भारत में अंतरिक्ष क्षेत्र में छात्रों की भागीदारी तेजी से बढ़ रही है और यह देश के लिए एक सकारात्मक संकेत है। हाल ही में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी और पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने राज्यसभा में जानकारी देते हुए बताया कि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) लगातार ऐसे प्रयास कर रहा है, जिनसे छात्र और युवा शोधकर्ता सीधे अंतरिक्ष मिशनों से जुड़ सकें। उनका कहना था कि आज का समय केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं है, बल्कि छात्रों को प्रैक्टिकल अनुभव देना बेहद जरूरी हो गया है और इसी दिशा में कई योजनाएं शुरू की गई हैं।
मंत्री ने बताया कि इसरो ने विशेष कार्यक्रम शुरू किए हैं, जिनके तहत छात्रों को उपग्रह डिजाइन करने, पेलोड विकसित करने और वास्तविक अंतरिक्ष परियोजनाओं पर काम करने का मौका दिया जाता है। यू आर राव उपग्रह केंद्र के नेतृत्व में चल रहे छात्र उपग्रह कार्यक्रम के जरिए कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के छात्र वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन में अपने सैटेलाइट तैयार कर रहे हैं। इतना ही नहीं, इन छात्र-निर्मित सैटेलाइट्स को इसरो मिशनों के माध्यम से लॉन्च करने का अवसर भी दिया जाता है, जिससे छात्रों का आत्मविश्वास और अनुभव दोनों बढ़ते हैं।
इसके साथ ही, छात्रों के लिए इंटर्नशिप और प्रोजेक्ट ट्रेनिंग जैसी योजनाएं भी चलाई जा रही हैं। देश के विभिन्न मान्यता प्राप्त संस्थानों के स्नातक, स्नातकोत्तर और पीएचडी छात्र इसरो के अलग-अलग केंद्रों में जाकर रिसर्च का अनुभव प्राप्त कर सकते हैं। इन कार्यक्रमों के माध्यम से छात्रों को आधुनिक अंतरिक्ष तकनीकों के साथ काम करने का अवसर मिलता है, जिससे वे भविष्य में इस क्षेत्र में बेहतर योगदान दे सकें।
शिक्षा और अनुसंधान को और मजबूत बनाने के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों में स्पेस टेक्नोलॉजी इनक्यूबेशन सेंटर (STIC) भी स्थापित किए गए हैं। ये केंद्र विश्वविद्यालयों और इसरो के वैज्ञानिकों के बीच सहयोग को बढ़ावा देते हैं और छात्रों को नई तकनीक विकसित करने में मदद करते हैं। इससे छात्रों को न केवल ज्ञान मिलता है, बल्कि वे इनोवेशन की दिशा में भी आगे बढ़ते हैं।
मंत्री ने IN-SPACe (Indian National Space Promotion and Authorization Center) की भूमिका पर भी जोर दिया। उन्होंने बताया कि IN-SPACe छात्रों के लिए विभिन्न प्रतियोगिताएं आयोजित करता है, जैसे कि कैनसैट और मॉडल रॉकेट डिजाइन करना। इन प्रतियोगिताओं में देशभर से सैकड़ों छात्र भाग लेते हैं, जिससे उनमें अंतरिक्ष विज्ञान के प्रति रुचि और बढ़ती है। हाल ही में आयोजित एक प्रतियोगिता में लगभग 850 छात्रों की 97 टीमों ने हिस्सा लिया, जो इस क्षेत्र में बढ़ते उत्साह को दर्शाता है।
