भारत में रिकवरी एजेंटों की मनमानी: जब कर्ज वसूली बन जाती है मानसिक यातना

भारत में रिकवरी एजेंटों की मनमानी: जब कर्ज वसूली बन जाती है मानसिक यातना

भारत में रिकवरी एजेंटों की मनमानी: जब कर्ज वसूली बन जाती है मानसिक यातना
एक्सपर्ट पैनल के विश्लेषण के मुताबिक, 35% उधारकर्ताओं ने बताया कि उन्हें रिकवरी एजेंटों की प्रताड़ना झेलनी पड़ी, जबकि 17% लोगों ने गंभीर धमकी और डराने-धमकाने की शिकायत की।


भारत में लाखों लोगों के लिए लोन की किस्त समय पर न चुका पाना सिर्फ एक आर्थिक समस्या नहीं रह जाती, बल्कि यह मानसिक रूप से परेशान करने वाला अनुभव बन जाता है। गाली-गलौज भरे फोन कॉल, धमकियां, घर पर आकर दबाव बनाना और लोगों के सामने बदनाम करना रिकवरी एजेंटों ने कर्ज वसूली को भारी तनाव का कारण बना दिया है। कोविड-19 के बाद यह समस्या और भी ज्यादा बढ़ गई है।

सरकारी आंकड़े कुछ जानकारी देते हैं, लेकिन असली समस्या इससे कहीं बड़ी है। कई उधारकर्ता महंगी ईएमआई, नौकरी की अनिश्चितता और आक्रामक रिकवरी तरीकों के बीच फंस जाते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि वे मानसिक रूप से टूट जाते हैं और सामाजिक रूप से कमजोर हो जाते हैं।

एक्सपर्ट पैनल के सर्वे ने दिखाई डरावनी सच्चाई

एक्सपर्ट पैनल, जो कर्ज के तनाव और रिकवरी एजेंटों की प्रताड़ना से जूझ रहे लोगों को सलाह देने वाला एक डेट-रिज़ॉल्यूशन प्लेटफॉर्म है, ने एक विशेष सर्वे किया। इस सर्वे में पूरे भारत के उधारकर्ताओं के मामलों और पूछताछ का विश्लेषण किया गया, और स्थिति बेहद चिंताजनक पाई गई।

सर्वे के अनुसार, 60% उधारकर्ता या तो सिर्फ न्यूनतम राशि चुका पा रहे थे या उन्होंने भुगतान पूरी तरह बंद कर दिया था। करीब 60% लोगों ने बताया कि उनकी ईएमआई उनके पूरे पारिवारिक मासिक आय के बराबर या उससे ज्यादा थी। वहीं 40% लोग नई उधारी लेकर या क्रेडिट कार्ड का बकाया बढ़ाकर पुराना कर्ज चुका रहे थे, जो साफ तौर पर कर्ज के जाल में फंसने का संकेत है।

कर्ज लेने की वजहें और बढ़ती मुश्किलें

सर्वे में यह भी सामने आया कि कर्ज लेने की मुख्य वजहें क्या थीं। 26% लोगों ने मेडिकल इमरजेंसी के लिए लोन लिया था, 22% ने शादी, पढ़ाई या अन्य पारिवारिक जरूरतों के लिए। बाकी मामलों में नौकरी छूटना, बिजनेस में नुकसान या घरेलू खर्च कारण बने। एक से ज्यादा लोन, ज्यादा ब्याज दर और जुर्माने ने हालात और मुश्किल बना दिए।

प्रताड़ना सिर्फ आंकड़ों की बात नहीं

एक्सपर्ट पैनल के विश्लेषण के मुताबिक, 35% उधारकर्ताओं ने बताया कि उन्हें रिकवरी एजेंटों की प्रताड़ना झेलनी पड़ी, जबकि 17% लोगों ने गंभीर धमकी और डराने-धमकाने की शिकायत की।

आम तौर पर इस्तेमाल किए जाने वाले तरीकों में शामिल थे
- लगातार और बहुत ज्यादा फोन कॉल, कई बार एक दिन में 100 से भी ज्यादा, कानूनी कार्रवाई या पुलिस में शिकायत की धमकी, घर या ऑफिस आकर परेशान करना, परिवार के सदस्यों, नियोक्ता या जान-पहचान वालों से संपर्क करना और लोगों के सामने बदनाम करना और सामाजिक दबाव बनाना आदि।

