नेशनल एजुकेशन, एम्प्लॉयबिलिटी और एडटेक समिट 2026: उच्च शिक्षा में नौकरी के लिए तैयारी पर चर्चा

नेशनल एजुकेशन, एम्प्लॉयबिलिटी और एडटेक समिट 2026: उच्च शिक्षा में नौकरी के लिए तैयारी पर चर्चा

नेशनल एजुकेशन, एम्प्लॉयबिलिटी और एडटेक समिट 2026: उच्च शिक्षा में नौकरी के लिए तैयारी पर चर्चा
भारत में उच्च शिक्षा और रोजगार के बीच का अंतर चिंता का विषय बना हुआ है। नेशनल एजुकेशन, एम्प्लॉयबिलिटी और एडटेक समिट में विशेषज्ञों ने छात्रों को वास्तविक करियर के लिए तैयार करने के लिए पाठ्यक्रम को फिर से डिज़ाइन करने के तरीकों पर चर्चा की।


इस सत्र में विवेक अग्रवाल (Co-Founder और CEO, Liqvid e-Learning Services) और पायल जिंदल खन्ना (Associate Director & Head, Centre for Leadership Coaching, Shoolini University) मुख्य पैनलिस्ट के रूप में मौजूद थे। विवेक अग्रवाल ने उद्घाटन भाषण में कहा कि भारत में NEP 2020 और NCERT जैसी मजबूत नीतियां हैं, लेकिन असली चुनौती यह है कि इन नीतियों का प्रभाव छात्रों तक पहुंचे।

उन्होंने कहा आगे कहा “पिछले 25 वर्षों से यह स्पष्ट है कि योग्य उम्मीदवारों की संख्या सीमित है। नीतियां मौजूद हैं, लेकिन उन्हें व्यवहार में लागू करना ही असली चुनौती है। आज हम केवल समस्याओं पर चर्चा नहीं करेंगे, बल्कि समाधान और व्यावहारिक कदमों पर ध्यान देंगे।”

साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि उच्च शिक्षा संस्थानों में अभी भी नीति और अभ्यास के बीच बड़ा अंतर है। नीतियों का वास्तविक असर तभी दिखाई देगा जब कक्षा स्तर पर उनका सही क्रियान्वयन होगा और शिक्षकों तथा संस्थानों को इसके लिए सक्षम बनाया जाएगा।

नीति बनाम कार्यान्वयन: बदलाव की आवश्यकता

सत्र की चर्चा के दौरान पायल जिंदल खन्ना ने स्पष्ट किया कि नीति मजबूत है, लेकिन इसे कक्षा और छात्रों तक पहुंचाना मुश्किल है। उन्होंने आगे कहा “NEP 2020 में लचीलापन, अंतरविषयक शिक्षा और समग्र विकास पर जोर है। लेकिन इसे केवल कागज पर न छोड़कर वास्तविक शिक्षा प्रक्रिया में बदलना जरूरी है। नीतियां अनुभव और अभ्यास में तब तक नहीं बदलती जब तक नेतृत्व और संस्थागत संस्कृति इसे समर्थन न दें।”

साथ ही पायल ने यह भी रेखांकित किया कि बजट का अधिकतर हिस्सा हार्डवेयर और सॉफ़्टवेयर पर खर्च होता है, जबकि शिक्षण की गुणवत्ता और सीखने की प्रक्रिया के फॉलो-अप पर ध्यान कम मिलता है। इसलिए नीति को केवल दस्तावेजों में न रखें। इसे संस्थानों, कक्षाओं और छात्रों तक पहुंचाना आवश्यक है। वास्तविक बदलाव नेतृत्व और संस्थागत दृष्टिकोण से शुरू होता है।

इसके साथ ही सत्र में उपस्थित दर्शकों ने भी महत्वपूर्ण सुझाव दिए, जिनमें दिल्ली से सुधीप ने कहा “शिक्षक केवल यह न सोचें कि क्या पढ़ाया जाए, बल्कि कैसे पढ़ाया जाए इस पर भी ध्यान दें। छात्रों को केवल विषय सामग्री सीखने की बजाय समस्या सुलझाने और सीखने के तरीके सीखना चाहिए।”

