“Beyond Degrees: EdTech for Skills, Employability & the Future Workforce” थीम पर आधारित इस सत्र में यह स्पष्ट संदेश दिया गया कि अब केवल डिग्री हासिल करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि छात्रों को वास्तविक दुनिया की जरूरतों के अनुसार तैयार करना समय की सबसे बड़ी मांग बन चुकी है।
इस पैनल चर्चा में Microsoft Elevate की डॉ. विनी जौहरी, एमिटी यूनिवर्सिटी के एडिशनल प्रो वाइस चांसलर डॉ. चंद्रदीप टंडन, L&T EdTech के हेड फेबिन एमएफ और Classplus के, को-फाउंडर एवं सीईओ मुकुल रुस्तगी ने भाग लिया। सभी वक्ताओं ने अपने अनुभवों के आधार पर शिक्षा और उद्योग के बीच बढ़ते गैप, तेजी से बदलती तकनीकों और स्किल-आधारित लर्निंग की आवश्यकता पर विस्तार से चर्चा की।
चर्चा की शुरुआत करते हुए डॉ. विनी जौहरी ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्लाउड कंप्यूटिंग और डेटा एनालिटिक्स जैसी तकनीकों ने शिक्षा और उद्योग दोनों में क्रांतिकारी बदलाव लाए हैं। उन्होंने कहा कि टेक्नोलॉजी की यह तेजी शिक्षा प्रणाली के लिए एक चुनौती भी है, क्योंकि पाठ्यक्रम और शिक्षण पद्धतियां उसी गति से अपडेट नहीं हो पा रही हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि शिक्षकों को अपस्किल करना और उन्हें नई तकनीकों से जोड़ना बेहद जरूरी है, तभी छात्र इंडस्ट्री-रेडी बन पाएंगे।
उन्होंने आगे बताया कि AI के माध्यम से पर्सनलाइज्ड लर्निंग को बढ़ावा मिल रहा है, जिससे हर छात्र अपनी गति और क्षमता के अनुसार सीख सकता है। साथ ही, यह तकनीक शिक्षा को अधिक समावेशी बना रही है, जहां भाषा, स्थान और शारीरिक सीमाएं भी बाधा नहीं बनतीं।
डॉ. चंद्रदीप टंडन ने शिक्षा और रोजगार के बीच बढ़ते अंतर को एक गंभीर समस्या बताते हुए कहा कि आज इंडस्ट्री की अपेक्षाएं तेजी से बदल रही हैं, लेकिन शिक्षा प्रणाली उतनी तेजी से खुद को नहीं बदल पा रही। उन्होंने कहा कि पहले जहां रिसर्च केवल पब्लिकेशन तक सीमित थी, वहीं आज उसे पेटेंट, इनोवेशन और स्टार्टअप्स से जोड़ना जरूरी हो गया है। उन्होंने यह भी बताया कि विश्वविद्यालयों को अपने पाठ्यक्रम में नियमित रूप से बदलाव करना चाहिए और उसमें इंडस्ट्री की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करनी चाहिए, ताकि छात्र सीधे रोजगार के लिए तैयार हो सकें।
वहीं, फेबिन एमएफ ने इस बात पर जोर दिया कि आज केवल तकनीकी ज्ञान ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि छात्रों में समस्या समाधान की क्षमता और सही सोच विकसित करना भी उतना ही जरूरी है। उन्होंने कहा कि इंडस्ट्री में हर दिन नई चुनौतियां सामने आती हैं और ऐसे में युवाओं को ‘सॉल्यूशनिंग माइंडसेट’ अपनाना होगा। उन्होंने यह भी कहा कि टेक्नोलॉजी के बढ़ते उपयोग के साथ ‘एथिकल अप्रोच’ भी बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है, ताकि उसका सही और जिम्मेदार उपयोग सुनिश्चित किया जा सके।
पैनल चर्चा के दौरान यह बात भी उभरकर सामने आई कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आने वाले समय में हर क्षेत्र को गहराई से प्रभावित करेगा। चाहे वह शिक्षा हो, हेल्थकेयर, मैन्युफैक्चरिंग या फाइनेंस- AI हर जगह बदलाव का मुख्य कारक बनेगा। विशेषज्ञों ने बताया कि AI के जरिए कंटेंट को विभिन्न भाषाओं में बदलना, दिव्यांग छात्रों के लिए शिक्षा को आसान बनाना और व्यक्तिगत सीखने के अनुभव तैयार करना संभव हो गया है।
इसके साथ ही, इंडस्ट्री और एकेडेमिया के बीच मजबूत सहयोग की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया। वक्ताओं ने कहा कि यदि शिक्षा संस्थान और उद्योग साथ मिलकर काम करें, तो छात्रों को बेहतर प्रशिक्षण और वास्तविक अनुभव मिल सकता है। इस दिशा में कई संस्थान पहले से ही इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स को अपने पाठ्यक्रम में शामिल कर रहे हैं और स्किल-आधारित लर्निंग को बढ़ावा दे रहे हैं।
Classplus के मुकुल रुस्तगी ने कहा कि स्किलिंग एक निरंतर प्रक्रिया है, जो केवल स्कूल या कॉलेज तक सीमित नहीं रहती, बल्कि पूरे करियर के दौरान चलती रहती है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और एडटेक कंपनियां इस प्रक्रिया को और अधिक सुलभ और प्रभावी बना रही हैं।
चर्चा के अंत में सभी विशेषज्ञों ने इस बात पर सहमति जताई कि भविष्य का कार्यबल केवल डिग्री के आधार पर नहीं, बल्कि स्किल्स, अनुकूलन क्षमता और टेक्नोलॉजी के प्रभावी उपयोग से तय होगा। उन्होंने यह भी कहा कि शिक्षा प्रणाली को अधिक लचीला, प्रैक्टिकल और इंडस्ट्री-ओरिएंटेड बनाना होगा, ताकि छात्र बदलते समय के साथ खुद को ढाल सकें और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने के लिए तैयार हो सकें।