स्टार्टअप बिल्डिंग की कला से क्यों दूर हैं पारंपरिक बिजनेस स्कूल?

स्टार्टअप बिल्डिंग की कला से क्यों दूर हैं पारंपरिक बिजनेस स्कूल?

स्टार्टअप बिल्डिंग की कला से क्यों दूर हैं पारंपरिक बिजनेस स्कूल?
पिछले एक दशक में भारत के बिजनेस स्कूलों ने इनोवेशन सेंटर, इन्क्यूबेटर और उद्यमिता कार्यक्रमों में भारी निवेश किया है। इसके बावजूद उद्यमिता को आज भी मुख्य रूप से एक विषय की तरह पढ़ाया जाता है, न कि व्यावहारिक और वास्तविक अनुभव के रूप में सिखाया जाता है।


यदि किसी सामान्य MBA कक्षा में छात्रों से पूछा जाए कि उद्यमिता का अर्थ क्या है, तो चर्चा अक्सर फंडिंग, वैल्यूएशन, वेंचर कैपिटल और यूनिकॉर्न स्टार्टअप्स के इर्द-गिर्द घूमती है। लेकिन शायद ही कभी इस वास्तविकता पर बात होती है कि अधिकांश संस्थापकों (Founders) को अपने शुरुआती वर्षों में आर्थिक अनिश्चितताओं, कठिन निर्णयों और कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। उद्यमिता का असली मूल्य केवल आर्थिक लाभ में नहीं, बल्कि तेजी से सीखने, निर्णय लेने की क्षमता विकसित करने और व्यक्तिगत विकास में छिपा होता है।

दुर्भाग्य से कई संस्थान उद्यमिता को सफलता की कहानियों के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं, जबकि व्यवसाय खड़ा करने की वास्तविक प्रक्रिया पर अपेक्षाकृत कम ध्यान देते हैं। परिणामस्वरूप छात्र उद्यमिता के परिणामों को देखते हैं, लेकिन उसे बनाने की प्रक्रिया को समझ नहीं पाते।

उद्यमिता बनाम प्लेसमेंट संस्कृति 

यह सोच उद्यमिता कार्यक्रमों की संरचना को भी प्रभावित करती है। कई इन्क्यूबेशन सेंटर अपनी सफलता को स्टार्टअप्स की संख्या, जुटाई गई फंडिंग या आयोजित कार्यक्रमों के आधार पर मापते हैं, जबकि वास्तव में किसी स्टार्टअप की सफलता का आकलन उसके राजस्व, ग्राहकों और दीर्घकालिक स्थिरता से होना चाहिए।

कई बार छात्रों को मार्गदर्शन देने वाले सलाहकारों के पास स्वयं व्यवसाय खड़ा करने और उसे बढ़ाने का व्यावहारिक अनुभव सीमित होता है। अकादमिक ज्ञान महत्वपूर्ण है, लेकिन उद्यमिता में वास्तविक चुनौतियों से सीखा गया अनुभव भी उतना ही जरूरी होता है। इसी तरह, कई स्टार्टअप इमर्शन कार्यक्रम छात्रों को उन कंपनियों से परिचित कराते हैं जो पहले से सफल हो चुकी होती हैं। ऐसी कंपनियों को देखना उपयोगी हो सकता है, लेकिन इससे यह नहीं सीखा जा सकता कि एक विचार को कैसे परखा जाए, शुरुआती ग्राहक कैसे हासिल किए जाएं या शुरुआती संघर्षों का सामना कैसे किया जाए।

हालांकि अधिकांश बिजनेस स्कूल नवाचार और उद्यमिता की बात करते हैं, लेकिन उनकी प्राथमिकता आज भी बेहतर प्लेसमेंट और नौकरी सुनिश्चित करना ही रहती है। संस्थानों की रैंकिंग प्लेसमेंट रिकॉर्ड पर आधारित होती है, परिवार सुरक्षित करियर को महत्व देते हैं और संस्थान भी रोजगार योग्य स्नातक तैयार करने के लिए प्रोत्साहित होते हैं।

