आज एआई का दौर है। तकनीक, शिक्षा और चिकित्सा समेत कई अन्य क्षेत्रों में इसका व्यापक, व्यावहारिक और सकारात्मक उपयोग हो रहा है, और ये उपयोग नई-पुरानी समस्याओं का प्रभावी व त्वरित समाधान भी बनते दिख रहे हैं। स्कूल-कॉलेज में एआई को सिर्फ पाठ्यक्रम के विषय के रूप में नहीं, बल्कि पढ़ाने के माध्यम के रूप में भी अपनाने की होड़ सी मची हुई है।
लेकिन इस उपयोग का एक दूसरा और इतना ही महत्वपूर्ण पहलू और भी है, जिसे अनदेखा करना भविष्य के लिए घातक हो सकता है। यह बात और महत्वपूर्ण इसलिए भी हो जाती है, क्योंकि ऐसा मानने वाला कोई आम व्यक्ति नहीं, बल्कि देश के प्रतिष्ठित शिक्षाविदों में एक, उच्च शिक्षा प्रशासक, नेशनल बोर्ड ऑफ एक्रेडिटेशन (NBA) के पूर्व चेयरमैन, गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ यूनिवर्सिटी के संस्थापक वाइस चांसलर, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, कुरुक्षेत्र में 27 वर्षों तक शिक्षण व रिसर्च से जुड़े रहे और साउथ एशियन यूनिवर्सिटी के वर्तमान प्रेसिडेंट और कंप्यूटर साइंस के दिग्गज प्रो. (डॉ) केके अग्रवाल हैं।
डॉ अग्रवाल ने फ्रैंचाइज इंडिया डॉट कॉम के एडिटर संजीव कुमार झा से लंबी बातचीत में साउथ एशियन यूनिवर्सिटी के विस्तार, विदेशी छात्रों की भागीदारी, एआई के बढ़ते प्रभाव और उच्च शिक्षा में रिसर्च व एम्प्लॉयबिलिटी के बीच संतुलन की जरूरत पर विस्तार से चर्चा की। पेश है उस बातचीत के प्रमुख अंश:
प्रश्न: साउथ एशियन यूनिवर्सिटी की शुरुआत सार्क देशों के द्वारा और उन्हें के छात्रों के लिए आपसी के सहयोग से हुई थी। पिछले 15-16 वर्षों में यह अपने मूल उद्देश्य को कितना हासिल कर पाई है अगले 10-12 वर्षों के लिए क्या विजन है?
प्रो. अग्रवाल: इस उद्देश्य को किसी प्रतिशत या आंकड़े में बताना आसान नहीं है। लेकिन यह अपने आप में एक अनूठा प्रोजेक्ट है, जिसमें सार्क देश मिलकर विशेष रूप से शिक्षा के क्षेत्र में योगदान दे रहे हैं।
इसकी मूल सोच यह थी कि कुछ विषय ऐसे होते हैं, जिनमें विशेषज्ञता विकसित करने की लागत बहुत अधिक होती है। जबकि प्रत्येक देश में ऐसे विशेषज्ञों की जरूरत सीमित होती है। उदाहरण के लिए, नैनोटेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में किसी छोटे देश को कुछ ही विशेषज्ञों की आवश्यकता हो सकती है, लेकिन उनके लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना काफी महंगा होता है। यदि ऐसे विषयों की पढ़ाई और रिसर्च के लिए एक साझा संस्थान बनाया जाए तो सभी देशों को लाभ मिल सकता है।
दूसरा उद्देश्य दक्षिण एशियाई देशों के बीच आपसी समझ और सहयोग को बढ़ाना था। पड़ोसी देशों के छात्र एक साथ पढ़ें, एक.दूसरे की संस्कृति को समझें और साझा समस्याओं पर काम करें। भारत ने इस पहल में प्रमुख भूमिका निभाते हुए जमीन, भवन और वित्तीय सहयोग उपलब्ध कराया। वहीं आज विश्वविद्यालय के पास भारत सरकार द्वारा उपलब्ध कराई गई 100 एकड़ जमीन पर विकसित कैंपस है। भवनों के निर्माण पर लगभग 1,200 करोड़ रुपये का निवेश किया गया है।
प्रश्न: वर्तमान में हम जहां बैठकर बातचीत कर रहे हैं, वह इस विश्वविद्यालय का तीसरा कैंपस है। यहां कुछ नए विषय भी पाठ्यक्रम में शामिल किए गए हैं। आपके हिसाब से किसी भी विश्वविद्यालय को अपने प्राठ्यक्रम की कितने समय या वर्षों में समीक्षा करनी ही चाहिए?
