भारत के छोटे और मध्यम उद्यम (SMEs) भी प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए इन तकनीकों को तेजी से अपना रहे हैं।
लेकिन AI को अपनाने की इस दौड़ में कई कंपनियां एक बेहद महत्वपूर्ण सवाल को नजरअंदाज कर देती हैं। AI टूल्स भले ही काम को तेज और आसान बनाने का वादा करते हों, लेकिन क्या कंपनियां वास्तव में जानती हैं कि उनका डेटा कहां जा रहा है, उसका उपयोग कैसे हो रहा है और क्या उसे बाहरी AI मॉडल को प्रशिक्षित करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है?
भारत में AI का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है, इसलिए यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो गया है। EY-CII की एक रिपोर्ट के अनुसार, 47 प्रतिशत भारतीय कंपनियों में AI के कई उपयोग पहले से ही लागू हैं, जबकि 23 प्रतिशत कंपनियां AI परियोजनाओं का मूल्यांकन कर रही हैं। वहीं, 76 प्रतिशत बिजनेस लीडर्स का मानना है कि आने वाले वर्षों में AI उनके संगठनों पर बड़ा प्रभाव डालेगा।
इसके बावजूद अधिकांश कंपनियां AI से मिलने वाले उत्पादकता लाभों पर ज्यादा ध्यान देती हैं, जबकि सुरक्षा, डेटा संरक्षण और गवर्नेंस जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं को कम महत्व देती हैं। SMEs के लिए AI अपनाने से पहले कुछ जरूरी सवाल पूछना बेहद आवश्यक है। उनका डेटा कहां स्टोर हो रहा है? उसे कौन एक्सेस कर सकता है? क्या डेटा का उपयोग AI मॉडल को प्रशिक्षित करने के लिए किया जा रहा है? क्या प्लेटफॉर्म भारतीय डेटा सुरक्षा नियमों का पालन करता है? यदि संवेदनशील जानकारी लीक हो जाए तो क्या होगा? और सबसे महत्वपूर्ण, AI का उपयोग सुरक्षित और जिम्मेदारी से कैसे किया जाए?
ये चिंताएं इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि अधिकांश AI प्लेटफॉर्म थर्ड-पार्टी इंफ्रास्ट्रक्चर पर काम करते हैं और बड़ी मात्रा में बिजनेस डेटा को प्रोसेस करते हैं। यदि पर्याप्त निगरानी और नियंत्रण न हो तो कंपनियां अनजाने में ग्राहकों की जानकारी, वित्तीय रिकॉर्ड, बौद्धिक संपदा, अनुबंध, सोर्स कोड और अन्य संवेदनशील डेटा को जोखिम में डाल सकती हैं। जैसे-जैसे AI व्यापार का हिस्सा बनता जा रहा है, सुरक्षा को बाद में सोचने वाली चीज नहीं माना जा सकता। इसे हर संगठन की AI रणनीति का मुख्य हिस्सा बनाना होगा।
Utho Cloud के फाउंडर और सीईओ मनोज धांडा का मानना है कि भारत का SME क्षेत्र एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। उनके अनुसार AI टूल्स छोटे और मध्यम व्यवसायों को अपने काम को स्वचालित करने, ग्राहक सेवा बेहतर बनाने और बड़ी कंपनियों से प्रतिस्पर्धा करने में मदद कर रहे हैं। लेकिन वे एक महत्वपूर्ण सवाल उठाते हैं क्या व्यवसाय यह जानते हैं कि उनका डेटा वास्तव में कहां जा रहा है? उनके अनुसार यह सिर्फ एक सवाल नहीं, बल्कि आज हर SME मालिक के लिए सबसे महत्वपूर्ण चिंता है।
धांडा का कहना है कि कई कंपनियां AI अपनाने के साथ आने वाले डेटा जोखिमों को पूरी तरह नहीं समझतीं। जब भारतीय SMEs ग्राहक सेवा, HR या वित्तीय विश्लेषण के लिए विदेशी AI टूल्स का उपयोग करते हैं, तो उनका डेटा अक्सर भारत के बाहर स्थित सर्वरों पर प्रोसेस होता है। कई मामलों में यही डेटा उन AI मॉडलों को प्रशिक्षित करने के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है जो इन सेवाओं को संचालित करते हैं। ऐसे में व्यवसायों के पास अपने डेटा पर सीमित नियंत्रण और बहुत कम पारदर्शिता होती है।
AI सुरक्षा को लेकर चिंता केवल छोटे व्यवसायों तक सीमित नहीं है। दुनिया की बड़ी टेक कंपनियां भी अब AI सुरक्षा और गवर्नेंस को प्राथमिकता दे रही हैं। धांडा बताते हैं कि Google Cloud का AI Threat Defense, OpenAI का Daybreak Security Framework और Anthropic का Claude Mythos जैसे प्रयास इस बात का संकेत हैं कि दुनिया की सबसे बड़ी तकनीकी कंपनियां भी समझ चुकी हैं कि सुरक्षा के बिना AI एक अवसर से ज्यादा जोखिम बन सकता है। यदि इतनी बड़ी कंपनियों के लिए यह चिंता का विषय है, तो सीमित संसाधनों वाले SMEs के लिए इसका महत्व और भी बढ़ जाता है।
समस्या केवल डेटा की सुरक्षा तक सीमित नहीं है। हर नया AI एप्लिकेशन किसी संगठन की तकनीकी प्रणाली में नए प्रवेश बिंदु भी बनाता है, जिससे सुरक्षा प्रबंधन और जटिल हो जाता है।
