भारत के ट्रकिंग सेक्टर का इलेक्ट्रिक ट्रांजिशन हर नागरिक के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?

भारत के ट्रकिंग सेक्टर का इलेक्ट्रिक ट्रांजिशन हर नागरिक के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?

भारत के ट्रकिंग सेक्टर का इलेक्ट्रिक ट्रांजिशन हर नागरिक के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत में बढ़ती माल ढुलाई की मांग के बीच मध्यम और भारी-भरकम ट्रकों का विद्युतीकरण लॉजिस्टिक्स लागत, डीजल आयात, उत्सर्जन और वायु प्रदूषण को कम करने के लिए जरूरी है।

माल ढुलाई (Freight Transportation) लॉजिस्टिक्स सेक्टर का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है और किसी भी देश के आर्थिक विकास में इसका महत्वपूर्ण योगदान होता है। भारत का ट्रकिंग सेक्टर केवल जलवायु परिवर्तन का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह लॉजिस्टिक्स लागत, ऊर्जा सुरक्षा और सबसे महत्वपूर्ण रूप से नागरिक कल्याण से जुड़ा विषय है। घर, फैक्ट्री, दुकान या निर्माण स्थल तक पहुंचने वाले हर उत्पाद की कीमत में डीजल पर निर्भरता, ट्रैफिक प्रतिबंधों, अक्षम माल ढुलाई और प्रदूषित हवा की छिपी हुई लागत शामिल होती है। जैसे-जैसे भारत की अर्थव्यवस्था बढ़ेगी, यह लागत भी बढ़ती जाएगी, जब तक कि माल परिवहन को स्वच्छ, किफायती और अधिक कुशल नहीं बनाया जाता।

TERI के अनुसार, वर्ष 2019-20 में भारत की माल ढुलाई की मांग 2,682 बिलियन टन-किलोमीटर (BTKM) थी, जो वर्ष 2070 तक 11 गुना बढ़ने का अनुमान है। वर्तमान में भारत की लगभग 70% माल ढुलाई सड़क परिवहन के माध्यम से होती है, जिसमें अधिकांश हिस्सा मध्यम और भारी-भरकम ट्रकों (Medium and Heavy-Duty Trucks - MHDTs) द्वारा संभाला जाता है। भारत में बढ़ती माल ढुलाई की मांग को देखते हुए, ट्रकों की संख्या वर्ष 2022 के 40 लाख से बढ़कर वर्ष 2050 तक लगभग 1.7 करोड़ होने का अनुमान है।

मध्यम और भारी-भरकम ट्रक, जिनमें क्रमशः N2 और N3 श्रेणियां शामिल हैं, विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये लंबी दूरी वाले कॉरिडोर, औद्योगिक क्लस्टर, थोक बाजारों और शहरी वितरण नेटवर्क में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हालांकि, यही ट्रक डीजल खपत, ईंधन आयात, विदेशी मुद्रा पर दबाव और परिवहन से होने वाले उत्सर्जन में भी महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। यही कारण है कि भारत के ऊर्जा संक्रमण में ट्रकिंग सेक्टर सबसे रणनीतिक क्षेत्रों में से एक है। इसलिए ट्रकों का विद्युतीकरण केवल पर्यावरणीय पहल नहीं, बल्कि इसे आर्थिक सुधार के रूप में भी देखा जाना चाहिए।

पायलट से बड़े पैमाने तक

यह महत्वपूर्ण है कि लंबी दूरी वाले मार्गों पर इलेक्ट्रिक ट्रकों की तैनाती के लिए कॉरिडोर और उपयोग के आधार पर योजनाएं तैयार की जाएं। इसके साथ ही ठोस कचरा प्रबंधन या जल प्रबंधन जैसी नगर सेवाओं के लिए शहरी क्षेत्रों में इलेक्ट्रिक ट्रकों के उपयोग पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।