प्रो. अग्रवाल: इस विश्वविद्यालय की शुरुआत जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) के परिसर से हुई थी। लगभग दो साल तक यह जेएनयू से संचालित हुआ। इसके बाद यह अकबर होटल के अकबर हाउस में कुछ सरकारी कार्यालयों के साथ कई वर्षों तक चलता रहा। वर्तमान में हम जहां बैठकर बात कर रहे हैं, यह स्थायी कैंपस तैयार होने के बाद विस्तार की संभावनाएं बढ़ीं। पहले विश्वविद्यालय मुख्य रूप से पोस्टग्रेजुएट और पीएचडी कार्यक्रमों तक सीमित था। लगभग एक दशक में यहां करीब 600 छात्र आए, जिनमें लगभग 300 पोस्टग्रेजुएट और 300 पीएचडी छात्र थे।
नए कैंपस के साथ हमने महसूस किया कि विश्वविद्यालय में विशेषज्ञता और अकादमिक विविधता बढ़ाने के लिए अंडरग्रेजुएट कार्यक्रम भी शुरू होने चाहिए। इसके बाद अंडरग्रेजुएट, पोस्टग्रेजुएट और पीएचडी स्तर पर पढ़ाई का विस्तार किया गया। पिछले करीब ढाई वर्षों में छात्रों की संख्या लगभग चार गुना बढ़कर 2,400 से अधिक हो गई है। हमने कई नए क्षेत्रों में कार्यक्रम शुरू किए हैं। बीटेक में एआई, क्वांटम, साइबर सिक्योरिटी, डेटा साइंस और मैथमेटिक्स एंड कंप्यूटिंग जैसे विषयों पर फोकस किया जा रहा है।
कानून के क्षेत्र में पहले केवल एलएलएम कार्यक्रम था। हमने एलएलबी भी शुरू किया। चूंकि आठों सदस्य देशों की कानूनी व्यवस्थाओं में समानताएं भी हैं और कुछ महत्वपूर्ण अंतर भी, इसलिए इस विषय पर विशेषज्ञों के समूह ने अध्ययन किया। इसी तरह इस वर्ष जर्नलिज्म से जुड़ा प्राठ्यक्रम शुरू किया गया है। क्लाइमेट चेंज, ग्रीन ट्रांजिशन और सस्टेनेबिलिटी जैसे क्षेत्रों पर भी ध्यान दिया जा रहा है, क्योंकि ये विश्वविद्यालय के क्षेत्रीय सहयोग और भविष्य की जरूरतों से जुड़े महत्वपूर्ण विषय हैं।
हमारा उद्देश्य केवल कार्यक्रमों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि ऐसे क्षेत्रों में शिक्षा उपलब्ध कराना है जिनमें विशेषज्ञता विकसित करने के लिए बेहतर अकादमिक सुविधाओं और शोध की जरूरत होती है।
प्रश्न: पिछले कुछ समय के दौरान भू-राजनीतिक अस्थिरताओं के चलते विश्वविद्यालय में भारत के बाहर से आने वाले छात्रों की संख्या का कितना असर पड़ा है?
