भारतीय शिक्षा को नई दिशा देने वाले दूरदर्शी नेता: मौलाना अबुल कलाम आज़ाद

भारतीय शिक्षा को नई दिशा देने वाले दूरदर्शी नेता: मौलाना अबुल कलाम आज़ाद

भारतीय शिक्षा को नई दिशा देने वाले दूरदर्शी नेता: मौलाना अबुल कलाम आज़ाद
मौलाना अबुल कलाम आज़ाद एक महान स्वतंत्रता सेनानी, विद्वान और स्वतंत्र भारत के पहले शिक्षा मंत्री थे। उन्होंने देश की शिक्षा व्यवस्था की मजबूत नींव रखी। आज उनकी पुण्यतिथि पर हमें उनके विचारों को याद कर उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए।


स्वतंत्र भारत के निर्माण में जिन महान व्यक्तित्वों ने अपनी दूरदृष्टि, विचारशीलता और कर्मठता से राष्ट्र को नई दिशा दी, उनमें मौलाना अबुल कलाम आज़ाद का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। वे न केवल एक महान स्वतंत्रता सेनानी, विद्वान, पत्रकार और विचारक थे, बल्कि स्वतंत्र भारत के पहले शिक्षा मंत्री के रूप में उन्होंने भारतीय शिक्षा प्रणाली की मजबूत नींव रखी। उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए यह आवश्यक है कि हम उनके शिक्षा संबंधी विचारों और योगदानों को समझें और उनसे प्रेरणा लें।

शिक्षा को राष्ट्र निर्माण का आधार 

मौलाना आज़ाद का मानना था कि शिक्षा केवल नौकरी पाने का साधन नहीं, बल्कि यह व्यक्ति के सर्वांगीण विकास और राष्ट्र निर्माण का सबसे सशक्त माध्यम है। वे कहते थे कि शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य को सोचने, समझने और सही निर्णय लेने में सक्षम बनाना है। उनके अनुसार जब तक शिक्षा आमजन तक नहीं पहुँचेगी, तब तक लोकतंत्र और स्वतंत्रता के वास्तविक अर्थ अधूरे रहेंगे।

उन्होंने विशेष रूप से सर्वशिक्षा पर जोर दिया। उनका विश्वास था कि शिक्षा समाज के हर वर्ग-चाहे वह अमीर हो या गरीब, पुरुष हो या महिला सबके लिए समान रूप से सुलभ होनी चाहिए। इसी सोच के कारण उन्होंने प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक के ढांचे को सुदृढ़ करने पर बल दिया।

धर्मनिरपेक्ष और वैज्ञानिक शिक्षा की वकालत
 

मौलाना आज़ाद एक प्रगतिशील विचारक थे। वे शिक्षा को धर्मनिरपेक्ष और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जोड़कर देखते थे। उनका मानना था कि भारत जैसे विविधताओं से भरे देश में शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो सांप्रदायिक सौहार्द, सहिष्णुता और वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा दे। वे स्वयं इस्लामी विद्वान होने के बावजूद शिक्षा को किसी एक धर्म या संप्रदाय तक सीमित नहीं मानते थे।

उनके विचारों में भारतीय संस्कृति की आत्मा और आधुनिक विज्ञान की चेतना का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। वे चाहते थे कि छात्र अपनी जड़ों से जुड़े रहें, लेकिन साथ ही आधुनिक ज्ञान, विज्ञान और तकनीक में भी दक्ष हों।

स्वतंत्र भारत के शिक्षा मंत्री के रूप में योगदान

साल 1947 में स्वतंत्रता के बाद मौलाना आज़ाद को देश का पहला शिक्षा मंत्री बनाया गया। यह जिम्मेदारी उन्होंने लगभग 11 वर्षों तक (1947–1958) निभाई। इस अवधि में उन्होंने भारतीय शिक्षा व्यवस्था को संगठित और संस्थागत रूप देने के लिए अनेक ऐतिहासिक कदम उठाए। उनके कार्यकाल में उच्च शिक्षा आयोग, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) जैसी संस्थाओं की नींव रखी गई, जिससे विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता और स्वायत्तता को बढ़ावा मिला। उन्होंने उच्च शिक्षा के विस्तार के साथ-साथ तकनीकी शिक्षा को भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना। इसी दृष्टि के परिणामस्वरूप भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IITs) की स्थापना की दिशा में ठोस पहल हुई।

संस्कृति, कला और भाषा के संरक्षण पर बल 

मौलाना आज़ाद का शिक्षा दर्शन केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित नहीं था। वे मानते थे कि कला, संस्कृति, साहित्य और भाषाएँ किसी भी राष्ट्र की आत्मा होती हैं। उनके प्रयासों से साहित्य अकादमी, संगीत नाटक अकादमी और ललित कला अकादमी जैसी संस्थाओं का गठन हुआ, जिनका उद्देश्य भारतीय सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण और संवर्धन था। साथ ही उन्होंने मातृभाषा में शिक्षा को विशेष महत्व दिया। उनका विचार था कि प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा में होने से बच्चों की समझ और रचनात्मकता बेहतर विकसित होती है। साथ ही वे हिंदी, उर्दू और अन्य भारतीय भाषाओं के विकास के भी प्रबल समर्थक थे।

महिला शिक्षा और अल्पसंख्यक उत्थान

मौलाना आज़ाद महिला शिक्षा के प्रबल पक्षधर थे। वे मानते थे कि जब तक महिलाएँ शिक्षित नहीं होंगी, तब तक समाज का वास्तविक विकास संभव नहीं है। उन्होंने बालिकाओं की शिक्षा को बढ़ावा देने और शिक्षा में लैंगिक समानता स्थापित करने के लिए नीतिगत समर्थन दिया। साथ ही अल्पसंख्यक समुदायों के लिए भी उनका दृष्टिकोण अत्यंत समावेशी था। वे चाहते थे कि शिक्षा सभी समुदायों को मुख्यधारा से जोड़े और किसी भी प्रकार के भेदभाव को समाप्त करे। आज अल्पसंख्यक शिक्षा से जुड़े कई कार्यक्रम उनकी इसी सोच की विरासत हैं।

आज के संदर्भ में मौलाना आज़ाद की प्रासंगिकता 

आज जब भारत नई शिक्षा नीति, डिजिटल लर्निंग और कौशल आधारित शिक्षा की ओर बढ़ रहा है, तब मौलाना आज़ाद के विचार और भी अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं। उन्होंने जिस समानता, गुणवत्ता और नैतिक मूल्यों पर आधारित शिक्षा की कल्पना की थी, वही आज के समय की भी आवश्यकता है। उनकी सोच हमें यह सिखाती है कि शिक्षा को केवल बाज़ार की ज़रूरतों से नहीं, बल्कि समाज और मानवता की भलाई से जोड़कर देखना चाहिए।

निष्कर्ष: 
मौलाना अबुल कलाम आज़ाद केवल एक शिक्षा मंत्री नहीं, बल्कि आधुनिक भारत के शैक्षिक वास्तुकार थे। उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम उनके दिखाए मार्ग पर चलते हुए शिक्षा को अधिक समावेशी, मानवीय और राष्ट्र निर्माणकारी बनाएँगे। सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके विचारों को न केवल याद करें, बल्कि उन्हें अपने आचरण और नीतियों में भी उतारें।

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