MSME में महिलाओं की भागीदारी, लेकिन ग्रोथ सीमित
Ministry of MSME की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में लगभग 20% MSME महिलाओं के स्वामित्व में हैं। लेकिन इनमें से 90% से ज्यादा अभी भी 'माइक्रो' कैटेगरी में ही रह जाते हैं। स्टार्टअप से छोटे बिजनेस तक का सफर तो तय हो रहा है, लेकिन छोटे से मिड-साइज बिजनेस बनने का बदलाव बहुत कम देखने को मिलता है।
माइक्रो-सीलिंग: खुद बनाई हुई सीमा
अनुभव के आधार पर देखा गया है कि यह समस्या बाहर से नहीं आती, बल्कि कई बार हम खुद ही अपने बिजनेस में ऐसी संरचना बना लेते हैं, जो ग्रोथ को रोक देती है।
साइलेंट वॉल: सफलता जैसा दिखने वाला जाल
माइक्रो-सीलिंग खतरनाक इसलिए है क्योंकि यह सफलता जैसी लगती है। काम ज्यादा होता है, टीम व्यस्त रहती है और पैसा भी आता है। लेकिन इसके बावजूद बिजनेस आगे नहीं बढ़ पाता। यह स्थिति तब आती है जब बिजनेस की आंतरिक व्यवस्था (सिस्टम) ग्रोथ को रोक देती है।
ग्रोथ रुकने के पीछे तीन बड़ी वजहें:
एक्जीक्यूशन ट्रैप - शुरुआत में फाउंडर खुद हर काम करता है, जो फायदेमंद होता है। लेकिन लंबे समय तक हर छोटे-बड़े फैसले में खुद शामिल रहना बिजनेस को आगे बढ़ने से रोक देता है। असली ग्रोथ तब आती है जब फाउंडर सिस्टम बनाता है और नेतृत्व करता है।
कम कीमत तय करना - कई महिलाएं अपने प्रोडक्ट या सर्विस की कीमत “सुरक्षित” रखने के लिए कम रखती हैं। इससे काम तो मिलता है, लेकिन मुनाफा कम होता है, जिससे बिजनेस में दोबारा निवेश करना मुश्किल हो जाता है।
बहुत ज्यादा सावधानी - International Finance Corporation के अनुसार, महिलाएं जोखिम लेने में अधिक सतर्क होती हैं। यह अच्छी बात है, लेकिन कई बार इससे ग्रोथ के मौके छूट जाते हैं, जैसे देर से भर्ती करना या विस्तार में देरी करना।
कंफर्ट जोन की बड़ी कीमत - माइक्रो-सीलिंग आरामदायक लगती है, लेकिन समय के साथ यह नुकसान पहुंचाती है। यह आपकी ऊर्जा, समय और विजन को सीमित कर देती है। जब बिजनेस पूरी तरह फाउंडर पर निर्भर हो जाता है, तो आगे बढ़ना मुश्किल हो जाता है।
कैसे तोड़ें यह सीमा?
सिस्टम बनाएं: हर काम को डॉक्यूमेंट करें, ताकि कोई और भी उसे कर सके।
समय से पहले हायरिंग करें: जरूरत पड़ने से पहले टीम बढ़ाएं।
प्राइसिंग सुधारें: ऐसी कीमत तय करें जिससे बिजनेस में निवेश और विस्तार संभव हो।
महिला उद्यमियों के लिए बड़ा अवसर
भारत में महिला उद्यमियों के लिए लगभग 80 बिलियन डॉलर का अवसर मौजूद है। जरूरत है इस बात को समझने की कि कब बिजनेस की सीमाएं खुद बनाई जा रही हैं और उन्हें तोड़ने का साहस दिखाया जाए। अत: एक स्थिर बिजनेस और तेजी से बढ़ने वाले बिजनेस के बीच फर्क सिर्फ बाजार का नहीं, बल्कि नेतृत्व और सोच का होता है।
(लेखिका: अल्पना छिब्बर, को-फाउंडर - The BOB Project, विचार व्यक्तिगत हैं)