प्रो. अग्रवाल: हमारे मॉडल में लगभग 40 प्रतिशत छात्रों के भारत के बाहर से आने का लक्ष्य रखा गया था। शुरुआत में विदेशी छात्रों की संख्या लगभग 30-40 थी। आज कुल छात्रों में विदेशी छात्रों की हिस्सेदारी करीब 15 प्रतिशत है। इसके पीछे कई कारण हैं। पाकिस्तान सहित कुछ देशों से आने वाले छात्रों के मामलों में वीजा और सुरक्षा संबंधी प्रक्रियाएं महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। बांग्लादेश और अफगानिस्तान से छात्रों की भागीदारी भी परिस्थितियों के अनुसार प्रभावित होती है।
विश्वविद्यालय की फंडिंग में भारत लगभग 60 प्रतिशत योगदान देता है, जबकि शेष योगदान अन्य सदस्य देशों के बीच विभाजित है। हालांकि सभी देशों का योगदान हर समय एक जैसा नहीं रहता। ऐसे में विश्वविद्यालय के संचालन में भारत की वित्तीय भूमिका और भारतीय छात्रों की हिस्सेदारी बढ़ जाती है। साथ ही विदेशी छात्रों की भागीदारी बढ़ाना विश्वविद्यालय के मूल क्षेत्रीय उद्देश्य के लिए महत्वपूर्ण है। इसके लिए सदस्य देशों के बीच अकादमिक सहयोग और छात्रों की आवाजाही को बेहतर बनाना आवश्यक होगा।
प्रश्न: जेएनयू और दिल्ली यूनिवर्सिटी जैसे संस्थानों के मुकाबले छात्रों में इस एशियाई यूनिवर्सिटी के नाम और पहचान की वैसी चर्चा नहीं होती है। इसका क्या कारण है? क्या ब्रांडिंग पर कम फोकस करना रणनीति का हिस्सा है?
प्रो. अग्रवाल: विश्वविद्यालय का डिजाइन ही छोटे और विशेष संस्थान के रूप में किया गया था। मौजूदा कैंपस की अधिकतम क्षमता लगभग 4,500 छात्रों की है। इसके विपरीतए दिल्ली की कई बड़ी यूनिवर्सिटी में लाखों छात्र पढ़ते हैं। इसलिए हमारे लिए मास ब्रांडिंग की जरूरत और उसका तरीका अलग है।
हमारा मानना है कि विश्वविद्यालय की पहचान उसकी अकादमिक गुणवत्ता, रिसर्च और छात्रों के अनुभव से बननी चाहिए। हमारा मॉडल भी पारंपरिक विश्वविद्यालयों से अलग है, क्योंकि यह आठ देशों के सहयोग से संचालित होता है। हमारे गवर्निंग बोर्ड में सदस्य देशों के उच्च शिक्षा नियामक संस्थानों के प्रमुख शामिल हैं। विश्वविद्यालय के अकादमिक निर्णयों और मान्यता का ढांचा सामान्य राष्ट्रीय विश्वविद्यालयों से अलग है। हमारी ब्रांडिंग का मुख्य आधार गुणवत्ता होना चाहिए।
प्रश्न: क्या साउथ एशियन यूनिवर्सिटी अन्य सहयोगी देशों में भी कैंपस शुरू करने पर काम कर रही है? अगर ऐसा है तो पड़ोसी देशों में एसएयू के नए कैंपस कब तक शुरू हो सकते हैं?
प्रो. अग्रवाल: इस दिशा में विचार चल रहा है। श्रीलंका और नेपाल जैसे देशों में संभावनाएं देखी गई हैं, लेकिन योजनाओं को अभी पूरी तरह अंतिम रूप नहीं दिया गया है।
कैंपस खोलने के लिए संबंधित देश में जमीनए भवन और वित्तीय संसाधनों की जरूरत होगी। भारत जैसे बड़े देश के लिए जिस स्तर का निवेश संभव है, उसे छोटे देशों के लिए करना कठिन हो सकता है। इसलिए किसी मौजूदा विश्वविद्यालय या संस्थान के परिसर के एक हिस्से का इस्तेमाल करने जैसे विकल्पों पर विचार किया जा सकता है। इसके साथ यह भी निर्धारित करना होगा कि नए कैंपस के निर्माण और संचालन में भारत तथा अन्य सदस्य देशों का योगदान कितना होगा। मेरी राय में जिस देश में जिस विषय या कोर्स की अधिक जरूरत है, वहां उसके अनुरूप कार्यक्रम शुरू किए जा सकते हैं।
प्रश्न: साउथ एशियन यूनिवर्सिटी के कोर्स दूसरे भारतीय विश्वविद्यालयों के कार्यक्रमों के मुकाबले कितने अलग और कितने समान हैं?
