भारत के EV भविष्य के लिए स्किलिंग क्यों जरूरी?

भारत के EV भविष्य के लिए स्किलिंग क्यों जरूरी?

भारत के EV भविष्य के लिए स्किलिंग क्यों जरूरी?
ईवी उद्योग के लिए भविष्य के अनुरूप कुशल कार्यबल तैयार करने पर आयोजित इस पैनल चर्चा में विशेषज्ञों ने स्किलिंग, अपस्किलिंग और उद्योग-अकादमिक सहयोग की आवश्यकता पर जोर दिया।

भारत का इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) उद्योग तेजी से विकास के दौर से गुजर रहा है। सरकार की नीतियों, बढ़ते निवेश और नई तकनीकों के कारण यह क्षेत्र लगातार विस्तार कर रहा है। ऐसे में उद्योग की बढ़ती जरूरतों को पूरा करने के लिए एक कुशल और भविष्य के लिए तैयार कार्यबल (Future-Ready EV Workforce) का निर्माण बेहद महत्वपूर्ण हो गया है। इसी विषय पर आयोजित "Skilling India – Building a Future-Ready EV Workforce" पैनल चर्चा का संचालन संजीव कुमार झा, एडिटर, ऑन्त्रेप्रेन्योर इंडिया ने किया। इस चर्चा में डॉ. आनंद लक्ष्मणन, सीनियर प्रोजेक्ट एडवाइजर, एडवांस्ड ऑटोमोटिव टेक्नोलॉजीज एवं लीड, CAAR, तथा डॉ. ए.एस. रामाधास, डायरेक्टर, GARC ने विशेषज्ञ के रूप में भाग लिया। पैनल में ईवी  सेक्टर में स्किल डेवलपमेंट, उद्योग-अकादमिक सहयोग, MSMEs की चुनौतियों, अपस्किलिंग, रिस्किलिंग और भविष्य की तकनीकों पर विस्तृत चर्चा की गई।

भारत का EV उद्योग तेजी से आगे बढ़ रहा है, लेकिन क्या कुशल मानव संसाधन (Skilled Talent) भी उसी गति से तैयार हो रहा है?

डॉ. ए.एस. रामाधास: ईवी  उद्योग पहले की तुलना में कहीं अधिक तेजी से बढ़ रहा है। सरकार की PLI जैसी योजनाओं और घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा मिलने से उद्योग का विस्तार हो रहा है, लेकिन स्किल्ड मैनपावर अभी पूरी तरह तैयार नहीं है। अधिकांश विश्वविद्यालयों का पाठ्यक्रम अभी भी पारंपरिक IC इंजन पर आधारित है, जबकि EV तकनीक हाल के वर्षों में तेजी से विकसित हुई है। सरकारी संस्थानों में पाठ्यक्रम बदलने में समय लगता है, इसलिए छात्रों को उद्योग में आने के बाद अतिरिक्त प्रशिक्षण और अपस्किलिंग की आवश्यकता पड़ती है।

यदि कंपनियां कर्मचारियों को प्रशिक्षित करें और वे नौकरी छोड़ दें, तो क्या स्किलिंग में निवेश करना सही है?

डॉ. आनंद लक्ष्मणन: स्किलिंग से पीछे हटना कोई विकल्प नहीं है। कर्मचारी केवल कौशल के कारण नौकरी नहीं छोड़ते, बल्कि संगठन की संस्कृति, कार्य वातावरण और विकास के अवसर भी महत्वपूर्ण होते हैं। यदि कंपनियां अपने कर्मचारियों को प्रशिक्षित नहीं करेंगी तो वे प्रतिस्पर्धा में पीछे रह जाएंगी। इसलिए HR को बेहतर कार्य संस्कृति बनानी चाहिए, जबकि उद्योग और अकादमिक संस्थानों को मिलकर नई तकनीकों के अनुरूप स्किल डेवलपमेंट कार्यक्रम विकसित करने चाहिए।

एमएसएमई कंपनियों के सामने स्किलिंग की सबसे बड़ी चुनौती क्या है और इसका समाधान क्या हो सकता है?

