भारत में इलेक्ट्रिक मोबिलिटी का भविष्य केवल इलेक्ट्रिक वाहनों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि कनेक्टेड, सॉफ्टवेयर-डिफाइंड और ऑटोनॉमस मोबिलिटी के रूप में विकसित होगा। हालांकि भारत का रास्ता दुनिया के अन्य देशों से अलग होगा, क्योंकि यहां की सड़कें, ट्रैफिक और उपयोग की परिस्थितियां विशिष्ट हैं। यह बात वीर्य ऑटोनॉमस टेक्नोलॉजीज़ (Virya Autonomous Technologies Pvt. Ltd.) के सीटीओ सबरीश गुरुसुब्रमणियन ने "The Next Inflection: Autonomous, Connected & Electric – India’s Practical Path" विषय पर चर्चा के दौरान कही।
उन्होंने बताया कि Virya Autonomous Technologies, MINI Group का हिस्सा है, जिसने 1973 से डिजाइन और मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में मजबूत पहचान बनाई है। इसी समूह ने भारत की पहली बड़े पैमाने पर निर्मित इलेक्ट्रिक कार Reva भी विकसित की थी। उसी विरासत को आगे बढ़ाते हुए कंपनी आज भारत में ऑटोनॉमस मोबिलिटी समाधान विकसित कर रही है।
कनेक्टिविटी अब केवल फीचर नहीं, बल्कि पूरी मोबिलिटी का आधार
सबरीश ने कहा कि पहले कनेक्टेड व्हीकल का मतलब केवल इंफोटेनमेंट या रोडसाइड असिस्टेंस जैसी सुविधाएं होता था, लेकिन आज कनेक्टिविटी पूरे वाहन की क्षमता को उसके जीवनकाल में लगातार बेहतर बनाने का माध्यम बन चुकी है। यही अवधारणा Software Defined Vehicles (SDV) की नींव है, जिसमें वाहन की अधिकांश क्षमताएं सॉफ्टवेयर अपडेट और डेटा के जरिए समय के साथ विकसित होती रहती हैं।
उन्होंने कहा कि भविष्य में Physical AI यानी मशीनों में मौजूद वास्तविक बुद्धिमत्ता (Intelligence) हर प्रकार की मोबिलिटी और मशीन का अभिन्न हिस्सा होगी। यही तकनीक ड्राइवर असिस्टेंस सिस्टम, ऑटोनॉमस व्हीकल और स्मार्ट इलेक्ट्रिक प्लेटफॉर्म को नई दिशा देगी।
भारत में ऑटोनॉमस तकनीक पहले से काम कर रही है
कंपनी आज भारत में पूरी तरह ऑटोनॉमस इलेक्ट्रिक मोबिलिटी प्लेटफॉर्म विकसित कर चुकी है, जो नियंत्रित औद्योगिक परिसरों में लोगों और सामग्री का परिवहन करते हैं। कंपनी के 90 से ज्यादा ऑटोनॉमस रोबोट देशभर के कारखानों में कार्यरत हैं और वे 1.66 लाख घंटे से अधिक स्वायत्त संचालन पूरा कर चुके हैं। यह साबित करता है कि ऑटोनॉमस तकनीक भविष्य नहीं बल्कि वर्तमान की वास्तविकता बन चुकी है।
भारतीय परिस्थितियों के लिए अलग सोच की जरूरत
सबरीश ने कहा कि भारत के लिए विकसित किए जाने वाले ADAS (Advanced Driver Assistance Systems) और ऑटोनॉमस समाधान वैश्विक मॉडलों की नकल नहीं हो सकते। भारतीय सड़कों पर लेन मार्किंग हमेशा स्पष्ट नहीं होती और चालक अक्सर वास्तविक सड़क की स्थिति के अनुसार अपनी लेन तय करते हैं। इसलिए यहां की तकनीक को केवल लेन लाइनों पर नहीं बल्कि पूरे ड्राइविंग स्पेस को समझना होगा।
भारतीय ट्रैफिक में हर मोड़ और हर चौराहा एक प्रकार की "नेगोशिएशन" है, जहां चालक एक-दूसरे के व्यवहार को देखकर निर्णय लेते हैं। ऐसे व्यवहार को समझने वाली कृत्रिम बुद्धिमत्ता विकसित करना भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती और अवसर दोनों है।
