भारत में इलेक्ट्रिक व्हीकल अपनाने की रफ्तार तेजी से बढ़ रही है, लेकिन इसके साथ मजबूत और विश्वसनीय चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत भी उतनी ही अहम हो गई है। इस खास बातचीत में ज़ेनर्जाइज़ (Zenergize) के को-फाउंडर और सीईओ नवनीत डागा ने ईवी चार्जिंग सेक्टर से जुड़े अहम मुद्दों, चुनौतियों और भविष्य के अवसरों पर विस्तार से चर्चा करते हुए बताया कि भारत में चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर के सामने विश्वसनीयता, तकनीकी आत्मनिर्भरता और नेटवर्क विस्तार जैसी बड़ी चुनौतियां हैं। साथ ही, “Make in India”, सॉफ्टवेयर-आधारित इंटेलिजेंस और एडवांस टेक्नोलॉजी की भूमिका पर भी उन्होंने अपने विचार साझा किए, जो भारत के ईवी इकोसिस्टम को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण साबित हो सकता हैं।
भारत का ईवी इकोसिस्टम तेजी से बढ़ रहा है। आपके अनुसार ईवी चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर में अभी सबसे बड़ी कमियां क्या हैं?
नवनीत डागा: गति अच्छी है और प्रगति भी हो रही है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर तीन बड़ी कमियां साफ दिखती हैं।
विश्वसनीयता (Reliability): आज लगाए जा रहे कई चार्जर यूरोप या चीन की परिस्थितियों के लिए डिजाइन किए गए हैं, जहां बिजली स्थिर रहती है और तापमान सामान्य होता है। भारत में यह अंतर जल्दी सामने आ जाता है। तेज गर्मी में चार्जर धीमे हो जाते हैं या बंद हो जाते हैं, और बिजली के उतार-चढ़ाव में चार्जिंग रुक जाती है। इससे uptime कम रहता है और लोगों का भरोसा जल्दी कम हो जाता है।
टेक्नोलॉजी पर नियंत्रण (Technology Ownership): अभी ज्यादातर चार्जर आयातित हैं या आयातित किट से बने हैं, जिनमें घरेलू इंजीनियरिंग बहुत कम है। जब कोई समस्या आती है, तो ऑपरेटर को विदेशी सप्लायर्स पर निर्भर रहना पड़ता है, चाहे वह रिपेयर हो, पार्ट्स हों या अपडेट। यह लंबे समय के लिए सही मॉडल नहीं है।
चार्जिंग नेटवर्क की उपलब्धता (Density & Distribution): शहरों में कुछ हद तक चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ा है, लेकिन छोटे शहरों और हाईवे पर अभी भी काफी कमी है। अगर ईवी को सच में हर जगह अपनाना है, तो इस नेटवर्क को तेजी से और मजबूत तरीके से बढ़ाना होगा।
Zenergize की शुरुआत की प्रेरणा क्या थी और आपने किस समस्या को हल करने का लक्ष्य रखा?
नवनीत डागा: इसकी प्रेरणा हमें सीधे ज़मीनी हकीकत से मिली। मेरे टेक्नोलॉजी बिजनेस को बढ़ाने के अनुभव और वीर के पावर इलेक्ट्रॉनिक्स (सोलर पीवी और भारतीय रेलवे) के अनुभव के आधार पर हम दोनों इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि भारत में जो चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर लगाया जा रहा है, वह भारत के लिए डिजाइन ही नहीं किया गया है।
हमारी कोशिश एक बेहद बुनियादी लेकिन महत्वपूर्ण समस्या को हल करने की थी ऐसे पावर इलेक्ट्रॉनिक्स बनाना जो सिर्फ भारत में इस्तेमाल न हों, बल्कि पूरी तरह भारत के लिए डिजाइन और मैन्युफैक्चर किए जाएं। यानी उनकी डिजाइन में भारतीय बिजली व्यवस्था और मौसम की परिस्थितियों को शुरुआत से शामिल किया जाए।
भारत में बहुत ज्यादा गर्मी, बार-बार बिजली का उतार-चढ़ाव और पावर कट आम बात है। ये कोई अपवाद नहीं, बल्कि रोज़ की सच्चाई है। लेकिन बाजार में उपलब्ध प्रोडक्ट्स इन परिस्थितियों को गंभीरता से नहीं लेते थे। हमें भरोसा था कि भारत में इतनी क्षमता है कि हम विश्व-स्तरीय पावर इलेक्ट्रॉनिक्स खुद बना सकते हैं,इसी सोच ने ज़ेनर्जाइज़ (Zenergize) की शुरुआत की।
भारत में बड़ी संख्या में ईवी चार्जर अभी भी आयातित या विदेशी कंपोनेंट्स से बने होते हैं। इसका परफॉरमेंस, विश्वसनीयता और लंबे समय की लागत पर क्या असर पड़ता है?