डॉ. ए.एस. रामाधास: बड़े OEMs के पास प्रशिक्षण और रिसर्च के लिए पर्याप्त संसाधन होते हैं, लेकिन MSMEs के पास आधुनिक लैब और ट्रेनिंग इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने के लिए पर्याप्त निवेश नहीं होता। सरकार, बड़े उद्योग और MSMEs मिलकर क्लस्टर आधारित ट्रेनिंग सेंटर और साझा टेस्ट लैब स्थापित करें, जहां छोटे उद्योगों के कर्मचारी नई तकनीकों का व्यावहारिक प्रशिक्षण प्राप्त कर सकें।

ईवी क्षेत्र में तेजी से बदलती तकनीकों के बीच कंपनियां अपस्किलिंग और रिस्किलिंग कैसे बनाए रखें?

डॉ. ए.एस. रामाधास: बैटरी टेक्नोलॉजी, BMS, OTA, ADAS और सॉफ्टवेयर आधारित तकनीकें लगातार बदल रही हैं। इसलिए उद्योग, टेस्ट एजेंसियों और शैक्षणिक संस्थानों को मिलकर नियमित शॉर्ट-टर्म ट्रेनिंग, वर्कशॉप और क्लस्टर-आधारित कार्यक्रम आयोजित करने चाहिए ताकि इंजीनियर और तकनीकी पेशेवर नई तकनीकों से लगातार अपडेट रह सकें।

ईवी  सेक्टर में मजबूत टैलेंट पूल तैयार करने के लिए कंपनियों को क्या करना चाहिए?

 डॉ. आनंद लक्ष्मणन: OEMs और MSMEs को प्रतिस्पर्धी नहीं बल्कि साझेदार की तरह काम करना चाहिए। नई तकनीकों के विकास के साथ-साथ सप्लाई चेन से जुड़े MSMEs को भी शुरुआती स्तर पर प्रशिक्षण और तकनीकी जानकारी दी जानी चाहिए। केवल सैद्धांतिक प्रशिक्षण पर्याप्त नहीं है, बल्कि इंजीनियरों को अत्याधुनिक लैब में व्यावहारिक अनुभव देना भी उतना ही जरूरी है।

भारत में सेमीकंडक्टर स्किल्स की कमी को कैसे दूर किया जा सकता है?

 डॉ. आनंद लक्ष्मणन: सेमीकंडक्टर एक अत्यधिक विशेषज्ञता वाला क्षेत्र है, जिसमें केवल रिस्किलिंग पर्याप्त नहीं है। इसके लिए बुनियादी स्तर से शिक्षा, बड़े निवेश और मजबूत औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र की आवश्यकता है। जब भारत में सेमीकंडक्टर उद्योग बड़े स्तर पर विकसित होगा, तब इस क्षेत्र में स्किलिंग भी तेजी से बढ़ेगी।

ईवी के अलावा भविष्य की कौन-सी तकनीकें मोबिलिटी सेक्टर को बदलेंगी?

डॉ. ए.एस. रामाधास: आने वाले वर्षों में सॉफ्टवेयर-डिफाइंड व्हीकल्स (SDV), ADAS (Advanced Driver Assistance Systems) और हाइड्रोजन फ्यूल सेल तकनीकें ऑटोमोबाइल उद्योग की दिशा तय करेंगी। विशेष रूप से भारी वाणिज्यिक वाहनों में हाइड्रोजन आधारित तकनीकों को बढ़ावा देने के लिए सरकार सक्रिय रूप से कार्य कर रही है।

निष्कर्ष

पैनल चर्चा का निष्कर्ष यह रहा कि भारत में ईवी उद्योग की तेज़ प्रगति के साथ-साथ स्किल डेवलपमेंट को भी समान गति से आगे बढ़ाना होगा। इसके लिए उद्योग, शैक्षणिक संस्थानों, सरकार और अनुसंधान संगठनों के बीच मजबूत सहयोग आवश्यक है। व्यावहारिक प्रशिक्षण, आधुनिक लैब, नियमित अपस्किलिंग और रिस्किलिंग कार्यक्रम, तथा MSMEs को तकनीकी सहयोग प्रदान कर ही भारत एक मजबूत और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी ईवी कार्यबल तैयार कर सकता है, जो देश को स्वच्छ और टिकाऊ मोबिलिटी के भविष्य की ओर ले जाएगा।

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