दुनिया के लिए EV बनाएगा भारत, क्या है पूरी रणनीति?

दुनिया के लिए EV बनाएगा भारत, क्या है पूरी रणनीति?

दुनिया के लिए EV बनाएगा भारत, क्या है पूरी रणनीति?
भारत को वैश्विक ईवी  मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने के लिए स्थानीयकरण, उन्नत तकनीक, मजबूत सप्लाई चेन और स्थिर नीतियों पर जोर देना होगा।

इलेक्ट्रिक वाहन (EV) मैन्युफैक्चरिंग वैश्विक ऑटोमोबाइल उद्योग में तेजी से उभरता हुआ क्षेत्र है, जो स्वच्छ ऊर्जा, टिकाऊ परिवहन और आत्मनिर्भर सप्लाई चेन की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। भारत भी स्थानीय उत्पादन, तकनीकी इनोवेशन और सरकारी नीतियों के बल पर खुद को वैश्विक EV मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में स्थापित करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।  "EV Manufacturing for the World: Scale, Challenges and India's Edge" विषय पर आयोजित इस पैनल चर्चा का संचालन आई.वी. राव, Distinguished Fellow, TERI ने किया। इस सत्र में सिवरामाकिरुष्णन जे, Director – Manufacturing Process Engineering, Stellantis India और जितेंद्र पाटिल, Head – EV Cell, Government of Maharashtra ने अपने विचार साझा किए।

चर्चा की शुरुआत करते हुए आई.वी. राव ने कहा कि भारत ने वर्ष 2013 से इलेक्ट्रिक मोबिलिटी की दिशा में एक दूरदर्शी पहल की, जिसका उद्देश्य केवल इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देना नहीं था, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना, कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करना और प्रदूषण नियंत्रण जैसे महत्वपूर्ण लक्ष्यों को हासिल करना भी था। उन्होंने बताया कि आज भारत में दोपहिया वाहनों से लेकर बसों तक सभी श्रेणियों में EV का निर्माण हो रहा है, लेकिन बैटरी और अन्य महत्वपूर्ण कंपोनेंट्स के आयात पर निर्भरता के कारण लागत अभी भी अधिक है। ऐसे में यदि भारत को बड़े पैमाने पर EV अपनाने और वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब बनने का लक्ष्य हासिल करना है, तो स्थानीय विनिर्माण (Localization), लागत में कमी और मजबूत सप्लाई चेन के विकास पर विशेष ध्यान देना होगा। इसी विषय पर पैनल ने ईवी निर्माण, बैटरी तकनीक, सरकारी नीतियों, चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, सर्कुलर इकोनॉमी और भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्धा को मजबूत करने की रणनीतियों पर विस्तार से चर्चा की।

ICE वाहनों की तुलना में EV मैन्युफैक्चरिंग कितनी अलग और जटिल है?

सिवरामाकिरुष्णन जे: ICE वाहन निर्माण वर्षों से परिपक्व तकनीक बन चुका है, जबकि ईवी निर्माण में अत्यधिक सटीकता की आवश्यकता होती है।

उन्होंने बताया कि बैटरी पैक बनाने के दौरान फैक्ट्री में 10% से कम ह्यूमिडिटी जरूरी होती है। बैटरी सेल्स की क्षमता और Internal Resistance में 2% से अधिक अंतर नहीं होना चाहिए। बसबार की पोजिशनिंग 200 माइक्रॉन के भीतर होनी चाहिए। टॉर्क की सटीकता भी बेहद महत्वपूर्ण होती है। ईवी  मोटर 15,000–20,000 RPM तक घूमती है, इसलिए उसके निर्माण में बहुत अधिक प्रिसिजन चाहिए।

उन्होंने कहा कि ईवी निर्माण में रोबोटिक्स, ऑटोमेशन, IoT आधारित मॉनिटरिंग और ट्रेसबिलिटी सिस्टम अनिवार्य हैं। छोटी सी गलती भी शॉर्ट सर्किट या थर्मल रनअवे जैसी गंभीर समस्या पैदा कर सकती है।

भारत में ईवी मैन्युफैक्चरिंग को बड़े स्तर पर कैसे बढ़ाया जा सकता है?

