2030 तक AI से बदलेंगे भारत के GCCs

2030 तक AI से बदलेंगे भारत के GCCs

2030 तक AI से बदलेंगे भारत के GCCs
भारत में 2,100 से ज्यादा GCCs में AI का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन करीब 70% GCCs अभी भी पायलट स्टेज पर हैं।

डेल टेक्नोलॉजीज ने Zinnov के साथ मिलकर Dell Technologies Forum 2026 में “India GCCs 2030: From Capability Centers to Agentic Transformation Engines” नाम से एक रिपोर्ट जारी की है। यह रिपोर्ट BFSI, रिटेल, मैन्युफैक्चरिंग और सॉफ्टवेयर सेक्टर के 50 से ज्यादा वरिष्ठ GCC लीडर्स के सर्वे और इंटरव्यू पर आधारित है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2030 तक वे GCCs आगे रहेंगे जो सबसे ज्यादा AI पायलट चलाने के बजाय AI को बड़े पैमाने पर लागू करके मापने योग्य बिजनेस नतीजे हासिल करने की क्षमता विकसित करेंगे।

भारत में वर्तमान में 2,100 से ज्यादा ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) हैं, जिनमें करीब 23.6 लाख लोग काम करते हैं। वित्त वर्ष 2025-26 में इन GCCs ने लगभग 98.4 अरब डॉलर का रेवेन्यू जनरेट किया। रिपोर्ट के अनुसार, करीब 64% GCC लीडर्स भारत के सेंटर के साथ-साथ किसी ग्लोबल फंक्शन की जिम्मेदारी भी संभाल रहे हैं, जबकि 70% GCCs के पास AI का स्पष्ट रोडमैप मौजूद है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय GCCs के पास दुनिया के कुल GCC AI टैलेंट का लगभग 28% हिस्सा है। वहीं, 1,200 से ज्यादा GCCs AI और मशीन लर्निंग क्षमताएं विकसित कर चुके हैं। करीब 66% GCC लीडर्स अपनी एंटरप्राइज AI रणनीति में टॉप-लाइन बिजनेस इंपैक्ट को उच्च प्राथमिकता दे रहे हैं। इससे संकेत मिलता है कि GCCs में AI का फोकस प्रयोग से आगे बढ़कर बिजनेस वैल्यू पर केंद्रित हो रहा है।

हालांकि, AI को बड़े स्तर पर लागू करने में अभी भी कई चुनौतियां हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 70% GCCs अभी भी पायलट स्टेज पर अटके हुए हैं और प्रूफ ऑफ कॉन्सेप्ट को लगातार एंटरप्राइज-लेवल उपयोग में बदलने में कठिनाई का सामना कर रहे हैं। इसके प्रमुख कारणों में बिखरा हुआ डेटा, पुराने सिस्टम, स्पष्ट गवर्नेंस की कमी और AI से पहले की जरूरतों के हिसाब से बने टैलेंट मॉडल शामिल हैं। वहीं, नए GCCs के लिए परिपक्वता का सफर भी तेज हो रहा है। करीब 27% नए GCCs पांच साल के भीतर ‘Portfolio Hub’ स्तर तक पहुंच रहे हैं, जबकि पहले इसमें करीब एक दशक लगता था।

रिपोर्ट के अनुसार, Agentic AI workflows में सामान्य चैट इंटरैक्शन की तुलना में काफी अधिक टोकन की जरूरत पड़ सकती है। जहां सामान्य चैट में करीब 1,000-2,000 टोकन खर्च होते हैं, वहीं एक agentic workflow में 10,000 से 5 लाख टोकन तक की खपत हो सकती है। ऐसे में AI को बड़े पैमाने पर लागू करने के लिए शुरुआत से ही इंफ्रास्ट्रक्चर, लागत, डेटा और नियंत्रण से जुड़े फैसले महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि GCCs के करीब 55% रूटीन काम पहले से AI आधारित ऑटोमेशन के दायरे में हैं, जबकि 2030 तक लगभग 60% वर्कफोर्स को री-स्किलिंग की जरूरत पड़ सकती है। इसके लिए कंपनियों को कर्मचारियों की भूमिकाओं को दोबारा डिजाइन करना होगा, ताकि वे दोहराए जाने वाले कामों से आगे बढ़कर इंजीनियरिंग, प्रोडक्ट डेवलपमेंट और बिजनेस प्रॉब्लम-सॉल्विंग जैसे कार्यों पर ध्यान दे सकें।

Dell और Zinnov की रिपोर्ट ने GCCs के अगले चरण के विकास के लिए चार प्रमुख लीवर बताए हैं। इनमें दोहराए जा सकने वाले AI-सक्षम वर्कफ्लो तैयार करना, डेटा-कंप्यूट-सिक्योरिटी और गवर्नेंस को एकीकृत AI आर्किटेक्चर के रूप में प्लान करना, प्रोडक्ट और बिजनेस आउटकम्स की वास्तविक जिम्मेदारी लेना तथा वर्कफोर्स की भूमिकाओं को नए सिरे से डिजाइन करना शामिल है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि GCCs को यह तय करना होगा कि किन AI workloads को खुद मैनेज करना है और किन्हें leased environments के जरिए इस्तेमाल करना है। इसके लिए ‘Sovereign Sandbox’ मॉडल का सुझाव दिया गया है, जिससे GCCs रेगुलेटेड या proprietary data पर प्रयोग कर सकें और बाद में workloads को production में ले जा सकें।

डेल टेक्नोलॉजीज़ इंडिया के प्रेजिडेंट और मैनेजिंग डायरेक्टर मनीष गुप्ता ने कहा कि 2030 के सबसे प्रभावशाली GCCs की पहचान उनके द्वारा शुरू की गई AI पहलों की संख्या से नहीं, बल्कि AI को जिम्मेदारी के साथ बड़े पैमाने पर लागू करने और उसे वास्तविक बिजनेस परिणामों में बदलने की क्षमता से होगी। उन्होंने कहा कि GCCs की रणनीतिक जिम्मेदारियां बढ़ने के साथ डेटा, इंफ्रास्ट्रक्चर और गवर्नेंस की मजबूत नींव एंटरप्राइज इनोवेशन का आधार बनेगी।

 

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