प्रो. अग्रवाल: हमारे लगभग 80 प्रतिशत छात्र भारत से हैं और उनमें से बड़ी संख्या को आगे भारतीय रोजगार बाजार में अवसर तलाशने होंगे। इसलिए हमने यह सुनिश्चित करने की कोशिश की है कि हमारे कोर्स राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) और भारतीय उच्च शिक्षा व्यवस्था के अनुरूप व्यापक रूप से संगत रहें। हालांकि हमारा विश्वविद्यालय एक अलग इंटर-गवर्नमेंटल या अंतर-सरकारी ढांचे के तहत काम करता है, फिर भी हमारी कोशिश यही रहती है कि छात्रों को रोजगार या आगे की पढ़ाई में अनावश्यक कठिनाइयों का सामना नहीं करना पड़े। इसी उद्देश्य से पाठ्यक्रम तैयार करते समय भारतीय अकादमिक व्यवस्था और रोजगार बाजार की जरूरतों को ध्यान में रखा जाता है।
प्रश्न: आज इंडस्ट्री और एकेडेमिया के बीच स्किल्स को लेकर अंतर की बात होती है। साउथ एशियन यूनिवर्सिटी इस चुनौती से कैसे निपट रही है?
प्रो. अग्रवाल: पहले जब विश्वविद्यालय में लगभग 600 छात्र थे और हर साल करीब 200 छात्र पास होते थे, तब भी उनका रोजगार रिकॉर्ड अच्छा था। हमारे पूर्व छात्रों ने अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और दुनिया के अन्य हिस्सों में अवसर हासिल किए हैं।
लेकिन छात्र संख्या बढ़ने के साथ प्लेसमेंट की चुनौती भी बढ़ती है। इसलिए हमने प्लेसमेंट के लिए विशेष प्रयास शुरू किए हैं, खास तौर पर अंडरग्रेजुएट कार्यक्रमों में। इस स्तर पर रोजगार की तैयारी और इंडस्ट्री से जुड़ाव के लिए अलग तरह की रणनीति की जरूरत होती है। हमारे पास अच्छी फैकल्टी, इंफ्रास्ट्रक्चर और जरूरी सुविधाएं हैं। अब आवश्यकता ऐसे समर्पित प्रयासों की है, जो छात्रों को रोजगार के अवसरों से जोड़ें। विश्वविद्यालय के लिए प्लेसमेंट महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे केवल नौकरी दिलाने तक सीमित नहीं रखा जा सकता।
प्रश्न: यूनिवर्सिटी एआई से जुड़े कोर्स और अपने दैनिक संचालन में एआई का इस्तेमाल किस तरह कर रही है?
प्रो. अग्रवाल: यहां दो पहलू हैं। पहला, छात्रों को एआई की शिक्षा देना और दूसरा, प्रशासनिक तथा अकादमिक कामकाज में इसका इस्तेमाल करना। पिछले कुछ वर्षों में एआई का विस्तार बहुत तेजी से हुआ है। इसलिए इसके प्रभाव, उपयोग और सीमाओं को लेकर अभी भी भ्रम बना हुआ है। इतिहास में कोई भी तकनीक केवल लाभ या केवल नुकसान लेकर नहीं आई है। उदाहरण के लिए, परमाणु ऊर्जा का इस्तेमाल विनाशकारी हथियारों के साथ बिजली उत्पादन के लिए भी हुआ है। एआई के मामले में भी हमें इसके सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं के बीच संतुलन बनाना होगा।
मेरी राय में एआई को गंभीरता से लेना जरूरी है। जो संस्थान इसे पूरी तरह नजरअंदाज करेंगे, वे पीछे रह सकते हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि हर काम में एआई का इस्तेमाल किया जाए। हमें यह समझना होगा कि किसी विशेष काम में इसका वास्तविक लाभ क्या है। बिना जरूरत इसका इस्तेमाल करना भी उचित नहीं है। आज बहुत बड़ी मात्रा में डेटा इकट्ठा किया जा रहा है। उदाहरण के लिए, किसी हेल्थ ऐप से रोजाना चलने की दूरी और समय की जानकारी मिलती है, लेकिन कई बार उससे जरूरत से ज्यादा बारीक डेटा भी उपलब्ध कराया जाता है।