इलेक्ट्रिक ट्रकों की व्यवहार्यता को लेकर सरकार और विभिन्न थिंक टैंक्स द्वारा वर्ष 2020 की शुरुआत से कई अध्ययन किए गए हैं। इन अध्ययनों में भारतीय राजमार्गों पर इलेक्ट्रिक ट्रकों के संचालन के लिए कई उच्च-घनत्व वाले कॉरिडोर की पहचान की गई है। वर्ष 2024 में भारी उद्योग मंत्रालय ने एक अध्ययन कर 20 प्राथमिकता वाले राजमार्गों की पहचान की। इसके बाद भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार (PSA) के कार्यालय ने पिछले अध्ययनों के आधार पर एक विस्तृत अध्ययन किया और 10 प्राथमिकता वाले कॉरिडोर की पहचान की। ये कॉरिडोर देश के प्रमुख उपभोग केंद्रों को विनिर्माण केंद्रों से जोड़ते हैं।

इसके परिणामस्वरूप इलेक्ट्रिक ट्रक अब केवल पायलट प्रोजेक्ट तक सीमित नहीं रह गए हैं। कई कंपनियां पायलट और टेस्टिंग चरण से आगे बढ़कर दोहरे अंकों में इलेक्ट्रिक ट्रकों की तैनाती कर रही हैं। अडानी पोर्ट्स, अल्ट्राटेक सीमेंट, डालमिया भारत, IKEA और CONCOR सहित कई प्रमुख कंपनियों ने ई-ट्रकों की तैनाती शुरू की है।

Laneshift, जो Climate Group और C40 Cities की एक सहयोगी पहल है, ने बेंगलुरु-चेन्नई कॉरिडोर पर एक पायलट अध्ययन किया। यह देश के सबसे व्यस्त कॉरिडोर में से एक है और PSA अध्ययन में भी इसे प्राथमिकता वाले कॉरिडोर के रूप में चिन्हित किया गया है। इस पायलट के तहत छह अलग-अलग माल ढुलाई क्षेत्रों में तीन ग्रॉस व्हीकल कैटेगरी के कुल 20 इलेक्ट्रिक ट्रकों को तैनात किया गया और इनके संचालन व प्रदर्शन से जुड़े महत्वपूर्ण आंकड़े जुटाए गए।

हालांकि शुरुआती लागत अभी भी एक चुनौती बनी हुई है, लेकिन इस अध्ययन की एक महत्वपूर्ण finding यह रही कि 55 टन क्षमता वाले इलेक्ट्रिक ट्रक की पूरी लाइफटाइम लागत डीजल ट्रक की तुलना में केवल 3-4% अधिक थी और संचालन के एक वर्ष के भीतर इस अंतर को बराबर किया जा सकता था।

सहायक नीतियां और प्रोत्साहन

नीतिगत सपोर्ट भी अब इस अवसर के अनुरूप विकसित हो रहा है। PM E-Drive योजना के तहत इलेक्ट्रिक ट्रकों की तैनाती के लिए सहायता दी जा रही है और कई राज्य नीतियां भी स्वच्छ वाणिज्यिक वाहनों को बढ़ावा दे रही हैं। दिल्ली की EV 2.0 नीति विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र भारत की सबसे अधिक माल-ढुलाई वाली शहरी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। दिल्ली और इसके आसपास बड़ी संख्या में वेयरहाउस, औद्योगिक क्षेत्र, थोक बाजार और वितरण केंद्र स्थित हैं।

हालांकि, वर्तमान नीतिगत फोकस भारी-भरकम N3 श्रेणी के वाहनों की तुलना में छोटे वाणिज्यिक वाहनों पर अधिक है। यह एक महत्वपूर्ण कमी है। N3 श्रेणी के ट्रक बड़ी मात्रा में माल ढोते हैं, प्रति वाहन अधिक ईंधन की खपत करते हैं और लॉजिस्टिक्स दक्षता व उत्सर्जन पर इनका प्रभाव काफी अधिक होता है। यदि नीतिगत समर्थन इस सेगमेंट तक नहीं पहुंचता है, तो इलेक्ट्रिक ट्रक ट्रांजिशन अधूरा रहेगा।