अधिक अलर्ट नहीं, सही समय पर सही सहायता जरूरी
यदि वाहन हर छोटी गतिविधि पर लगातार चेतावनी देने लगेंगे तो चालक "अलर्ट फटीग" का शिकार हो जाएंगे और अंततः इन प्रणालियों को नजरअंदाज करने लगेंगे। इसलिए भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप ऐसे स्मार्ट ADAS सिस्टम विकसित करने होंगे जो केवल आवश्यक परिस्थितियों में ही चालक को सचेत करें।
इसके अलावा भारत में दोपहिया वाहनों की बड़ी संख्या को देखते हुए ड्राइवर असिस्टेंस सिस्टम को विशेष रूप से दोपहिया चालकों और उनके व्यवहार को समझने के लिए प्रशिक्षित करना आवश्यक है। इससे सड़क सुरक्षा में महत्वपूर्ण सुधार लाया जा सकता है।
नियंत्रित परिसरों में ऑटोनॉमस मोबिलिटी की बड़ी संभावना
फिलहाल सार्वजनिक सड़कों पर पूर्ण स्वायत्त वाहन संचालन में समय लगेगा, लेकिन फैक्ट्री, वेयरहाउस, औद्योगिक परिसरों और बंद परिसरों में ऑटोनॉमस इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए अपार संभावनाएं मौजूद हैं। इन स्थानों पर सीमित गति, नियंत्रित वातावरण और स्पष्ट संचालन नियम होने के कारण स्वायत्त तकनीक को सुरक्षित और प्रभावी ढंग से लागू किया जा सकता है। हालांकि यहां भी रोबोट और इंसानों के बीच सुरक्षित सहयोग सुनिश्चित करना सबसे महत्वपूर्ण चुनौती होगी। इसके लिए डेटा आधारित परीक्षण, निगरानी और चरणबद्ध विस्तार की आवश्यकता है।
डेटा और ऊर्जा मिलकर तय करेंगे भविष्य
सबरीश ने कहा कि आने वाले वर्षों में कनेक्टेड और ऑटोनॉमस वाहनों से प्राप्त होने वाला डेटा ऊर्जा प्रबंधन को अधिक कुशल बनाएगा। यही डेटा बैटरी की कार्यक्षमता बढ़ाने, संचालन लागत कम करने और वाहनों की उपलब्धता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
उन्होंने बैटरी स्वैपिंग को भी भारत के इलेक्ट्रिक भविष्य का अहम हिस्सा बताया। उन्होंने कहा कि जब वाहन पूरी तरह कनेक्टेड और स्वायत्त होंगे, तब कई घंटे चार्जिंग में लगाने के बजाय बैटरी स्वैपिंग के माध्यम से लगभग बिना डाउनटाइम के लगातार संचालन संभव होगा। इससे रेंज एंग्जायटी भी काफी हद तक समाप्त होगी।
हार्डवेयर के साथ सॉफ्टवेयर पर भी देना होगा बराबर ध्यान
अपने संबोधन के अंत में उन्होंने कहा कि भारत इलेक्ट्रिक वाहनों के हार्डवेयर, बैटरी, चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और मैन्युफैक्चरिंग में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है, लेकिन अब समय आ गया है कि देश वाहन के ऊपर काम करने वाली सॉफ्टवेयर लेयर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डेटा प्लेटफॉर्म विकसित करने पर भी उतना ही ध्यान दे।
उन्होंने कहा कि भारत के पास विश्वस्तरीय इंजीनियरिंग प्रतिभा और तकनीकी क्षमता है। यदि देश हार्डवेयर के साथ-साथ सॉफ्टवेयर आधारित मोबिलिटी समाधान विकसित करने पर भी जोर देता है, तो भारत वैश्विक ऑटोनॉमस और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी क्षेत्र में नेतृत्व करने की क्षमता रखता है।