सिवरामाकिरुष्णन जे: उन्होंने कहा कि स्केल बढ़ाने का मतलब केवल बड़ी फैक्ट्री बनाना नहीं है, बल्कि हर वाहन की गुणवत्ता में निरंतरता नाए रखना है। इसके लिए जरूरी है-

  • मजबूत असेंबली प्रक्रिया
  • डिजिटल ट्रेसबिलिटी
  • उचित ऑटोमेशन
  • गुणवत्ता नियंत्रण
  • सप्लायर नेटवर्क का विकास

उन्होंने विशेष रूप से कहा कि केवल OEM मजबूत होने से काम नहीं चलेगा, बल्कि Tier-2 और Tier-3 सप्लायर्स को भी समान क्वालिटी स्टैंडर्ड पर काम करना होगा।

ICE वाहनों को EV में बदलना बेहतर है या नए EV प्लेटफॉर्म विकसित करना?

सिवरामाकिरुष्णन जे: दोनों मॉडल साथ-साथ चल सकते हैं। उन्होंने सर्कुलर इकोनॉमी पर जोर देते हुए कहा कि केवल बैटरियों का ही नहीं, बल्कि ICE वाहनों का EV में रूपांतरण भी संसाधनों के बेहतर उपयोग का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि कई स्टार्टअप दोपहिया, तिपहिया और चारपहिया वाहनों को EV में बदल रहे हैं। हालांकि, यह तभी सफल होगा जब वे OEM जैसी गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों का पालन करेंगे। बढ़ती ईंधन कीमतों के बीच ICE से EV में कन्वर्जन आम लोगों के लिए किफायती विकल्प बन सकता है।

क्या EV स्टार्टअप्स बड़े ऑटोमोबाइल निर्माताओं से प्रतिस्पर्धा कर पाएंगे?

सिवरामाकिरुष्णन जे: यदि कोई स्टार्टअप लगातार हाई क्वालीटी वाला उत्पाद बना सकता है, तो उसके सफल होने की पूरी संभावना है। उन्होंने कहा कि सफलता के लिए जरूरी है:-

  • मजबूत इंजीनियरिंग
  • क्वालिटी कंट्रोल
  • PFMEA और DFMEA जैसी प्रक्रियाओं का पालन
  • ग्राहक-केंद्रित उत्पाद

उनके अनुसार, जिन स्टार्टअप्स का ध्यान क्वालिटी और विश्वसनीयता पर होगा, वे भविष्य में तेजी से आगे बढ़ेंगे।

महाराष्ट्र सरकार EV निर्माण और अपनाने को कैसे बढ़ावा दे रही है?

जितेंद्र पाटिल: महाराष्ट्र EV ट्रांजिशन में अग्रणी राज्यों में शामिल है। सरकार द्वारा उठाए गए प्रमुख कदम :-

  • EV Policy 2025
  • EV पर 100% रोड टैक्स छूट
  • केंद्र सरकार की सब्सिडी के अलावा अतिरिक्त प्रोत्साहन
  • पुणे और छत्रपति संभाजीनगर को EV मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में विकसित करना
  • बैटरी और कंपोनेंट निर्माण को बढ़ावा
  • चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार
  • मुंबई–पुणे और मुंबई–नागपुर को EV कॉरिडोर घोषित करना
  • EV वाहनों के लिए 100% टोल माफी

उन्होंने कहा कि परिवहन, उद्योग, ऊर्जा, पर्यावरण और शहरी विकास विभाग मिलकर EV इकोसिस्टम को मजबूत बना रहे हैं।

चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर EV अपनाने में कितना महत्वपूर्ण है?

