परीक्षा व्यवस्था में एकाधिकार खत्म करना सुधार है, विवाद नहीं

परीक्षा व्यवस्था में एकाधिकार खत्म करना सुधार है, विवाद नहीं

परीक्षा व्यवस्था में एकाधिकार खत्म करना सुधार है, विवाद नहीं
परीक्षा एजेंसियों में प्रतिस्पर्धा बढ़ाने और पारदर्शिता लाने के लिए किए गए सुधारों को विवाद नहीं, व्यवस्था को मजबूत करने की पहल के रूप में देखने की जरूरत


कई वर्षों तक भारत की बड़ी सार्वजनिक परीक्षाओं का संचालन कुछ चुनिंदा और स्थापित परीक्षा एजेंसियों के हाथों में रहा। यह स्थिति उन्हें किसी विशेष सुविधा के कारण नहीं मिली थी, बल्कि वर्षों के अनुभव, मजबूत ढांचे और बड़े स्तर पर काम करने की क्षमता के आधार पर बनी थी। लेकिन जब सरकार और संबंधित संस्थाओं ने समय-समय पर टेंडर की पात्रता शर्तों की समीक्षा शुरू की और नई एजेंसियों को भी अवसर मिलने लगे, तो इसका उद्देश्य किसी खास संस्था को लाभ पहुंचाना या नियमों में ढील देना नहीं था।

असल मकसद यह था कि परीक्षा व्यवस्था में अधिक भागीदारी हो, पारदर्शिता बढ़े, नई तकनीकों का उपयोग हो और लंबे समय से सीमित दायरे में काम कर रहे इस क्षेत्र में बेहतर प्रतिस्पर्धा और आधुनिक प्रक्रियाओं को बढ़ावा मिले।

नई एजेंसियों पर बढ़ा विवाद, लेकिन क्यों?

इसके बाद जो हुआ, वह लगभग तय था। नई एजेंसियों और उन्हें अवसर देने वाले संस्थानों की लगातार आलोचना होने लगी। कुछ आलोचनाएं वास्तविक कार्यान्वयन संबंधी समस्याओं पर आधारित थीं, लेकिन अधिकतर सवाल इस बात पर उठाए गए कि आखिर नई एजेंसियों को मौका दिया ही क्यों गया। धीरे-धीरे यह धारणा बनने लगी कि परीक्षा में कहीं भी पेपर लीक, तकनीकी गड़बड़ी या किसी प्रकार की अनियमितता सामने आए, तो नई एजेंसियों को भी बिना किसी प्रत्यक्ष संबंध के उसी विवाद से जोड़ दिया जाए।

सोशल मीडिया पर यह धारणा और मजबूत हुई कि टेंडर की शर्तों में बदलाव सुधार के लिए नहीं, बल्कि कुछ चुनिंदा नई कंपनियों को पीछे के रास्ते से प्रवेश दिलाने के लिए किया गया था। इस तरह, कुछ घटनाओं की आलोचना धीरे-धीरे पूरी सुधार प्रक्रिया पर सवाल उठाने में बदल गई।

लेकिन यह कहना कि टेंडर की नई शर्तें केवल कुछ खास कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए बनाई गई थीं, तथ्यों पर आधारित नहीं है। यह केवल एक ऐसी कहानी है जो पहले से मौजूद शंकाओं के अनुरूप लगती है, लेकिन इसके समर्थन में ठोस प्रमाण नहीं हैं। कोई भी टेंडर दस्तावेज किसी नई एजेंसी को उन गलतियों का दोषी नहीं ठहराता, जिनसे उसका कोई संबंध नहीं है। इसी तरह, केवल पात्रता शर्तों में बदलाव यह साबित नहीं करता कि अधिकारियों ने जानबूझकर किसी विशेष कंपनी को लाभ पहुंचाने की कोशिश की।