सवाल यह है कि क्या हर स्थिति में इतनी जानकारी इकट्ठा करना जरूरी है? डेटा को स्टोर करने और प्रोसेस करने के लिए डेटा सेंटर्स को ऊर्जा की जरूरत होती है। इसलिए हमें यह समझना होगा कि कौन.सा डेटा वास्तव में उपयोगी है और कितना डेटा जमा करना आवश्यक है। वहीं एआई के विकास के साथ डेटा की उपयोगिता, ऊर्जा की खपत और तकनीक के व्यावहारिक लाभों का आकलन भी जरूरी है। मेरा मानना है कि एआई को अपनाने का निर्णय वास्तविक जरूरत और उसके प्रभाव के आधार पर होना चाहिए, न कि केवल इसलिए कि वह एक लोकप्रिय तकनीक बन गई है।
प्रश्न: वर्तमान में जानकारों का एक बड़ा वर्ग मानता है कि देशभर के विश्वविद्यालय खुद को एक दोराहे पर खड़ा पा रहे हैं। एक तरफ उन पर त्वरित रोजगार लायक युवा तैयार करने की तात्कालिक जिम्मेदारी है। दूसरी तरफ ऐसे अधिक से अधिक युवाओं को भी तैयार करना है जो उच्च से उच्चतर शिक्षा की ओर उन्मुख हों, अनुसंधान एवं विकास के माध्यम से समाज को नई दिशा दे सकें। ऐसे में क्या आपको लगता है कि विश्वविद्यालयों पर एंप्लॉयबिलिटी का अनावश्यक दबाव है?
प्रो. अग्रवाल: मैं इससे सहमत हूं कि विश्वविद्यालयों पर एम्प्लॉयबिलिटी का दबाव बढ़ा है। खासकर निजीकरण के बाद शिक्षा के साथ मार्केटिंग का पहलू अधिक मजबूत हुआ और प्लेसमेंट को संस्थानों की उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया जाने लगा। लेकिन शिक्षा केवल शॉर्ट.टर्म रोजगार पाने का माध्यम नहीं है। यह जीवनभर सीखनेए सोच विकसित करने और आगे बढ़ने की क्षमता तैयार करने का साधन है।
विश्वविद्यालय की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि छात्र को पहली नौकरी मिली या नहींए बल्कि यह भी देखना चाहिए कि 15-20 साल बाद वह अपने क्षेत्र में कहां पहुंचा है और क्या वह अपने लिए नए अवसर तैयार कर पा रहा है। प्लेसमेंट और एम्प्लॉयबिलिटी पर काम करना जरूरी हैए लेकिन इन्हें विश्वविद्यालय का एकमात्र या सर्वोच्च उद्देश्य नहीं बनाया जाना चाहिए।
प्रश्न: क्या आपको लगता है कि रोजगार पर अत्यधिक फोकस भविष्य में उच्च शिक्षा के शोध और अनुसंधान जैसे महत्वपूर्ण लक्ष्यों को चुनौतीपूर्ण बना सकते हैं?
प्रो. अग्रवाल: यह जोखिम तब बढ़ता है, जब संस्थान केवल उन उपलब्धियों पर ध्यान देते हैं जिन्हें आसानी से दिखाया या प्रचारित किया जा सकता है। किसी विश्वविद्यालय के लिए छात्र संख्या और प्लेसमेंट के आंकड़े महत्वपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन शिक्षा के दीर्घकालिक प्रभाव को समझना भी उतना ही जरूरी है। साथ ही मेरा मानना है कि विश्वविद्यालयों को ज्ञान निर्माण, रिसर्च और एम्प्लॉयबिलिटी के बीच संतुलन बनाना चाहिए। यदि शिक्षा की गुणवत्ता अच्छी है तो इंडस्ट्री को भी उसके परिणामों का लाभ मिलना चाहिए।
अंततः विश्वविद्यालय का उद्देश्य केवल छात्रों को नौकरी के लिए तैयार करना नहीं, बल्कि उन्हें ऐसा ज्ञान, क्षमता और समझ देना है जिससे वे बदलती परिस्थितियों में सीखते रहें, समस्याओं को हल कर सकें और लंबे समय तक अपने क्षेत्र में योगदान दे सकें।