भारत और कनाडा ने मंत्रीस्तरीय ऊर्जा संवाद (Ministerial Energy Dialogue) को औपचारिक रूप से पुनर्जीवित कर दिया है, जिससे लिथियम, कोबाल्ट और निकल जैसे क्रिटिकल मिनरल्स पर सहयोग को नई गति मिलने के संकेत हैं। ये खनिज इलेक्ट्रिक वाहन बैटरियों और ऊर्जा बदलाव के लिए बेहद अहम हैं। इस संवाद को भारत के पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी और कनाडा के ऊर्जा एवं प्राकृतिक संसाधन मंत्री टिमोथी हॉजसन ने गोवा में आयोजित इंडिया एनर्जी वीक के चौथे संस्करण के दौरान औपचारिक रूप दिया।
यह कदम 2025 के G7 शिखर सम्मेलन में दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों के बीच हुई चर्चा के बाद उठाया गया है और वैश्विक एनर्जी सप्लाई शृंखलाओं को मजबूत व स्थिर करने की साझा रणनीति को दर्शाता है। सफल होने की स्थिति में यह सहयोग ऑटोमोटिव सेक्टर, विशेषकर इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए क्रिटिकल मिनरल्स की आपूर्ति से जुड़ी चुनौतियों को कम करने में मदद कर सकता है।
अब तक कन्वेंशनल फ्यूल सप्लायर रहा कनाडा, इस द्विपक्षीय सहयोग के तहत भविष्य-केंद्रित संसाधनों पर ध्यान दे रहा है। लिथियम, कोबाल्ट और निकल जैसे खनिज, जो ईवी बैटरियों और रिन्यूएबल एनर्जी स्टोरेज में उपयोग होते हैं, इस साझेदारी के केंद्र में हैं। यह कूटनीतिक पहल ऐसे समय में आई है जब भारत, दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता, हर साल करीब 150 अरब डॉलर का ऊर्जा आयात करता है।
हरदीप सिंह पुरी ने कहा कि “सहयोग की संभावनाएं बेहद व्यापक हैं,” और बताया कि भारतीय सरकारी ऊर्जा कंपनियां अब तेल और गैस से आगे बढ़कर विविधीकरण की दिशा में देख रही हैं। ऑयल इंडिया, देश की दूसरी सबसे बड़ी सरकारी अन्वेषण कंपनी, को कनाडा में क्रिटिकल मिनरल अवसरों के मूल्यांकन के लिए लीड एंटिटी बनाया गया है।
ऑयल इंडिया के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर रंजीत राठ ने बताया कि शुरुआती योजना के तहत एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल को कनाडा भेजा जाएगा, जो वहां की लाइसेंसिंग व्यवस्था, कानूनी खनन ढांचे और संभावित निवेश परिसंपत्तियों का अध्ययन करेगा। उन्होंने कहा कि दोनों पक्ष ऐसे मॉडल पर काम कर रहे हैं, जिसमें भारतीय कंपनियां कनाडा की माइनिंग परियोजनाओं में सीधे निवेश कर भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए दीर्घकालिक कच्चे माल की सप्लाई सुनिश्चित कर सकें।