उन्होंने यह भी जानकारी दी कि अब तक IN-SPACe ने 17 छात्र उपग्रहों और पेलोड को मंजूरी दी है, जिनमें से 11 को सफलतापूर्वक लॉन्च किया जा चुका है। इन मिशनों में देश के कई प्रमुख संस्थान शामिल रहे हैं, जैसे भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान, भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान और प्रौद्योगिकी संस्थान, आरवी कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग, एमिटी यूनिवर्सिटी महाराष्ट्र, एमआईटी वर्ल्ड पीस यूनिवर्सिटी, असम डॉन बोस्को यूनिवर्सिटी और सीवी रमन ग्लोबल यूनिवर्सिटी। यह दिखाता है कि अब केवल बड़े शहर ही नहीं, बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों के छात्र भी अंतरिक्ष मिशनों में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
अंतरिक्ष शिक्षा को और अधिक समावेशी बनाने के लिए सरकार ने क्षेत्रीय अंतरिक्ष शैक्षणिक केंद्र (RAC-S) भी स्थापित किए हैं। इन केंद्रों का उद्देश्य छोटे शहरों और कॉलेजों के छात्रों को अंतरिक्ष विज्ञान और तकनीक से जोड़ना है, ताकि उन्हें भी बड़े अवसर मिल सकें। इसके अलावा, इसरो का RESPOND कार्यक्रम विश्वविद्यालयों और संस्थानों को रिसर्च के लिए आर्थिक और तकनीकी सहायता प्रदान करता है, जिससे देश में शोध संस्कृति को बढ़ावा मिलता है।
शिक्षा के क्षेत्र में एक और महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए AICTE ने स्पेस टेक्नोलॉजी में लघु पाठ्यक्रम को मंजूरी दी है। साथ ही, भारतीय अंतरिक्ष नीति-2023 के तहत एक राष्ट्रीय समिति का गठन किया गया है, जो देश में अंतरिक्ष शिक्षा को और मजबूत बनाने पर काम कर रही है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आने वाले समय में भारत के पास कुशल और प्रशिक्षित युवाओं की एक मजबूत टीम हो, जो अंतरिक्ष क्षेत्र में देश को नई ऊंचाइयों तक ले जा सके।
छात्रों के बीच बढ़ते उत्साह का उदाहरण अक्टूबर 2025 में उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में आयोजित मॉडल रॉकेट्री और कैनसैट प्रतियोगिता में देखने को मिला। इस प्रतियोगिता में लगभग 500 छात्रों की 67 टीमों ने हिस्सा लिया और अपने बनाए रॉकेट को लगभग 1 किलोमीटर की ऊंचाई तक सफलतापूर्वक लॉन्च किया। यह न केवल छात्रों की प्रतिभा को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि भारत में अंतरिक्ष विज्ञान के प्रति युवाओं का रुझान तेजी से बढ़ रहा है।
सरकार भी इस दिशा में लगातार निवेश कर रही है। मंत्री के अनुसार, छात्र-केंद्रित अंतरिक्ष शिक्षा गतिविधियों के लिए हर साल लगभग 10 करोड़ रुपये का बजट निर्धारित किया गया है। इसके अलावा, IN-SPACe के माध्यम से छात्रों और स्टार्टअप्स को मार्गदर्शन, प्री-इनक्यूबेशन सपोर्ट और तकनीकी सुविधाएं भी प्रदान की जा रही हैं, जिससे वे अपने आइडियाज को वास्तविक प्रोजेक्ट में बदल सकें।
कुल मिलाकर, ये सभी पहल भारत में एक मजबूत और समावेशी अंतरिक्ष इकोसिस्टम बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। आज छात्र केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे वास्तविक अंतरिक्ष मिशनों का हिस्सा बन रहे हैं। यह न केवल उनके करियर के लिए फायदेमंद है, बल्कि देश को वैश्विक अंतरिक्ष क्षेत्र में मजबूत बनाने में भी मदद कर रहा है।
आने वाले समय में यह उम्मीद की जा रही है कि और अधिक छात्र इस क्षेत्र में जुड़ेंगे और भारत अंतरिक्ष विज्ञान और तकनीक में एक नई पहचान बनाएगा। यह बदलाव इस बात का संकेत है कि देश का भविष्य सुरक्षित हाथों में है, जहां युवा पीढ़ी नई सोच, नई तकनीक और नए उत्साह के साथ आगे बढ़ रही है।