लेकिन 2026 तक आते-आते यह सोच बदल गई है। अब छात्र और उनके परिवार विदेश में पढ़ाई को भावनात्मक नहीं, बल्कि एक समझदारी भरा निवेश मानते हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस निवेश से कितना फायदा (ROI) मिलेगा।
बजट और खर्च को लेकर नई सोच
अब परिवार अपने खर्च को ध्यान में रखकर फैसले ले रहे हैं। Union Budget 2026 में शिक्षा पर भेजे जाने वाले पैसे पर TCS टैक्स को 5% से घटाकर 2% कर दिया गया, जिससे शुरुआत में कम पैसा फंसता है। रुपये की कीमत को देखते हुए अब परिवार सोच-समझकर फैसला कर रहे हैं। वे महंगे देशों के बजाय जर्मनी जैसे देशों को चुन रहे हैं, जहां कम खर्च में अच्छी पढ़ाई और जल्दी नौकरी मिलने के अवसर मिलते हैं।
नई पसंद: पारंपरिक देशों से आगे बढ़ते छात्र
अब छात्र सिर्फ अमेरिका या यूके तक सीमित नहीं हैं। वे जर्मनी, फ्रांस, आयरलैंड, इटली, दक्षिण कोरिया और सिंगापुर जैसे देशों की ओर बढ़ रहे हैं। जर्मनी की लोकप्रियता तेजी से बढ़ी है और अब कई छात्र कम बजट में वहां की टॉप यूनिवर्सिटी में दाखिला लेकर बेहतर करियर के मौके पा रहे हैं।
छोटे शहरों से बढ़ रही भागीदारी
अब विदेश में पढ़ाई सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित नहीं रही। लगभग 57% छात्र अब छोटे शहरों (टियर-2 और टियर-3) से आते हैं। ज्यादातर परिवार 30 लाख रुपये के अंदर ही पढ़ाई की योजना बनाते हैं, और कई छात्र लोन या स्कॉलरशिप के जरिए पढ़ाई करते हैं। ऐसे में अब पढ़ाई का अनुभव नहीं, बल्कि उसके परिणाम यानी नौकरी और कमाई ज्यादा महत्वपूर्ण हो गए हैं।
PR से ज्यादा करियर पर फोकस
पहले विदेश जाने का मकसद स्थायी नागरिकता (PR) होता था, लेकिन अब यह बदल गया है। अब सिर्फ 16.6% छात्र PR को प्राथमिकता देते हैं, जबकि लगभग 48% छात्र बेहतर नौकरी और करियर के अवसरों के लिए विदेश जाते हैं। छात्र अब ऐसे क्षेत्रों को चुन रहे हैं जहां भविष्य में ज्यादा मौके हैं, जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा साइंस, साइबर सिक्योरिटी और क्लाइमेट टेक्नोलॉजी।
हाइब्रिड पढ़ाई का बढ़ता चलन
अब छात्र पूरी पढ़ाई विदेश में करने के बजाय हाइब्रिड मॉडल अपना रहे हैं। वे पहले भारत में पढ़ाई शुरू करते हैं और बाद में विदेश जाते हैं। इससे खर्च 40-50% तक कम हो जाता है और छात्रों को बेहतर विकल्प चुनने की आजादी मिलती है।
नई पीढ़ी की नई सोच: आज के छात्र ज्यादा समझदार और जागरूक हैं। वे बिना सोचे-समझे कर्ज लेकर पढ़ाई नहीं करना चाहते।
निष्कर्ष: 2026 में साफ है कि भारतीय छात्र अब बिना सोचे-समझे विदेश नहीं जा रहे। वे अपने करियर, खर्च और भविष्य को ध्यान में रखते हुए फैसले ले रहे हैं। अब लक्ष्य सिर्फ विदेश जाना नहीं, बल्कि एक मजबूत और सफल करियर बनाना है।
(लेखक: प्रनीत सिंह, एवीपी- यूनिवर्सिटी पार्टनरशिप्स एंड स्टडी अब्रॉड, upGrad, विचार व्यक्तिगत हैं)