मनोज पावेरिया, जो पहले 28 साल तक कॉर्पोरेट क्षेत्र में कार्यरत थे और अब शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय हैं, उन्होंने कहा कि “छात्रों में रुचि पैदा करना सबसे महत्वपूर्ण है। यदि हम 10-12 साल की उम्र में बच्चों को रोबोटिक्स, ऑटोमेशन और AI जैसी तकनीकों से परिचित कराएं, तो उनकी क्षमता और रुचि विकसित होगी। वर्तमान में इंजीनियरिंग छात्रों को व्यावहारिक अनुभव बहुत सीमित मिलता है। हमें शुरुआती शिक्षा में ही व्यावहारिक अनुभव और रुचि पैदा करने की आवश्यकता है।”

संस्थागत नवाचार: कोचिंग-आधारित पेडागॉजी

पायल ने शूलिनी यूनिवर्सिटी के Leadership Coaching Program का उदाहरण दिया, जिसे वह स्वयं संचालित करती हैं। यह कार्यक्रम छात्रों को ग्लोबली प्रमाणित कोचों के साथ व्यक्तिगत सत्र प्रदान करता है।

“छात्र केवल अकादमिक ज्ञान नहीं सीखते, बल्कि निर्णय क्षमता, सहानुभूति, आत्म-जागरूकता, संवाद कौशल और सहयोग जैसी सॉफ्ट स्किल्स विकसित करते हैं। अब तक 1,468 छात्र इस कार्यक्रम का हिस्सा बन चुके हैं और 363 अंतरराष्ट्रीय कोचों ने उनका मार्गदर्शन किया है।”

इस तरह का कोचिंग-आधारित पेडागॉजी छात्रों को आत्म-विश्लेषण करने, कठिन वार्तालाप संभालने और नेतृत्व कौशल विकसित करने में मदद करता है।

पाठ्यक्रम में समावेशन: तकनीकी और सॉफ्ट स्किल्स

पायल ने जोर देकर कहा कि केवल अधिक सामग्री जोड़ने के बजाय, पाठ्यक्रम में तकनीकी और सॉफ्ट स्किल्स का एकीकृत समावेशन जरूरी है। “छात्रों का मूल्यांकन केवल परीक्षाओं पर नहीं, बल्कि टीमवर्क, सहयोग, निर्णय क्षमता, नेतृत्व और सृजनात्मक सोच पर भी होना चाहिए। यही उन्हें भविष्य की नौकरी और वास्तविक दुनिया के लिए तैयार करता है।”

इंडस्ट्री एक्सपोज़र और वास्तविक दुनिया की तैयारी

विवेक अग्रवाल ने कहा कि तकनीकी ज्ञान पर्याप्त नहीं है। छात्रों को वास्तविक परियोजनाओं और इंटर्नशिप के माध्यम से व्यावहारिक अनुभव की आवश्यकता है। उन्होंने उदाहरण दिया कि छात्रों द्वारा बनाए गए प्रोजेक्ट DRDO जैसी संस्थाओं में लागू किए जा रहे हैं।

मुख्य रूप से छात्रों को यह समझना जरूरी है कि उनके ज्ञान का वास्तविक दुनिया में क्या उपयोग है। संदर्भ ज्ञान और सॉफ्ट स्किल्स इस दिशा में बेहद महत्वपूर्ण हैं।”

मानव कौशल ही मुख्य अंतर तय करेंगे

सत्र के समापन में पायल खन्ना ने कहा “भविष्य में मानव कौशल तकनीकी ज्ञान से अधिक महत्वपूर्ण होंगे। शिक्षा में बदलाव केवल सामग्री तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसे क्षमता निर्माण, सहयोग और निरंतर सीखने की संस्कृति पर केंद्रित होना चाहिए।”

यह सत्र स्पष्ट करता है कि भारत में नीति और दृष्टिकोण मजबूत हैं, लेकिन असली चुनौती इसे प्रभावी रूप से कक्षाओं और संस्थानों में लागू करना है। वास्तविक दुनिया के परिणामों के लिए पाठ्यक्रम का पुनः डिज़ाइन ही उच्च शिक्षा को रोजगार-केंद्रित और भविष्य के लिए तैयार बना सकता है।

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