दिल्ली की ईवी नीति में छोटे N1 और N2 श्रेणी के ट्रकों के लिए किए गए नीतिगत प्रयासों के बावजूद, HDT यानी N3 श्रेणी के ट्रकों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। ये वाहन माल ढुलाई और उत्सर्जन में बड़ा योगदान देते हैं और इनकी संख्या में भी उल्लेखनीय वृद्धि होने का अनुमान है।

यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि दिल्ली और इसके आसपास बड़ी संख्या में वेयरहाउस, वितरण केंद्र, थोक बाजार और औद्योगिक हब मौजूद हैं, जिनकी माल ढुलाई की जरूरतें MHDTs द्वारा पूरी की जाती हैं। हालांकि, दिल्ली में दिन के समय MHDTs के प्रवेश पर प्रतिबंधों के कारण इनके संचालन के लिए सीमित समय उपलब्ध होता है। इससे लॉजिस्टिक्स दक्षता कम होती है और छिपी हुई लॉजिस्टिक्स लागत बढ़ती है।

दिल्ली में गैर-पीक घंटों के दौरान MHDTs की आवाजाही को बिना प्रतिबंध के अनुमति देने जैसी नीतिगत पहल माल ढुलाई की दक्षता में महत्वपूर्ण सुधार कर सकती है। इससे संचालन के घंटे बढ़ेंगे, प्रति दिन अधिक यात्राएं संभव होंगी और लॉजिस्टिक्स लागत कम होगी।

इसके अलावा, खरीद सब्सिडी, रोड टैक्स में छूट और रजिस्ट्रेशन फीस माफ करने जैसे उपाय इलेक्ट्रिक ट्रकों को ट्रांसपोर्टर्स और फ्लीट ओनर्स के लिए आर्थिक रूप से अधिक आकर्षक बना सकते हैं। N1 और N2 श्रेणी के ट्रकों के लिए मौजूदा नियमों और प्रोत्साहनों के साथ MHDTs के लिए इन उपायों को लागू करने से विशेष रूप से दिल्ली-NCR क्षेत्र में उत्सर्जन और लॉजिस्टिक्स लागत को कम करने में महत्वपूर्ण योगदान मिल सकता है।

अंत में, दिल्ली में प्रस्तावित नीतियों की तरह सरकारी और सरकार से जुड़ी एजेंसियों के लिए नगर सेवाओं, खाद्यान्न और जल वितरण तथा LPG वितरण जैसे कार्यों में केवल इलेक्ट्रिक ट्रकों की खरीद को अनिवार्य किया जा सकता है। इससे ई-ट्रक निर्माताओं के लिए एक सुनिश्चित बाजार तैयार होगा और उनके निवेश जोखिम को कम करने में मदद मिलेगी।

निष्कर्ष

भारत का फ्रेट ट्रांजिशन अब केवल भविष्य की जलवायु महत्वाकांक्षा नहीं है, बल्कि यह तत्काल आर्थिक, ऊर्जा सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य की प्राथमिकता बन चुका है। जैसे-जैसे माल ढुलाई की मांग बढ़ेगी, मध्यम और भारी-भरकम ट्रकों का विद्युतीकरण आयातित ईंधन पर निर्भरता कम करने, छिपी हुई लॉजिस्टिक्स लागत घटाने और शहरों में वायु गुणवत्ता सुधारने में मदद कर सकता है। अगला कदम बिखरे हुए प्रोत्साहनों से आगे बढ़कर एक समन्वित बड़े पैमाने की रणनीति तैयार करना है। इसमें कॉरिडोर-आधारित योजना, N3 ट्रकों के लिए लक्षित समर्थन, संचालन संबंधी विशेष सुविधाएं और सरकारी व बड़े निजी माल-ढुलाई खरीदारों से सुनिश्चित मांग शामिल होनी चाहिए।

(सह-लेखक: अरुण कुमार और शरीफ क़मर,टेरी | विचार व्यक्तिगत हैं।)

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