देबाशीष चटर्जी ने बताया कि आज की दुनिया में मैनेजमेंट संस्थानों की भूमिका सिर्फ करियर बनाने तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि छात्रों को जीवन की चुनौतियों और अनिश्चितताओं से निपटने के लिए तैयार करना भी उतना ही जरूरी हो गया है।
एंटरप्रेन्योर इंडिया के एडिटर संजीव कुमार झा के साथ हुई बातचीत में IIM-Kozhikode के डायरेक्टर देबाशीष चटर्जी ने भारतीय विचारों की वैश्विक पहचान, AI की सीमाओं, नेतृत्व की नई परिभाषा और शिक्षा के भविष्य पर अपने विचार साझा किए। यह बातचीत केरल के कुन्नामंगलम में स्थित IIM-Kozhikode परिसर में हुई।
“Globalizing Indian Thought” का क्या मतलब है?
IIM-Kozhikode के Logo में लिखे “Globalizing Indian Thought” के बारे में पूछे जाने पर देबाशीष चटर्जी ने कहा कि भारत पहले से ही एक वैश्विक सोच वाला देश रहा है। उन्होंने कहा कि भारत दुनिया की लगभग एक-छठी आबादी का प्रतिनिधित्व करता है और यहां की बौद्धिक क्षमता दुनिया में बेहद मजबूत है।
उन्होंने आगे कहा कि भारत के उत्पाद भले ही दुनिया के बाजारों में उतने दिखाई न देते हों, लेकिन भारतीय दिमाग और सोच हर जगह मौजूद है। दुनिया के बड़े टेक्नोलॉजी और AI सिस्टम्स के पीछे भारतीय प्रतिभा काम कर रही है।
उनका कहना था कि भारतीय विचारों को “वैश्विक” बनाने की जरूरत नहीं है, बल्कि दुनिया को यह समझने की जरूरत है कि भारतीय सोच पहले से ही वैश्विक प्रभाव रखती है। भारत की सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत केवल इतिहास तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में फैली हुई है।
भारतीय सोच हमेशा वैश्विक रही है
देबाशीष चटर्जी ने कहा कि भारत की सोच कभी सीमित या केवल स्थानीय नहीं रही। उन्होंने बताया कि भारतीय दर्शन हमेशा पूरी दुनिया और प्रकृति को साथ लेकर सोचता रहा है।
उनके अनुसार पश्चिमी दार्शनिक शहरों से निकले, इसलिए उनकी सोच अधिक व्यक्तिगत और रेखीय (Linear) रही। जबकि भारतीय ऋषि जंगलों और प्रकृति से जुड़े रहे, इसलिए भारतीय सोच हमेशा पर्यावरण, संतुलन और समग्रता पर आधारित रही। उन्होंने कहा कि “ग्लोबलाइजेशन” कोई नई चीज नहीं है। भारत प्राचीन समय से ही पूरी दुनिया को एक परिवार के रूप में देखता आया है।
भारत में चिंतन की परंपरा मजबूत रही है
देबाशीष चटर्जी ने कहा कि भारत में शिक्षा को हमेशा पवित्र माना गया है और यही वजह है कि भारतीय लोग तकनीक, सॉफ्टवेयर और नेतृत्व के क्षेत्रों में दुनिया भर में आगे रहे हैं। देबाशीष चटर्जी ने इसी संदर्भ में आगे कहा कि भारतीयों में “ऋषि” और “राजा” दोनों बनने की क्षमता है। एक रास्ता चिंतन और ज्ञान का है, जबकि दूसरा नेतृत्व और क्रियान्वयन का।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि सिलिकॉन वैली में जहां भी उच्च स्तर की बुद्धिमत्ता और नेतृत्व की जरूरत होती है, वहां भारतीय लोग शीर्ष पदों पर दिखाई देते हैं।
IIM-K जैसी संस्थाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती धारणा की है
उन्होंने कहा कि भारत के बड़े शिक्षण संस्थानों को अक्सर खुद को कम आंकने की आदत रही है।
देबाशीष चटर्जी ने बताया कि उन्होंने ऑक्सफोर्ड और हार्वर्ड जैसे संस्थानों में पढ़ाया है और वहां जाकर महसूस किया कि भारतीय संस्थान भी वैश्विक स्तर पर किसी से कम नहीं हैं। उन्होंने कहा कि IIM-Kozhikode आज दुनिया की कई प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटीज के साथ वैश्विक रैंकिंग में खड़ा है, लेकिन भारतीय संस्थान लंबे समय तक खुद को वैश्विक स्तर पर देखने से डरते रहे।
AI कभी ह्यूमन इंटेलिजेंस की जगह नहीं ले सकता