नवनीत डागा: इसका असर काफी बड़ा होता है, लेकिन अक्सर इसे कम करके आंका जाता है। जब कोई प्रोडक्ट किसी दूसरे देश की जलवायु और बिजली व्यवस्था के लिए डिजाइन किया गया हो, तो उसे भारत में बिना किसी समस्या के चलाना संभव नहीं है।
जमीनी स्तर पर ऑपरेटर देखते हैं कि तेज गर्मी में चार्जर धीमे हो जाते हैं या बंद हो जाते हैं, और बिजली के उतार-चढ़ाव के समय चार्जिंग बार-बार रुक जाती है। भारत में ये समस्याएं नियमित रूप से होती हैं।
विश्वसनीयता के मामले में, आयात पर निर्भरता एक बड़ी चुनौती है। जब टेक्नोलॉजी किसी विदेशी कंपनी के पास होती है, तो हर अपडेट, रिपेयर या तकनीकी समस्या के लिए उसी पर निर्भर रहना पड़ता है। इससे समय भी बढ़ता है और लागत भी, और ऑपरेटर कमजोर स्थिति में आ जाता है।
लंबे समय में यह निर्भरता और महंगी साबित होती है। जैसे-जैसे ऑपरेशन बढ़ता है और ग्राहकों की उम्मीदें बढ़ती हैं, वैसे-वैसे ऐसे प्रोडक्ट्स की जरूरत होती है जिन्हें आसानी से अपडेट और बेहतर किया जा सके। लेकिन जब टेक्नोलॉजी आपके नियंत्रण में नहीं होती, तो यह मुश्किल हो जाता है।
इसलिए असली लागत बचत तभी संभव है जब चार्जर शुरुआत से ही भारतीय परिस्थितियों के अनुसार डिजाइन किए गए हों और उनका सपोर्ट भी देश के अंदर ही उपलब्ध हो।
हाल ही में दिल्ली ईवी पॉलिसी में चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ाने और ईवी अपनाने पर जोर दिया गया है। ऐसी राज्य स्तरीय नीतियां इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास पर कैसा प्रभाव डाल रही हैं, और बेहतर लागू करने के लिए क्या जरूरी है?
नवनीत डागा: दिल्ली जैसी राज्य स्तरीय ईवी नीतियां काफी महत्वपूर्ण होती हैं। ये मांग पैदा करती हैं, निवेश को दिशा देती हैं और ऑपरेटर्स व निवेशकों को लंबे समय के लिए भरोसा देती हैं। जब सरकार चार्जिंग नेटवर्क के स्पष्ट लक्ष्य तय करती है और उसके साथ प्रोत्साहन देती है, तो इंफ्रास्ट्रक्चर तेजी से विकसित होता है।
लेकिन केवल नीति बनाना ही पर्याप्त नहीं है। अगर बहुत तेजी से काम किया जाए, तो अक्सर क्वालिटी और विश्वसनीयता पीछे रह जाती है। नतीजा यह होता है कि चार्जर तो लग जाते हैं, लेकिन उनका अपटाइम अच्छा नहीं होता। इससे ईवी उपयोगकर्ताओं का भरोसा कम होता है और अपनाने की गति भी प्रभावित होती है।
इसलिए जरूरी है कि इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ाने के साथ-साथ परफॉर्मेंस स्टैंडर्ड्स पर भी ध्यान दिया जाए। नीतियों में न्यूनतम अपटाइम, तापमान में काम करने की क्षमता और बिजली की अस्थिरता से निपटने की क्षमता जैसे मानक तय होने चाहिए।
साथ ही, सरकारी और निजी खरीद (procurement) में सिर्फ कम कीमत को प्राथमिकता नहीं दी जानी चाहिए, बल्कि विश्वसनीयता और स्वदेशी तकनीक को भी महत्व दिया जाना चाहिए। सही क्रियान्वयन वहीं संभव है, जहां नीतियां केवल संख्या नहीं, बल्कि क्वालिटी और लोंगटर्म परिणामों पर भी ध्यान दें।
वैश्विक स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और सप्लाई चेन में बाधाओं के बीच, आयात पर निर्भरता भारत की ऊर्जा सुरक्षा और अर्थव्यवस्था को कैसे प्रभावित करती है?
