भारत की स्लीप इंडस्ट्री में बड़ा बदलाव, वेलनेस बनी नई ड्राइव

भारत की स्लीप इंडस्ट्री में बड़ा बदलाव, वेलनेस बनी नई ड्राइव

भारत की स्लीप इंडस्ट्री में बड़ा बदलाव, वेलनेस बनी नई ड्राइव
भारत की स्लीप इंडस्ट्री फर्नीचर-केंद्रित खरीद से निकलकर परफॉर्मेंस और वेलनेस आधारित कैटेगरी में बदल रही है, जहां उपभोक्ता अब डिस्काउंट नहीं बल्कि हेल्थ आउटकम्स को प्राथमिकता दे रहे हैं।

भारत की स्लीप कैटेगरी एक बड़े संरचनात्मक बदलाव के दौर से गुजर रही है। यह बदलाव सिर्फ ग्रोथ की रफ्तार में नहीं, बल्कि उस सोच में है जो इस ग्रोथ को चला रही है। जो श्रेणी कभी फर्नीचर और होम डेकोर से जुड़ी मानी जाती थी, वह अब परफॉर्मेंस और वेलनेस-केंद्रित बनती जा रही है। उपभोक्ता अब डिस्काउंट और लुक्स से आगे बढ़कर फंक्शन, हेल्थ आउटकम्स और लंबे समय तक उपयोग पर ध्यान दे रहे हैं।

मार्केट ट्रैकर्स के मुताबिक भारत का मैट्रेस मार्केट फिलहाल 2.4–2.7 अरब डॉलर के बीच है, जो 2030 तक 3.65–4.51 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है, लगभग 9% CAGR के साथ। हालांकि कुल ग्रोथ स्थिर है, असली बदलाव ऑर्थोपेडिक और एर्गोनॉमिक स्लीप सॉल्यूशंस जैसे सब-सेगमेंट्स में दिख रहा है। उदाहरण के तौर पर, ऑर्थोपेडिक मैट्रेस सेगमेंट 2024 में 98 मिलियन डॉलर का है, लेकिन इसके 2033 तक 25.8% CAGR से बढ़ने का अनुमान है।

कम्फर्ट से प्रॉब्लम-सॉल्विंग की ओर

डी2सी (Direct-to-Consumer) ब्रांड्स इस बदलाव को तेजी से अपना रहे हैं। फ्रिडो के CEO और को-फाउंडर गणेश सोनावणे के अनुसार, “अब उपभोक्ता स्लीप प्रोडक्ट्स को सॉफ्ट फर्निशिंग नहीं, बल्कि फंक्शनल वेलनेस प्रोडक्ट के रूप में देखते हैं, जो गर्दन दर्द, गलत पोश्चर या नींद में बाधा जैसी समस्याओं को हल करें।”

फ्रिडो की रणनीति रिसर्च-आधारित डिजाइन और लॉन्ग-टर्म यूसेज पर केंद्रित है। वहीं, लीगेसी ब्रांड्स भी इसी बदलाव को महसूस कर रहे हैं। पेप्स इंडस्ट्रीज़ के मैनेजिंग डायरेक्टर शंकर रम्म बताते हैं कि पहले ग्राहक डिस्काउंट पूछते थे, अब वे बैक सपोर्ट, मोशन आइसोलेशन और ब्रीदेबिलिटी जैसे सवाल कर रहे हैं।

सेल्स से आगे परफॉर्मेंस मैट्रिक्स

अब ब्रांड्स सफलता को सिर्फ बिक्री से नहीं, बल्कि रिपीट यूसेज, रिटर्न रेट और लॉन्ग-टर्म एंगेजमेंट से माप रहे हैं। फ्रिडो के लिए रिपीट परचेज और फैमिली में दोबारा खरीद मजबूत संकेत हैं कि प्रोडक्ट समस्या हल कर रहा है। वहीं, पेप्स के प्रीमियम मैट्रेस की रिटर्न रेट 2% से भी कम है, जो परफॉर्मेंस-ड्रिवन डिमांड को दर्शाता है।

छोटे प्रोडक्ट्स, तेज अपनाव

मैट्रेस के साथ-साथ एर्गोनॉमिक पिलो, टॉपर, बोल्स्टर और वेज जैसे स्लीप एक्सेसरीज़ तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। कम कीमत और आसान ट्रायल के कारण उपभोक्ता पहले इन्हें आजमाते हैं। 100-नाइट ट्रायल जैसे मॉडल्स ने भी परफॉर्मेंस को परखने का भरोसा बढ़ाया है।

अगला चरण: स्लीप ऐज़ इंफ्रास्ट्रक्चर

इंडस्ट्री लीडर्स मानते हैं कि यह बदलाव अभी शुरुआती दौर में है। स्लीप अब फर्नीचर नहीं, बल्कि “स्लीप फिटनेस” और “स्पाइन हेल्थ” से जुड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर बन रहा है। इसी सोच के साथ ब्रांड्स एक्सपीरियंस-आधारित रिटेल, स्मार्ट मटीरियल्स और फिजियोथेरेपिस्ट व वेलनेस प्लेटफॉर्म्स के साथ साझेदारी पर काम कर रहे हैं। कुल मिलाकर, भारत की स्लीप इंडस्ट्री अब आराम से आगे बढ़कर परिणाम और स्वास्थ्य-केंद्रित भविष्य की ओर कदम बढ़ा रही है।

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