AI पर बात करते हुए देबाशीष चटर्जी ने कहा कि AI सिर्फ एक “प्रोडक्टिविटी टूल” है। यह पहले से मौजूद जानकारी को व्यवस्थित और तेज तरीके से इस्तेमाल कर सकता है, लेकिन बुद्धिमत्ता, समझ और संवेदनशीलता पैदा नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि शिक्षा केवल जानकारी देना नहीं है, बल्कि यह समझ विकसित करना है कि जानकारी का सही उपयोग कैसे किया जाए। AI जानकारी दे सकता है, लेकिन “ज्ञान” और “विवेक” नहीं दे सकता।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि AI डेटा के आधार पर फैसले ले सकता है, लेकिन वह इंसानी भावनाओं, सामाजिक प्रभावों और प्रकृति के संतुलन को पूरी तरह नहीं समझ सकता।
Generative AI के पीछे भी इंसानी दिमाग है
देबाशीष चटर्जी ने कहा कि लोग AI को बहुत बड़ा बदलाव मान रहे हैं, लेकिन यह समझना जरूरी है कि AI खुद कुछ नहीं बनाता। उन्होंने आगे कहा, “Generative AI को भी ह्यूमन इंटेलिजेंस ही बनाती है। AI सिर्फ इंसानी सोच का विस्तार है।”
उनका मानना है कि मशीनें तेज और दोहराए जाने वाले काम बेहतर कर सकती हैं, लेकिन सहानुभूति, संवेदनशीलता और मानवीय जुड़ाव जैसी चीजें केवल इंसान ही दे सकता है। उन्होंने आगे कहा कि AI किसी बीमार व्यक्ति की देखभाल, अलग तरह से सीखने वाले छात्र को समझना या भावनात्मक सहयोग देना पूरी तरह नहीं कर सकता।
AI को समझना जरूरी है, लेकिन उस पर पूरी तरह निर्भर होना सही नहीं
उन्होंने बताया कि IIM-कोझिकोड ने AI को लेकर एक नीति बनाने के लिए समिति बनाई है, लेकिन AI इतनी तेजी से बदल रहा है कि कोई भी नीति जल्दी पुरानी हो सकती है।
इसलिए संस्थान छात्रों को AI का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है, लेकिन साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि वे अपनी मौलिक सोच और योगदान को अलग से दिखाएं। उनका कहना था कि AI का इस्तेमाल जरूरी है, लेकिन छात्रों को यह समझना होगा कि वे AI से अलग क्या नया सोच सकते हैं।
विश्वविद्यालय में मशीन नहीं, इंसान से सीखने आते हैं छात्र
देबाशीष चटर्जी ने न्यूजीलैंड के एक उदाहरण का जिक्र करते हुए कहा कि वहां एक यूनिवर्सिटी ने ऐसा कोर्स शुरू किया था जिसमें AI ही कोर्स डिजाइन, पढ़ाई और मूल्यांकन करता। लेकिन छात्रों ने उसे स्वीकार नहीं किया। चटर्जी ने आगे कहा कि छात्र विश्वविद्यालय केवल जानकारी लेने नहीं आते, बल्कि यह सीखने आते हैं कि “कैसे सीखना है” और यह काम केवल इंसान ही सिखा सकता है।
तनाव खत्म करने से पहले तनाव पैदा ही क्यों हो?
गैर-पारंपरिक कोर्सेस जैसे स्ट्रेस मैनेजमेंट पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि आज लोग समस्याओं का समाधान सिखाते हैं, लेकिन कोई यह नहीं सिखाता कि समस्याएं पैदा ही न हों। उन्होंने कहा कि असली जरूरत मन को प्रशिक्षित करने की है। इंसान का वही दिमाग वायरस भी बनाता है और एंटी-वायरस भी। इसलिए मानसिक संतुलन और जागरूकता सबसे जरूरी है।
हर मैनेजमेंट छात्र के लिए सबसे जरूरी कौशल- जागते रहो
जब उनसे पूछा गया कि आज के कठिन और अनिश्चित समय में छात्रों को कौन-सी सबसे जरूरी सीख अपनानी चाहिए, तो उन्होंने कहा “जागते रहो।”
उनका कहना था कि लोगों में क्षमता जगाने पर कम ध्यान दिया जाता है। समाज केवल लोगों से काम निकालना चाहता है, लेकिन उनके विकास पर ध्यान नहीं देता। उन्होंने आगे कहा कि शिक्षा का असली उद्देश्य इंसान की सोच और क्षमता को विकसित करना होना चाहिए।
IIM-Kozhikode की सफलता का रहस्य
IIM-Kozhikode को देश के शीर्ष संस्थानों में शामिल किए जाने पर देबाशीष चटर्जी ने कहा कि इसके पीछे लगातार मेहनत, धैर्य, सकारात्मक सोच और टीमवर्क है। वहीं उन्होंने बताया कि संस्थान ने समय-समय पर नए और प्रासंगिक कोर्स शुरू किए, जिनमें Executive Post Graduate Programme (EPGP) जैसी पहलें शामिल हैं।
उनका कहना था कि IIM-Kozhikode की पूरी टीम भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए लगातार काम कर रही है, ताकि छात्रों को बदलती दुनिया के लिए तैयार किया जा सके।