नवनीत डागा: सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि ईवी चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर क्या है। यह हर इलेक्ट्रिक वाहन, हर फ्लीट और भविष्य के पूरे शहरी मोबिलिटी सिस्टम की नींव है। यह कोई साधारण उपभोक्ता उत्पाद नहीं, बल्कि देश की मोबिलिटी और ऊर्जा परिवर्तन की रीढ़ है।
जैसे हम अपने पावर ग्रिड या टेलीकॉम सिस्टम के लिए विदेशी तकनीक पर पूरी तरह निर्भर नहीं रह सकते, वैसे ही ईवी चार्जिंग नेटवर्क में भी ऐसी निर्भरता ठीक नहीं है। लेकिन फिलहाल स्थिति कुछ ऐसी ही है, और इस जोखिम पर उतना ध्यान नहीं दिया जा रहा जितना देना चाहिए। इसमें कई तरह के जोखिम हैं।
कम समय में: सप्लाई चेन में रुकावट (जैसे COVID के बाद देखा गया) से उपलब्धता और कीमतों में उतार-चढ़ाव आता है।
मध्यम अवधि में: भारत अपनी जरूरत के हिसाब से सिस्टम को बदलने, अपग्रेड करने या सुरक्षित करने में सीमित हो जाता है।
रणनीतिक स्तर पर: ईवी से जुड़ी बड़ी टेक्नोलॉजी अभी चीन जैसे देशों से आती है, जो एक बड़ा जोखिम है।
इसलिए असली ऊर्जा सुरक्षा का मतलब है कि हम अपनी टेक्नोलॉजी खुद विकसित करें—सिर्फ असेंबली नहीं, बल्कि रिसर्च, सॉफ्टवेयर (फर्मवेयर) और मैन्युफैक्चरिंग सब कुछ भारत में हो। यही सोच Zenergize में हमारे काम की आधार है, और इसी वजह से “Make in India” और “आत्मनिर्भर भारत” जैसे विजन ईवी सेक्टर में भी उतने ही जरूरी हैं जितने सेमीकंडक्टर या रक्षा क्षेत्र में।
ईवी चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर में “Make in India” कितना महत्वपूर्ण है, और असली इंडिजिनाइजेशन (स्वदेशीकरण) असेंबली से आगे कैसे दिखता है?
नवनीत डागा: “मेक इन इंडिया” इस क्षेत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन यहां एक बात साफ समझनी जरूरी है,सिर्फ असेंबली करना असली स्वदेशीकरण नहीं है। बाहर से पूरी तरह डिजाइन किए गए PCB लाकर उन्हें भारत में जोड़ देना और उस पर “Made in India” लिख देना, न तो तकनीकी क्षमता बनाता है और न ही लंबे समय के लिए आत्मनिर्भरता देता है।
हमारे नजरिए से असली स्वदेशीकरण का मतलब है पूरी टेक्नोलॉजी पर खुद का नियंत्रण होना। इसमें हार्डवेयर डिजाइन, PCB लेआउट, फर्मवेयर और कंट्रोल एल्गोरिदम, थर्मल इंजीनियरिंग और महत्वपूर्ण कंपोनेंट्स की मैन्युफैक्चरिंग शामिल है। इसका मतलब यह भी है कि आपके इंजीनियर हर डिजाइन को समझें, उसमें बदलाव कर सकें और बिना किसी विदेशी सप्लायर पर निर्भर हुए उसे बेहतर बना सकें।
ज़ेनर्जाइज़ (Zenergize) में हमने यही मॉडल अपनाया है। हम अपने पावर स्टेज खुद डिजाइन करते हैं, कंट्रोल एल्गोरिदम खुद विकसित करते हैं और खास कंपोनेंट्स जैसे इंडक्टर्स और हीट सिंक खुद बनाते हैं। जहां संभव होता है, वहां हम भारतीय सप्लायर्स के साथ काम करते हैं।
यही असली स्वदेशी पावर-इलेक्ट्रॉनिक्स इकोसिस्टम है—जहां तकनीक भारत में बनाई जाए और वही भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करे, न कि केवल आयातित किट्स को यहां जोड़कर इस्तेमाल किया जाए।
भारत में ईवी चार्जर उच्च तापमान और अस्थिर बिजली जैसी कठिन परिस्थितियों में काम करते हैं। इन चुनौतियों से निपटने के लिए किस तरह के डिजाइन और इंजीनियरिंग बदलाव जरूरी हैं?
