भारत में ई-बसों की पैठ तेजी से बढ़ेगी:ICRA

भारत में ई-बसों की पैठ तेजी से बढ़ेगी:ICRA

भारत में ई-बसों की पैठ तेजी से बढ़ेगी:ICRA
आईसीआरए के अनुसार, नीतिगत सपोर्ट और बेहतर लागत अर्थशास्त्र से मध्यम व भारी वाहन सेगमेंट में ई-बसों की पैठ मौजूदा 7% से बढ़कर 2029-30 तक करीब 30% हो सकती है।

भारत के मध्यम और भारी वाहन सेगमेंट में इलेक्ट्रिक बसों की हिस्सेदारी 2029-30 तक बढ़कर करीब 30% पहुंच सकती है, जो वर्तमान में लगभग 7% है। रेटिंग एजेंसी आईसीआरए (ICRA) के अनुसार, लगातार सरकारी नीतिगत सपोर्ट और इलेक्ट्रिक बसों की बेहतर लागत अर्थव्यवस्था इस वृद्धि के प्रमुख कारण होंगे। मध्यम और भारी सेगमेंट में ई-बसों की बिक्री 2017-18 में 37 यूनिट से बढ़कर 2025-26 में 5,412 यूनिट हो गई। वहीं, 2026-27 के पहले चार महीनों में 2,000 से ज्यादा ई-बसें बिक चुकी हैं। अब तक तैनात ई-बसों में दिल्ली, महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात और तेलंगाना की संयुक्त हिस्सेदारी करीब 75% है।

ई-बस सेगमेंट को FAME-I, FAME-II, National Electric Bus Programme, PM-eBus Sewa और PM E-Drive जैसी सरकारी योजनाओं से समर्थन मिल रहा है। इन योजनाओं के तहत 2027-28 तक 80,000 से अधिक ई-बसों की तैनाती का लक्ष्य है, जिसके लिए करीब 1 लाख करोड़ रुपये का संचयी बजटीय आवंटन किया गया है। ICRA के अनुसार, 12 मीटर की एयर-कंडीशंड ई-बस की कुल लागत-स्वामित्व (TCO) करीब 39 रुपये प्रति किलोमीटर है, जबकि डीजल बस के लिए यह लगभग 51 रुपये और CNG बस के लिए 48 रुपये प्रति किलोमीटर है। सब्सिडी को शामिल करने के बाद कम परिचालन लागत ई-बसों की शुरुआती अधिक कीमत की भरपाई करती है।

आईसीआरए (ICRA) ने कहा कि आने वाले वर्षों में ई-बस बाजार ओईएम (OEMs), ऑपरेटरों और निवेशकों के लिए बड़ा अवसर बन सकता है। Public Transport Authorities के तहत चलने वाले करीब 1.5 लाख बसों के पूरे बेड़े को अगले दशक में इलेक्ट्रिक करने पर लगभग 1.5 लाख करोड़ रुपये के पूंजी निवेश की जरूरत हो सकती है। ई-बस परियोजनाओं में Gross Cost Contract मॉडल प्रमुख संरचना के रूप में उभरा है, जिसमें ऑपरेटर बसों का स्वामित्व और संचालन करता है, जबकि पब्लिक ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी प्रति किलोमीटर के आधार पर भुगतान करती है। ICRA के अनुसार, उसकी रेटेड ई-बस परियोजनाओं में दैनिक संचालन अक्सर तय कॉन्ट्रैक्ट किलोमीटर से अधिक रहा है और ऊर्जा खपत भी अनुमान के अनुरूप रही है।

हालांकि, समय पर भुगतान, परियोजना क्रियान्वयन, बैटरी लागत और सप्लाई चेन से जुड़े जोखिम अभी भी चुनौती बने हुए हैं। कुछ परियोजनाओं में ऑपरेटरों के भुगतान में देरी और डिपो उपलब्ध कराने में देरी के कारण छह महीने से एक साल तक का कमर्शियलाइजेशन विलंब देखा गया है। बस की कुल लागत में बैटरी की हिस्सेदारी करीब 25-30% है, जबकि आयातित सेल, बैटरी और अन्य कंपोनेंट्स पर निर्भरता सप्लाई चेन जोखिम बढ़ाती है। आईसीआरए (ICRA) के अनुसार, Convergence Energy Services Limited के माध्यम से संचालित Payment Security Mechanism भुगतान संबंधी जोखिम को कम कर सकता है। KKR(केकेआर), Tata Motors(टाटा मोटर्स), Ashok Leyland(अशोक लेलैंड), JSW(जेएसडब्लयू), IFC(आईएफसी) और NIIF(एनआईआईएफ) समर्थित प्लेटफॉर्म जैसे रणनीतिक और वित्तीय निवेशकों की रुचि के साथ, घटती बैटरी लागत और बेहतर टीसीओ (TCO) से ई-बस बाजार की मांग को आगे बढ़ने की उम्मीद है। 

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