भारत सरकार का भारी उद्योग मंत्रालय (MHI) इलेक्ट्रिक बसों और ट्रकों के लिए एक नई फाइनेंसिंग सपोर्ट फ्रेमवर्क पर काम कर रहा है, जिसमें ब्याज सब्सिडी और आंशिक क्रेडिट गारंटी जैसी व्यवस्थाएं शामिल हो सकती हैं। यह जानकारी भारी उद्योग मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव हनीफ कुरैशी ने बेंगलुरु में आयोजित एक उद्योग कार्यक्रम के दौरान दी।
हनिफ कुरैशी ने कहा कि इलेक्ट्रिक कमर्शियल वाहनों को अपनाने में फाइनेंसिंग सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बनी हुई है, खासकर छोटे फ्लीट ऑपरेटर्स के लिए। उन्होंने बताया कि इस सेक्टर के कई ऑपरेटर्स के पास पांच से कम ट्रक या लगभग 10 बसें होती हैं, जिसके कारण ज्यादा जोखिम की आशंका के चलते बैंक और वित्तीय संस्थान ऋण देने में सतर्क रहते हैं।
उन्होंने कहा कि सरकार इस समस्या के समाधान के लिए ब्याज सबवेंशन और आंशिक क्रेडिट गारंटी जैसे विकल्पों पर विचार कर रही है। उनके अनुसार, यदि डेवलपमेंट फाइनेंस इंस्टीट्यूशन (DFI) जोखिम का कुछ हिस्सा वहन करे और ब्याज सहायता उपलब्ध कराई जाए, तो फाइनेंसिंग आसान होगी और सार्वजनिक क्षेत्र की पूंजी इस सेक्टर में अधिक मात्रा में आ सकेगी।
कुरैशी ने कहा कि इलेक्ट्रिक बसें और ट्रक भारत की जीवाश्म ईंधन खपत और उत्सर्जन कम करने की रणनीति का अहम हिस्सा हैं। उन्होंने बताया कि देश में कुल वाहनों का केवल 3 प्रतिशत हिस्सा ट्रकों का है, लेकिन वे कुल डीजल खपत का 42 प्रतिशत उपयोग करते हैं।
पीएम ई-ड्राइव (PM e-Drive) योजना के तहत सरकार ने 10,900 करोड़ रुपये के कुल बजट में से 2,000 करोड़ रुपये ईवी चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए आवंटित किए हैं। मंत्रालय ने चार्जर तैनाती के लिए 24 हाई-डेंसिटी फ्रेट कॉरिडोर और 50 बस कॉरिडोर की पहचान की है। कुरैशी के अनुसार, वर्तमान में भारत में 67,000 से अधिक ईवी चार्जर मौजूद हैं, जिनमें 25,000 से अधिक फास्ट चार्जर शामिल हैं।
मंत्रालय का अनुमान है कि 2030 तक देश में लगभग 72,000 सार्वजनिक चार्जरों की आवश्यकता होगी। इनमें से करीब 1,800 चार्जर बसों और ट्रकों के लिए तथा लगभग 22,000 चार्जर पैसेंजर वाहनों के लिए आवश्यक होंगे।
कुरैशी ने कहा कि अब ध्यान केवल चार्जर की उपलब्धता पर नहीं, बल्कि उनकी विश्वसनीयता और संचालन क्षमता पर भी है। उन्होंने कहा कि यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि चार्जर में कोई तकनीकी त्रुटि न हो, उपयोग किए जाने वाले ऐप भरोसेमंद हों और भुगतान व रिफंड प्रक्रिया सुचारु रूप से कार्य करे।
उन्होंने ईवी, बैटरी और चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर में घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया। उन्होंने बताया कि 26,000 करोड़ रुपये की ऑटोमोबाइल PLI योजना के तहत पात्र निर्माताओं के लिए 50 प्रतिशत घरेलू मूल्य संवर्धन अनिवार्य किया गया है।
इसी तरह, सरकारी योजनाओं के तहत लगाए जाने वाले ईवी चार्जरों को फेज्ड मैन्युफैक्चरिंग प्रोग्राम के मानकों का पालन करना होगा। कुरैशी ने स्पष्ट कहा कि केवल विदेश से चार्जर आयात कर उन्हें स्थापित करने की अनुमति नहीं होगी।
बैटरी निर्माण पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि भारत में वर्तमान में PLI-ACC योजना के तहत लगभग 2 से 2.5 GWh एडवांस्ड केमिस्ट्री सेल निर्माण क्षमता संचालित हो रही है। उन्होंने कहा कि 2029-30 तक PLI और निजी निवेशों के माध्यम से 100 GWh से अधिक उत्पादन क्षमता विकसित होने की उम्मीद है।
मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, पिछले वर्ष भारत में कुल 52 लाख कार बिक्री में इलेक्ट्रिक पैसेंजर वाहनों की हिस्सेदारी 4.1 प्रतिशत रही। वहीं इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर्स की हिस्सेदारी कुल बिक्री में लगभग 7 प्रतिशत और इलेक्ट्रिक थ्री-व्हीलर्स की हिस्सेदारी लगभग 35 प्रतिशत रही।