इस संदर्भ में एक उधारकर्ता ने बताया, “मुझे रोज 300 से ज्यादा कॉल आ रहे हैं। वे मेरे ऑफिस, बॉस और रिश्तेदारों को भी फोन करते हैं। कुछ लोग मेरे घर भी आए हैं। इस दबाव का मेरी मानसिक सेहत पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है।” एक अन्य व्यक्ति ने कहा, “एजेंट मेरे घर आए और पड़ोसियों के सामने चिल्लाने लगे।”

इसके अतिरिक्त कई लोगों ने ऑफिस में परेशान किए जाने, गाली-गलौज और बार-बार कानूनी कार्रवाई की धमकियों की बात कही। गंभीर मामलों में ब्लैकमेल करना, घर की फोटो भेजना और ऐसे संदेश देना शामिल था, जिससे लोग पूरी तरह टूट जाएं। कुछ मामलों में तो उधारकर्ताओं को यह तक कहा गया कि बीमा क्लेम के लिए आत्महत्या कर लें।

मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर

इस तरह की प्रताड़ना का मानसिक असर बहुत गंभीर होता है। एक्सपर्ट पैनल की काउंसलिंग के दौरान कई लोगों ने तेज चिंता, डिप्रेशन और आत्महत्या के विचार होने की बात कही। एक परेशान व्यक्ति ने कहा, “कई बार आत्महत्या करने का मन हुआ, लेकिन परिवार की वजह से रुक गया। मैं बहुत परेशान हूं।” अन्य लोगों ने बताया कि लगातार कॉल और गालियां उन्हें पूरी तरह फंसा हुआ और निराश महसूस कराती हैं।

ये अनुभव दिखाते हैं कि रिकवरी एजेंटों की प्रताड़ना सिर्फ पैसों की समस्या नहीं है, बल्कि यह एक सार्वजनिक स्वास्थ्य का मुद्दा है, जो खासकर कमजोर लोगों को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है।

सरकारी आंकड़े भी इसी ओर इशारा करते हैं

एक्सपर्ट पैनल के सर्वे के अलावा, रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की इंटीग्रेटेड ओम्बड्समैन स्कीम के आंकड़े भी इसी ट्रेंड की पुष्टि करते हैं। अप्रैल 2021 से नवंबर 2022 के बीच डिजिटल लेंडिंग ऐप्स और रिकवरी एजेंटों की प्रताड़ना से जुड़ी करीब 13,000 शिकायतें दर्ज हुईं।

वित्त वर्ष 2023-24 तक यह संख्या बढ़कर 85,281 हो गई, जो साल-दर-साल 42.7% की बढ़ोतरी है। यह RBI ओम्बड्समैन को मिली कुल शिकायतों का लगभग 29% हिस्सा है। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रताड़ना के 5% से भी कम मामले ही ओम्बड्समैन तक पहुंचते हैं, यानी असली संख्या रिपोर्टेड मामलों से 10 से 20 गुना ज्यादा हो सकती है।

वर्तमान में सुधार की तुरंत जरूरत है

भारत में क्रेडिट बाजार, खासकर बिना गारंटी वाले लोन, तेजी से बढ़े हैं, लेकिन उधारकर्ताओं की सुरक्षा पीछे रह गई है। 30 दिन की प्रतीक्षा अवधि जैसी प्रक्रियात्मक देरी, RBI ओम्बड्समैन तक पहुंचने में भी रुकावट बनती है, जिससे समय पर राहत मिलना मुश्किल हो जाता है।

प्रताड़ना कर्ज वसूली का सही तरीका नहीं है यह इंसान की गरिमा का उल्लंघन है। निष्पक्ष रिकवरी नियमों को सख्ती से लागू करने, तेज शिकायत निवारण व्यवस्था बनाने और लेंडर्स व उनके एजेंटों की जवाबदेही तय करने की सख्त जरूरत है। जब तक ये सुरक्षा उपाय नहीं होंगे, उधारकर्ता आर्थिक और मानसिक तनाव में डूबे रहेंगे, अक्सर तब भी जब उनका लोन औपचारिक रूप से डिफॉल्ट घोषित नहीं हुआ होता।

रिकवरी एजेंटों की प्रताड़ना सिर्फ आंकड़ों की बात नहीं है। यह उन हजारों भारतीयों की रोजमर्रा की सच्चाई है, जिनकी गरिमा और मानसिक सेहत खतरे में है। इस संकट से निपटने के लिए सहानुभूति, सिस्टम में सुधार और तुरंत कार्रवाई बेहद जरूरी है।

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