भारत में बस उद्योग तेजी से इलेक्ट्रिफिकेशन की ओर बढ़ रहा है, जिसे सरकारी खरीद कार्यक्रमों, घटती बैटरी लागत और बढ़ते चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर का सपोर्ट मिल रहा है। केपीएमजी इन इंडिया की मई 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, मार्च 2026 तक देश में लगभग 16,300 इलेक्ट्रिक बसें सड़कों पर चल रही थीं, जबकि विभिन्न सरकारी योजनाओं के तहत करीब 46,000 बसों के ऑर्डर दिए जा चुके हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, पिछले छह वर्षों में करीब 62,000 इलेक्ट्रिक बसों के लिए टेंडर जारी किए गए, जिनमें से अधिकांश का नेतृत्व सरकारी परिवहन उपक्रमों और सार्वजनिक खरीद कार्यक्रमों ने किया है। FAME I, FAME II, पीएम-ईबस सेवा और पीएम ई-ड्राइव जैसी योजनाओं ने इस बदलाव को गति दी है, साथ ही डिपो इंफ्रास्ट्रक्चर और चार्जिंग नेटवर्क पर भी निवेश बढ़ाया गया है।
हालांकि, रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि टेंडर और वास्तविक डिप्लॉयमेंट के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है, जिसका कारण बैटरी और कंपोनेंट्स की आयात निर्भरता, चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी और राज्य परिवहन उपक्रमों की भुगतान देरी है। इन चुनौतियों से निपटने के लिए सरकार ने Payment Security Fund जैसे उपाय लागू किए हैं।
आर्थिक दृष्टि से, इलेक्ट्रिक बसें शहरी परिवहन में पहले ही डीजल और सीएनजी बसों के मुकाबले कुल लागत के आधार पर प्रतिस्पर्धी बन चुकी हैं। अनुमान है कि FY35 तक भारत में इलेक्ट्रिक बसों की हिस्सेदारी 35–40% तक पहुंच सकती है, जबकि सार्वजनिक परिवहन में यह 85% से ज्यादा हो सकती है, जिससे देश के क्लीन मोबिलिटी लक्ष्य को मजबूत सपोर्ट मिलेगा।