इसका परिणाम यह होता है कि जो छात्र स्टार्टअप शुरू करने का जोखिम उठाते हैं और असफल हो जाते हैं, उन्हें संस्थागत स्तर पर बहुत कम मान्यता मिलती है। वहीं, उच्च वेतन वाली नौकरी पाने वाले छात्र संस्थान की सफलता के आंकड़ों का हिस्सा बन जाते हैं। ऐसे माहौल में प्रयोग, असफलता से सीखना और वास्तविक व्यवसाय निर्माण अक्सर पीछे छूट जाता है।

बाजार की जरूरत को समझने की कमी

उद्यमिता शिक्षा की सबसे बड़ी कमियों में से एक विचार से बाजार में स्वीकार्यता (Market Validation) तक की यात्रा में दिखाई देती है। वहीं कई छात्र उद्यमी अपने बिजनेस प्लान, प्रेजेंटेशन और पिच डेक तैयार करने में महीनों लगा देते हैं। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण सवाल अक्सर अनुत्तरित रह जाता है- क्या ग्राहक वास्तव में इस उत्पाद या सेवा के लिए भुगतान करेंगे?

प्रोडक्ट-मार्केट फिट किसी कक्षा में नहीं सीखा जा सकता। इसके लिए वास्तविक ग्राहकों के साथ बातचीत करनी पड़ती है, उनकी प्रतिक्रिया समझनी होती है और यह देखना होता है कि बाजार वास्तव में समाधान को स्वीकार करता है या नहीं। फिर भी कई संस्थानों में ग्राहक प्राप्त करना और बाजार की जरूरत को समझना बाद की प्रक्रिया माना जाता है।

वास्तव में किसी भी स्टार्टअप के लिए पहले दिन से ही बाजार की जरूरत को समझना सबसे महत्वपूर्ण कार्य होना चाहिए। इसके बिना कोई भी विचार केवल एक अकादमिक परियोजना बनकर रह सकता है।

B2B स्टार्टअप्स के लिए बड़ी चुनौती

यह समस्या विशेष रूप से उन छात्र स्टार्टअप्स के लिए अधिक स्पष्ट दिखाई देती है जो बिजनेस-टू-बिजनेस (B2B) क्षेत्र में काम कर रहे होते हैं। अधिकांश विश्वविद्यालयों के पास मजबूत एलुमनाई नेटवर्क, उद्योग जगत से साझेदारियां और कॉर्पोरेट संपर्क मौजूद होते हैं। सिद्धांत रूप से ये नेटवर्क छात्रों को शुरुआती ग्राहक, पायलट प्रोजेक्ट और प्रूफ-ऑफ-कॉन्सेप्ट हासिल करने में मदद कर सकते हैं।

लेकिन व्यवहारिक स्तर पर ऐसे अवसरों तक पहुंचने के लिए कोई सुव्यवस्थित व्यवस्था अक्सर मौजूद नहीं होती। परिणामस्वरूप कई संभावनाशील छात्र स्टार्टअप्स उन निर्णयकर्ताओं तक नहीं पहुंच पाते जो उनके विचारों को वास्तविक व्यवसाय में बदलने में मदद कर सकते हैं।

निवेशक कैंपस स्टार्टअप्स से दूरी क्यों रखते हैं

वेंचर कैपिटल निवेशक भी इस चुनौती को समझ चुके हैं। आज अधिकांश निवेशक बिजनेस स्कूलों को शुरुआती चरण के निवेश योग्य स्टार्टअप्स का प्रमुख स्रोत नहीं मानते। हालांकि विश्वविद्यालयों के इन्क्यूबेशन सेंटर बड़ी संख्या में स्टार्टअप गतिविधियों का प्रदर्शन करते हैं, लेकिन उनमें से कई परियोजनाएं वास्तविक व्यवसाय बनने की बजाय अकादमिक अभ्यास ही रह जाती हैं

कई सफल इन्क्यूबेटरों में भी सबसे मजबूत स्टार्टअप्स अक्सर बाहरी उद्यमियों द्वारा संचालित होते हैं, जो केवल विश्वविद्यालय के संसाधनों या इन्क्यूबेशन सुविधाओं का उपयोग करते हैं। इसके विपरीत, अमेरिका और चीन के कई प्रमुख विश्वविद्यालयों में निवेशक सीधे विश्वविद्यालय प्रयोगशालाओं और छात्र अनुसंधान से निकलने वाले विचारों में निवेश करते हैं। यह अंतर केवल इकोसिस्टम की परिपक्वता का नहीं, बल्कि संस्थागत प्राथमिकताओं और दीर्घकालिक दृष्टिकोण का भी है।

