भारत के दो बड़े उद्योग समूह टाटा ग्रुप और जेएसडब्ल्यू ग्रुप इलेक्ट्रिक वाहन और बैटरी तकनीक में घरेलू क्षमताएं विकसित करने के लिए करीब 1 अरब डॉलर के निवेश की तैयारी कर रहे हैं। यह कदम भारतीय कंपनियों की चीन पर तकनीकी निर्भरता कम करने की बढ़ती रणनीति को दर्शाता है।
सूत्रों के अनुसार, दोनों समूह अलग-अलग रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) सेंटर स्थापित कर रहे हैं, जिनका उद्देश्य अगली पीढ़ी की बैटरी तकनीक और उन्नत EV सिस्टम में इन-हाउस विशेषज्ञता विकसित करना है।
ईवी उद्योग में बैटरियां सबसे महंगी और तकनीकी रूप से सबसे जटिल हिस्सों में से एक मानी जाती हैं। ऐसे में यह निवेश भारतीय कंपनियों के लिए लोकल टेक्नोलॉजी और मैन्युफैक्चरिंग क्षमता विकसित करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।
टाटा ग्रुप की बैटरी यूनिट Agratas Ltd. बेंगलुरु में एक नए R&D सेंटर पर 400 मिलियन डॉलर से ज्यादा खर्च कर रही है। यह केंद्र लिथियम आयरन फॉस्फेट (LFP) और लिथियम मैंगनीज आयरन फॉस्फेट तकनीक विकसित करने पर केंद्रित होगी। वर्तमान में इन तकनीकों के लिए कंपनी काफी हद तक चीन पर निर्भर है।
यह केंद्र टाटा को भविष्य में भारत में ही इन बैटरी सेल्स का विकास और निर्माण करने तथा संबंधित बौद्धिक संपदा (IP) तैयार करने में मदद करेगा। अग्रतास (Agratas) के पास फिलहाल दक्षिण कोरिया से प्राप्त निकेल मैंगनीज कोबाल्ट बैटरी तकनीक की पहुंच है।
अग्रतास (Agratas0 के प्रवक्ता ने कहा कि कंपनी का वैश्विक R&D कार्यक्रम तेजी से आगे बढ़ रहा है, जिसे बेंगलुरु और ऑक्सफोर्ड स्थित अत्याधुनिक लैब्स का सपोर्ट मिल रहा है।
दूसरी ओर, सज्जन जिंदल समूह की JSW Motors Ltd. भी इसी दिशा में आगे बढ़ रही है। कंपनी अगले पांच से छह वर्षों में महाराष्ट्र में एक रिसर्च हब स्थापित करने के लिए कम से कम 500 मिलियन डॉलर निवेश करेगी।
जेएसडब्ल्यू मोटर्स (JSW Motors) के सीईओ रंजन नायक के अनुसार, यह केंद्र वैश्विक साझेदारों के साथ विकसित वाहनों को भारतीय परिस्थितियों के अनुसार लोकलाइज करने, स्वदेशी सॉफ्टवेयर क्षमताएं विकसित करने और कनेक्टेड व्हीकल तकनीक को आगे बढ़ाने पर काम करेगा।
कंपनी का लक्ष्य वैश्विक ऑटोमोटिव तकनीकों को भारतीय सड़क, मौसम और कीमतों के अनुरूप ढालना है, ताकि भारतीय लागत संरचना में वैश्विक गुणवत्ता वाले उत्पाद पेश किए जा सकें।
यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब दुनिया भर में ईवी और बैटरी तकनीकों के ट्रांसफर को लेकर चीन ज्यादा सतर्क हो गया है। अमेरिका-चीन टैरिफ तनाव और बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच चीन अपनी प्रमुख तकनीकों को साझा करने में सीमित रुख अपना रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार, कई भारतीय कंपनियों को चीनी तकनीकी साझेदारियों में देरी, बढ़ते नियामकीय दबाव और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। रिलायंस इंडस्ट्रीज जैसी कंपनियों को भी जॉइंट वेंचर परियोजनाओं में तकनीकी हस्तांतरण को लेकर कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है।