सुधार का उद्देश्य प्रतिस्पर्धा और पारदर्शिता बढ़ाना था

वास्तविकता यह है कि नियामक संस्थाओं ने वही किया, जो समय-समय पर किया जाना चाहिए। उन्होंने यह समीक्षा की कि क्या वर्षों पहले बनाई गई पात्रता शर्तें आज भी छात्रों के हित में हैं या फिर वे केवल कुछ पुरानी एजेंसियों के प्रभुत्व को बनाए रखने का माध्यम बन गई हैं।

इस क्षेत्र पर लंबे समय से नजर रखने के बाद यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि पुरानी एजेंसियों का लंबे समय तक काम करना कभी गलत नहीं था और उनकी भूमिका पर पुनर्विचार करना भी उनके खिलाफ कोई हमला नहीं है। यह किसी संस्था विशेष का नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था का मुद्दा है। यदि कोई प्रणाली दो दशक तक केवल कुछ चुनिंदा एजेंसियों पर निर्भर रहती है, तो उसमें प्रतिस्पर्धा कम हो जाती है, सुधार की गति धीमी पड़ जाती है और किसी बड़ी विफलता की स्थिति में विकल्प भी सीमित रह जाते हैं।

इसी कारण पात्रता शर्तों की समीक्षा आवश्यक थी। इसका उद्देश्य किसी पुरानी एजेंसी के प्रदर्शन पर सवाल उठाना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना था कि परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता केवल कुछ सीमित संस्थाओं पर निर्भर न रहे।

हर विवाद में सुधार के मूल उद्देश्य को न भूलें

दुर्भाग्य से हर नए विवाद के बीच इस सुधार का मूल उद्देश्य पीछे छूट जाता है। यह बदलाव किसी एक समूह को हटाकर दूसरे समूह को स्थापित करने के लिए नहीं था। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि कोई भी संस्था, चाहे वह कितनी ही सक्षम क्यों न हो, हमेशा बिना प्रतिस्पर्धा के काम न करती रहे। स्वस्थ प्रतिस्पर्धा ही धोखाधड़ी रोकने, सर्वर सुरक्षा मजबूत करने, तकनीकी क्षमता बढ़ाने और शिकायत निवारण प्रणाली को बेहतर बनाने के लिए प्रेरित करती है। लेकिन जब हर विवाद में नई एजेंसियों को बिना कारण शामिल कर लिया जाता है या सुधार की पूरी प्रक्रिया को ही विवाद का रूप दे दिया जाता है, तो इस सुधार के वास्तविक उद्देश्य को समझाना और भी कठिन हो जाता है।

इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि जवाबदेही खत्म कर दी जाए। नई हों या पुरानी, सभी एजेंसियों को अपनी-अपनी गलतियों के लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। टेंडर प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होनी चाहिए और उसकी निष्पक्ष समीक्षा भी जरूरी है। लेकिन जांच और आलोचना का आधार प्रत्येक परीक्षा में हुई वास्तविक घटनाएं होनी चाहिए, न कि केवल यह तथ्य कि अब इस क्षेत्र में नई एजेंसियां भी काम कर रही हैं।

यदि इन दोनों बातों को एक साथ मिला दिया जाएगा, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान छात्रों को होगा। इससे परीक्षा प्रणाली में आवश्यक सुधार लागू करना कठिन हो जाएगा और व्यवस्था फिर उसी सोच पर निर्भर रह जाएगी कि जो संस्थाएं वर्षों से यह काम करती आई हैं, वही इसे सबसे बेहतर तरीके से कर सकती हैं। जबकि वास्तविक सुधार का उद्देश्य परीक्षा प्रणाली को अधिक खुला, प्रतिस्पर्धी, पारदर्शी और भविष्य के लिए अधिक सक्षम बनाना है।

(लेखक : जयप्रकाश गांधी, करियर सलाहकार एवं विश्लेषक, व्यक्त किए गए विचार निजी हैं।)

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