स्कूल न जाने वाले बच्चों की समस्या को “मिशन मोड” में हल किया जाएगा,साथ ही उन्होंने बताया कि इस पहल में डेटा आधारित रणनीति अपनाई जाएगी, जिससे हर बच्चे की सही पहचान की जा सके और उन्हें शिक्षा से जोड़ने की प्रक्रिया को मजबूत बनाया जा सके।
उन्होंने आगे कहा कि राज्यों, जिलों और स्थानीय प्रशासन के बीच बेहतर तालमेल बनाकर बच्चों की पहचान, नामांकन और उन्हें पढ़ाई में बनाए रखने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। इस पहल के औपचारिक शुभारंभ से पहले NIOS फैसिलिटेटर्स का चयन, स्टार्टर किट वितरण, प्रारंभिक सर्वेक्षण और बच्चों के शुरुआती नामांकन जैसे कार्य पूरे किए जाएंगे।
छात्रों को होंगे बहुत से लाभ
छात्रों को मिलेगा दोबारा पढ़ाई और करियर बनाने का अवसर : शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, इस पहल का सबसे बड़ा लाभ उन छात्रों को मिलेगा, जो आर्थिक या सामाजिक कारणों से अपनी पढ़ाई बीच में छोड़ चुके हैं। ओपन एंड डिस्टेंस लर्निंग के माध्यम से ऐसे बच्चों को दोबारा शिक्षा से जुड़ने का अवसर मिलेगा, जिससे वे अपनी स्कूली पढ़ाई पूरी कर सकेंगे और भविष्य में उच्च शिक्षा या रोजगार के बेहतर अवसर हासिल कर पाएंगे।
इस पहल के तहत केवल सामान्य शिक्षा ही नहीं, बल्कि स्किल आधारित शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण पर भी जोर दिया जाएगा। इससे छात्रों को स्थानीय उद्योगों और रोजगार बाजार की जरूरतों के अनुसार प्रशिक्षण मिल सकेगा। इससे युवाओं में रोजगारपरक कौशल विकसित होंगे और उनके लिए नौकरी, स्वरोजगार और उद्यमिता के नए अवसर खुल सकते हैं।
स्किल आधारित शिक्षा से बढ़ेंगे रोजगार के अवसर : इस पहल के तहत केवल सामान्य शिक्षा ही नहीं, बल्कि स्किल आधारित शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण पर भी जोर दिया जाएगा। इससे छात्रों को स्थानीय उद्योगों और रोजगार बाजार की जरूरतों के अनुसार प्रशिक्षण मिल सकेगा, साथ ही इससे छात्र कम उम्र में ही रोजगारपरक कौशल सीख पाएंगे, जिससे उनके लिए नौकरी, स्वरोजगार और उद्यमिता के अवसर भी बढ़ सकते हैं।
डिजिटल शिक्षा और मॉनिटरिंग सिस्टम से मिलेगा लाभ : ओपन एंड डिस्टेंस लर्निंग मॉडल के जरिए छात्रों को लचीले तरीके से पढ़ाई करने का अवसर मिलेगा। जिन बच्चों के लिए नियमित स्कूल जाना संभव नहीं है, वे घर या अपने स्थानीय क्षेत्र से भी शिक्षा प्राप्त कर सकेंगे। ऐप आधारित मॉनिटरिंग सिस्टम और डिजिटल लर्निंग सपोर्ट के माध्यम से छात्रों की पढ़ाई पर लगातार नजर रखी जाएगी, जिससे ड्रॉपआउट दर कम करने में मदद मिल सकती है।
यह पहल खासतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों, आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों और कामकाजी बच्चों के लिए बेहद फायदेमंद साबित हो सकती है। इससे ऐसे बच्चों को शिक्षा से दोबारा जोड़ने और उन्हें बेहतर भविष्य देने में बड़ी मदद मिलेगी।
NIOS के अध्यक्ष प्रोफेसर अखिलेश मिश्रा ने कहा कि शिक्षा केवल पढ़ाई नहीं, बल्कि आशा, सम्मान और बेहतर भविष्य का माध्यम है। उन्होंने कहा कि सबसे बड़ी चुनौती उन बच्चों तक पहुंचना है, जो शिक्षा व्यवस्था से पूरी तरह कट चुके हैं। उन्होंने इस पहल को “शैक्षिक समावेशन का जन-आंदोलन” बताया, जिसका उद्देश्य हर बच्चे और युवा को दोबारा सीखने के अवसर उपलब्ध कराना है।
साथ ही शिक्षाविदों का मानना है कि यदि यह पहल प्रभावी तरीके से लागू होती है, तो देश में लाखों ड्रॉपआउट बच्चों को दोबारा शिक्षा से जोड़ने और उन्हें बेहतर भविष्य देने में बड़ी सफलता मिल सकती है।