सफलता को मापने के सही मानक : उद्यमिता केंद्रों की सफलता को मापने के तरीके पर भी पुनर्विचार की आवश्यकता है।

अधिकांश इन्क्यूबेटर स्टार्टअप्स की संख्या, मेंटरशिप सत्रों या जुटाई गई फंडिंग को सफलता का पैमाना मानते हैं। जबकि अधिक महत्वपूर्ण संकेतक यह हो सकते हैं कि कितने स्टार्टअप्स ने प्रोडक्ट-मार्केट फिट हासिल किया, कितना राजस्व (रेवेन्यू) उत्पन्न किया, कितने ग्राहक बनाए रखे और कितने व्यवसाय तीन से पांच वर्षों तक सफलतापूर्वक संचालित रहे। हालांकि इन संकेतकों को मापना अधिक कठिन है, लेकिन वास्तविक उद्यमिता की सफलता इन्हीं से निर्धारित होती है।

संस्थापकों को वास्तव में क्या चाहिए : स्टार्टअप निर्माण की प्रक्रिया में अलग-अलग चरणों पर अलग-अलग प्रकार के सहयोग की आवश्यकता होती है।

किसी नए विचार पर काम कर रहे संस्थापक को समस्या की पहचान और समाधान की पुष्टि में मदद चाहिए। न्यूनतम व्यवहार्य उत्पाद (MVP) तैयार करने वाले उद्यमी को ग्राहकों तक पहुंच और प्रतिक्रिया की आवश्यकता होती है। वहीं विकास के चरण में पहुंची कंपनी को भर्ती, संचालन और विस्तार से जुड़े मार्गदर्शन की जरूरत होती है।

कोई एक पाठ्यक्रम, एक मेंटर या एक इन्क्यूबेशन कार्यक्रम इन सभी चरणों में समान रूप से प्रभावी सहायता नहीं दे सकता। इसके बावजूद कई संस्थान एक ही ढांचे के माध्यम से सभी उद्यमियों की जरूरतों को पूरा करने की कोशिश करते हैं।

उद्यमिता शिक्षा पर नए सिरे से सोचने की जरूरत : समाधान केवल नए वैकल्पिक पाठ्यक्रम, हैकाथॉन या कॉर्पोरेट साझेदारियों में नहीं है।

वास्तव में सबसे अधिक जोखिम उठाने की क्षमता उन छात्रों में होती है जो अभी कॉलेज में हैं या अपने करियर की शुरुआत कर रहे हैं। उनके पास अपेक्षाकृत कम वित्तीय जिम्मेदारियां होती हैं और वे नए प्रयोग करने के लिए अधिक स्वतंत्र होते हैं।

दुनिया के सफल स्टार्टअप इकोसिस्टम यह स्वीकार करते हैं कि असफलता सीखने की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है। जो लोग व्यवसाय बनाने का प्रयास करते हैं, वे भले ही सफल न हों, लेकिन उनके द्वारा विकसित कौशल उन्हें भविष्य में बेहतर पेशेवर, प्रबंधक और उद्यमी बनाते हैं। भारत का स्टार्टअप इकोसिस्टम तेजी से विकसित हो रहा है, लेकिन कई शैक्षणिक संस्थान अभी भी उद्यमिता में असफलता को सीखने का अवसर मानने के बजाय नकारात्मक परिणाम के रूप में देखते हैं।

जब तक यह सोच नहीं बदलती, तब तक बिजनेस स्कूल उद्यमिता को एक अवधारणा के रूप में पढ़ाते रहेंगे, न कि एक वास्तविक कौशल के रूप में। वे छात्रों को उद्यमियों का अध्ययन करना और उनकी सफलता की कहानियां समझना तो सिखाएंगे, लेकिन जरूरी नहीं कि उन्हें स्वयं उद्यमी बनना भी सिखा सकें।

(लेखक: कुलमणि राणा, फाउंडर, VenturEdu- भारत का पहला वेंचर स्कूल जो उभरते उद्यमियों के लिए समर्पित है, व्यक्त किए गए विचार निजी हैं।)


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