लेकिन हाल के वर्षों, विशेषकर 2023 से 2026 के बीच, NCERT के पाठ्यक्रम में किए गए बदलावों ने शिक्षा सुधार से अधिक विवाद को जन्म दिया है। ऐसे में सवाल उठता है क्या ये बदलाव वास्तव में छात्रों के हित में हैं या फिर वैचारिक और राजनीतिक प्रभावों के कारण?
बदलते पाठ्यक्रम की पृष्ठभूमि
नई शिक्षा नीति (NEP) 2020 के लागू होने के बाद यह स्पष्ट किया गया कि शिक्षा को ज्ञान-केंद्रित से कौशल-केंद्रित, रटंत प्रणाली से समझ-आधारित शिक्षा की ओर ले जाना है। इसी उद्देश्य से NCERT ने पाठ्यक्रम को “कम बोझ, अधिक समझ” (Reduced Content, Deeper Learning) के सिद्धांत पर पुनर्गठित करना शुरू किया। वहीं कोरोना महामारी के बाद अस्थायी रूप से सिलेबस में कटौती की गई थी, लेकिन बाद में कई अध्यायों को स्थायी रूप से हटाने या संशोधित करने का निर्णय लिया गया, जिसने विवाद को जन्म दिया।
कौन-से विषय बने विवाद का केंद्र?
इतिहास और सामाजिक विज्ञान: इतिहास की किताबों से मुग़ल काल, औपनिवेशिक शासन के कुछ अध्याय, और सामाजिक आंदोलनों के विस्तृत विवरण को हटाने या संक्षिप्त करने पर शिक्षाविदों ने आपत्ति जताई। आलोचकों का कहना है कि इससे छात्रों को इतिहास की समग्र समझ नहीं मिल पाएगी और वे केवल चयनित तथ्यों तक सीमित रह जाएंगे।
न्यायपालिका और लोकतंत्र से जुड़े अध्याय: कक्षा 8 और 10 की सामाजिक विज्ञान की पुस्तकों में न्यायपालिका, लोकतांत्रिक संस्थाओं और संवैधानिक मूल्यों से जुड़े अध्यायों में संशोधन या रोक ने यह सवाल खड़ा किया कि क्या छात्रों को लोकतांत्रिक ढांचे की आलोचनात्मक समझ से दूर किया जा रहा है?
विज्ञान और पर्यावरण: विज्ञान में जलवायु परिवर्तन, पर्यावरणीय संकट और जैव विविधता जैसे विषयों को संक्षिप्त किया गया। जबकि आज के समय में ये विषय वैश्विक स्तर पर सबसे अधिक प्रासंगिक हैं, ऐसे में इनकी कटौती को लेकर चिंता जताई गई।
सरकार और NCERT का पक्ष
NCERT और शिक्षा मंत्रालय का कहना है कि पाठ्यक्रम को छात्रों के मानसिक बोझ को कम करने के लिए बदला गया है, दोहराव (Repetition) और अप्रासंगिक तथ्यों को हटाकर मूल अवधारणाओं पर फोकस किया गया है और किताबें किसी विचारधारा को बढ़ावा देने के लिए नहीं, बल्कि तथ्यपरक और संतुलित शिक्षा देने के लिए तैयार की जाती हैं। साथ ही सरकार यह भी तर्क देती है कि डिजिटल संसाधनों, प्रोजेक्ट वर्क और एक्सपीरियंस-बेस्ड लर्निंग के माध्यम से छात्र अतिरिक्त ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं।
शिक्षाविदों और विशेषज्ञों की चिंता
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि पाठ्यपुस्तकें केवल परीक्षा पास करने का साधन नहीं, बल्कि सोच विकसित करने का माध्यम होती हैं। वहीं अगर सामाजिक, राजनीतिक और ऐतिहासिक संदर्भ सीमित कर दिए गए, तो छात्रों में आलोचनात्मक सोच (Critical Thinking) विकसित नहीं हो पाएगी। इसके अतिरिक्त बार-बार बदलाव से शिक्षकों और छात्रों दोनों में अस्थिरता और भ्रम पैदा होता है।
कुछ शिक्षाविद यह भी कहते हैं कि पाठ्यक्रम में बदलाव एक स्वतंत्र अकादमिक प्रक्रिया होनी चाहिए, न कि किसी दबाव या तात्कालिक परिस्थिति का परिणाम।
छात्रों और शिक्षकों पर प्रभाव
छात्रों पर इन बदलावों का सीधा असर पड़ता है, जो छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे होते हैं, उनके लिए बार-बार सिलेबस बदलना एक बड़ी समस्या बन जाता है। साथ ही, इतिहास और सामाजिक विज्ञान जैसे विषयों की गहराई कम होने से छात्रों का व्यापक और संतुलित दृष्टिकोण पूरी तरह विकसित नहीं हो पाता।
शिक्षकों पर भी इन बदलावों का प्रभाव पड़ता है, उन्हें बार-बार नई गाइडलाइंस और नई किताबों के अनुसार पढ़ाना पड़ता है। कई बार उचित प्रशिक्षण और पर्याप्त संसाधनों की कमी के कारण इन बदलावों को सही और प्रभावी तरीके से लागू करना कठिन हो जाता है।
2026 में NCERT से जुड़ी नई दिशा
2026 तक NCERT ने संकेत दिए हैं कि डिजिटल टेक्स्टबुक और इंटरएक्टिव कंटेंट को बढ़ावा दिया जाएगा, AI और तकनीक आधारित लर्निंग मॉड्यूल जोड़े जाएंगे, स्थानीय संदर्भ और भारतीय ज्ञान परंपरा (Indian Knowledge Systems) को पाठ्यक्रम में स्थान दिया जाएगा और यह सकारात्मक संकेत हैं, लेकिन इनके साथ पारदर्शिता और संवाद भी उतना ही आवश्यक है।
शिक्षा या विवाद: निष्कर्ष
NCERT पाठ्यक्रम में बदलाव अपने आप में गलत नहीं हैं। शिक्षा को समय के साथ बदलना ही चाहिए, लेकिन जब ये बदलाव अस्पष्ट कारणों, अचानक निर्णयों और पर्याप्त संवाद के बिना किए जाते हैं, तो वे विवाद का कारण बनते हैं।
आज आवश्यकता है कि पाठ्यक्रम में बदलाव शिक्षाविदों, शिक्षकों और समाज के साथ चर्चा करके किए जाएं, छात्रों को केवल सूचना नहीं, बल्कि समझ, संवेदना और विवेक भी दिया जाए और शिक्षा को राजनीति से ऊपर रखकर राष्ट्रीय हित और भविष्य की पीढ़ी के दृष्टिकोण से देखा जाए।
अंततः सवाल यही है अगर पाठ्यक्रम छात्रों को सोचने, सवाल करने और समझने की क्षमता देता है, तो वह शिक्षा है और अगर वह इन क्षमताओं को सीमित करता है, तो वह केवल विवाद बनकर रह जाता है।