Teamtrace के फाउंडर अमिताभ रॉय के अनुसार, जब कोई SME AI आधारित प्रोडक्टिविटी टूल अपनाता है, चाहे वह शेड्यूलिंग असिस्टेंट हो, टाइमशीट एनालाइजर, प्रोजेक्ट फोरकास्टिंग इंजन या ग्राहक सेवा चैटबॉट, तो वह केवल एक नया सॉफ्टवेयर नहीं जोड़ रहा होता। वह अपने सिस्टम में डेटा एक्सेस का एक नया रास्ता भी बना रहा होता है। AI टूल और अन्य प्लेटफॉर्म्स के बीच बनने वाला हर API कनेक्शन एक संभावित सुरक्षा जोखिम पैदा कर सकता है।
SMEs के लिए यह चुनौती इसलिए भी बड़ी है क्योंकि AI टूल्स को अक्सर बहुत तेजी से लागू किया जाता है। टीम कोई नया समाधान देखती है, उसका डेमो करती है और कुछ ही दिनों में उसे अपने काम का हिस्सा बना लेती है। इस प्रक्रिया में सुरक्षा समीक्षा, डेटा गवर्नेंस जांच और एक्सेस कंट्रोल मूल्यांकन को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। परिणामस्वरूप AI टूल्स कर्मचारी रिकॉर्ड, वेतन संबंधी जानकारी, ग्राहक डेटा और अन्य महत्वपूर्ण व्यावसायिक सूचनाओं तक पहुंच बना लेते हैं।
यदि पर्याप्त निगरानी नहीं हो तो कंपनियों को यह एहसास भी नहीं होता कि उनका सुरक्षा जोखिम लगातार बढ़ रहा है। इससे साइबर हमलों की संभावना बढ़ सकती है और इसका प्रभाव केवल AI टूल तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे संगठन की तकनीकी प्रणाली को प्रभावित कर सकता है।
साइबर सुरक्षा के अलावा, AI अपनाने से जुड़े नियामकीय और कानूनी पहलू भी महत्वपूर्ण हैं। जैसे-जैसे AI सिस्टम ग्राहकों, कर्मचारियों और व्यवसायों का अधिक डेटा इस्तेमाल करने लगते हैं, कंपनियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनकी AI रणनीति भारत के बदलते डेटा संरक्षण नियमों के अनुरूप हो।
रॉय के अनुसार, कई संगठन अनजाने में डेटा अनुपालन संबंधी जोखिम उठा रहे हैं। यदि कोई कंपनी Data Processing Agreement, डेटा रेजिडेंसी मूल्यांकन और एक्सेस रिव्यू के बिना AI टूल को लागू करती है, तो वह डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) कानून के तहत जोखिम में आ सकती है।
DPDP कानून का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत 'Purpose Limitation' है। इसका मतलब है कि किसी एक उद्देश्य के लिए एकत्र किया गया डेटा बिना स्पष्ट सहमति के किसी दूसरे उद्देश्य के लिए उपयोग नहीं किया जा सकता। उदाहरण के लिए, यदि कोई AI टूल कर्मचारियों के टाइमशीट डेटा का उपयोग अपने मॉडल को प्रशिक्षित करने के लिए करने लगे, तो इसके लिए स्पष्ट जानकारी और सहमति आवश्यक होगी। लेकिन वर्तमान में कई SMEs के AI उपयोग में ऐसे सुरक्षा उपाय मौजूद नहीं हैं।
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि सुरक्षित AI अपनाना पूरी तरह संभव है। इसके लिए कंपनियों को AI से जुड़े जोखिमों को उसी गंभीरता से लेना होगा, जिस तरह वे वित्तीय, कानूनी और परिचालन जोखिमों को लेती हैं।
धांडा सलाह देते हैं कि SMEs को सबसे पहले अपने AI प्रदाताओं से कठिन लेकिन जरूरी सवाल पूछने चाहिए। उन्हें यह जानना चाहिए कि डेटा कहां स्टोर होगा, उसका उपयोग कैसे किया जाएगा, क्या उसे मॉडल ट्रेनिंग के लिए इस्तेमाल किया जाएगा और डेटा सुरक्षा नीतियां क्या हैं। यदि इन सवालों के स्पष्ट जवाब नहीं मिलते, तो यह अपने आप में चिंता का विषय है।
कंपनियों को ऐसे क्लाउड समाधान भी चुनने चाहिए जो भारतीय नियमों के अनुरूप हों। इसका मतलब है ऐसे सेवा प्रदाता चुनना जो भारतीय कानूनों के तहत काम करें, डेटा को देश के भीतर सुरक्षित रखें और डेटा सुरक्षा को लेकर स्पष्ट अनुबंधीय आश्वासन दें।
अंततः AI सुरक्षा को बाद में जोड़ी जाने वाली सुविधा नहीं माना जाना चाहिए। इसे AI अपनाने की पूरी रणनीति की नींव बनाना होगा। आने वाले वर्षों में वही कंपनियां AI का सबसे अधिक लाभ उठा पाएंगी जो शुरुआत से ही भरोसे, सुरक्षा, अनुपालन और गवर्नेंस को प्राथमिकता देंगी।
भारत के SMEs देश की अर्थव्यवस्था की मजबूत रीढ़ हैं। AI के माध्यम से विकास और नवाचार की नई संभावनाएं खुल रही हैं, लेकिन इसके साथ यह सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है कि उनका डेटा सुरक्षित रहे, नियमों के अनुरूप हो और पूरी तरह उनके नियंत्रण में बना रहे। भविष्य में AI की सफलता केवल इस बात पर निर्भर नहीं करेगी कि कंपनियां AI का कितना उपयोग करती हैं, बल्कि इस पर भी निर्भर करेगी कि वे इसे कितनी जिम्मेदारी और सुरक्षा के साथ अपनाती हैं।