जितेंद्र पाटिल: ग्राहकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज सुविधा है। सरकार ने ईवी कॉरिडोर, टोल छूट और चार्जिंग स्टेशनों को बढ़ावा देकर उपयोग बढ़ाया। परिणामस्वरूप, निजी चार्ज पॉइंट ऑपरेटरों ने भी निवेश शुरू किया और आज मुंबई–पुणे एक्सप्रेसवे देश के सबसे सफल चार्जिंग कॉरिडोर में से एक बन चुका है।

भारत में बैटरी मैन्युफैक्चरिंग की सबसे बड़ी चुनौतियां क्या हैं?

विजयानंद (पूर्व CEO, Amara Raja) – दर्शक : बैटरी किसी भी EV की कुल लागत का 40–45% हिस्सा होती है, इसलिए इसकी स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने छह प्रमुख चुनौतियां बताईं—

  • EV की मांग को लेकर अनिश्चितता
  • नीति में स्थिरता
  • सही बैटरी तकनीक का चयन
  • भारी पूंजी निवेश और लंबा रिटर्न
  • कच्चे माल और सप्लाई चेन
  • कुशल मानव संसाधन की उपलब्धता

भारत ने ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरिंग में मजबूत आधार तैयार किया है, लेकिन बैटरी निर्माण के लिए लंबी अवधि की निवेश रणनीति और स्पष्ट नीतियां आवश्यक होंगी।

भारत को वैश्विक EV मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने के लिए किन क्षेत्रों पर सबसे अधिक ध्यान देना होगा?

पैनल के अनुसार, भारत को वैश्विक ईवी मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने के लिए पूरे वैल्यू चेन को मजबूत करना होगा। इसके लिए स्थानीय बैटरी निर्माण को बढ़ावा देना, उच्च गुणवत्ता और प्रिसिजन मैन्युफैक्चरिंग अपनाना, ऑटोमेशन और डिजिटल ट्रेसबिलिटी को बढ़ाना तथा मजबूत Tier-2 और Tier-3 सप्लाई चेन विकसित करना बेहद आवश्यक है। इसके साथ ही बैटरी रीसाइक्लिंग और सर्कुलर इकोनॉमी को बढ़ावा देने, विश्वसनीय चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने, स्थिर एवं दीर्घकालिक सरकारी नीतियां लागू करने और कुशल मानव संसाधन विकसित करने पर भी समान रूप से ध्यान देना होगा। पैनल ने यह भी कहा कि सरकार, OEMs, स्टार्टअप्स और MSMEs के बीच मजबूत सहयोग भारत के ईवी  इकोसिस्टम को गति देगा। इन सभी क्षेत्रों में निरंतर निवेश और सुधार के जरिए भारत आने वाले वर्षों में दुनिया के प्रमुख ईवी  मैन्युफैक्चरिंग और निर्यात केंद्रों में अपनी मजबूत पहचान बना सकता है।

निष्कर्ष

पैनल चर्चा में यह स्पष्ट हुआ कि भारत वैश्विक ईवी  मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। हालांकि, बैटरी निर्माण, सप्लाई चेन का स्थानीयकरण, चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, कुशल मानव संसाधन और लागत प्रतिस्पर्धा जैसी चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं। विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि क्वालिटी इनोवेशन एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग तकनीकों, सर्कुलर इकोनॉमी और सरकार-उद्योग के बीच मजबूत सहयोग के माध्यम से इन चुनौतियों का समाधान किया जा सकता है। यदि भारत स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने, नीति स्थिरता बनाए रखने और पूरे ईवी इकोसिस्टम को मजबूत करने पर लगातार काम करता है, तो वह न केवल घरेलू मांग को पूरा करेगा, बल्कि वैश्विक ईवी निर्माण और निर्यात का एक प्रमुख केंद्र भी बन सकता है।

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