नवनीत डागा: यह हमारे काम का मुख्य हिस्सा है, इसलिए इसे स्पष्ट रूप से समझना जरूरी है।
थर्मल परफॉर्मेंस (गर्मी से जुड़ी समस्या): आमतौर पर चार्जर 40–45°C तक के तापमान के लिए डिजाइन किए जाते हैं और उसके बाद उनकी क्षमता कम कर दी जाती है, लेकिन भारत में यह तरीका काम नहीं करता। यहां चार्जर को 55°C तक भी पूरी क्षमता के साथ चलने के लिए डिजाइन करना जरूरी है। इसके लिए सही सेमीकंडक्टर का चयन करना होता है, जैसे हम SiC MOSFETs का उपयोग करते हैं, जो ज्यादा गर्मी सहन कर सकते हैं। साथ ही, मजबूत थर्मल डिजाइन और मैकेनिकल इंजीनियरिंग जरूरी होती है। गर्मी की समस्या को शुरुआत से ही डिजाइन में हल करना चाहिए, न कि बाद में फैन लगाकर ठीक करने की कोशिश करनी चाहिए।
बिजली की अस्थिरता (Grid Instability): भारत में बिजली का उतार-चढ़ाव आम है, इसलिए चार्जर में ऐसी तकनीक होनी चाहिए जो इन परिस्थितियों में भी चार्जिंग को जारी रखे। इसके लिए फर्मवेयर में ही सुरक्षा और रिकवरी सिस्टम शामिल करना जरूरी है। हमारे चार्जर इस तरह डिजाइन किए गए हैं कि छोटे वोल्टेज बदलाव से चार्जिंग बंद नहीं होती। इसके अलावा, पावर कट के बाद चार्जर अपने आप दोबारा शुरू हो सकते हैं, जिससे बार-बार मैन्युअल हस्तक्षेप की जरूरत नहीं पड़ती।
यह सब तभी संभव है जब आपके पास पूरी टेक्नोलॉजी खासकर फर्मवेयर और कंट्रोल सिस्टम पर अपना नियंत्रण हो। इसे बाद में किसी विदेशी कंपनी से जोड़कर हासिल नहीं किया जा सकता।
भारत के लिए डिजाइन शुरू से ही भारतीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर होना चाहिए, न कि बाद में उसमें बदलाव किया जाए। यही सोच (mindset) इस इंडस्ट्री में जरूरी है।
बढ़ती डिजिटलाइजेशन और सॉफ्टवेयर-आधारित इंटेलिजेंस EV चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को कैसे बदल रही है?
नवनीत डागा: यह बदलाव बहुत बड़ा है और पूरी इंडस्ट्री को नई दिशा दे रहा है। जो कंपनियां इसे जल्दी समझ लेंगी, उन्हें बड़ा फायदा मिलेगा।अब हार्डवेयर सिर्फ एक मशीन नहीं रह गया है, बल्कि यह सॉफ्टवेयर के लिए एक प्लेटफॉर्म बन गया है। चार्जर सिर्फ एक हिस्सा है, असली महत्व उन चीजों का है जो इसके ऊपर काम करती हैं—जैसे रिमोट डायग्नोस्टिक्स (दूर से समस्या पहचानना), प्रिडिक्टिव मेंटेनेंस (पहले से खराबी का अंदाजा), लोड मैनेजमेंट और चार्जिंग को बेहतर बनाना।
आज अगर किसी ऑपरेटर के पास शहर में सैकड़ों चार्जर हैं, तो हर छोटी समस्या के लिए टेक्नीशियन भेजना संभव नहीं है। ऐसे में जरूरी है कि सिस्टम खुद समस्या पहचान सके, अलर्ट दे सके और कई मामलों में खुद ही ठीक भी हो जाए—यह सब सॉफ्टवेयर के जरिए संभव है।
यह क्षमता तभी आती है जब कंपनी के पास पूरी टेक्नोलॉजी—खासकर फर्मवेयर और कंट्रोल सिस्टम—का मालिकाना हक हो। Zenergize में हम अपने सॉफ्टवेयर खुद विकसित करते हैं, इसलिए हम रिमोट से अपडेट दे सकते हैं, चार्जिंग को बेहतर बना सकते हैं और बिना किसी तीसरे पक्ष पर निर्भर हुए सिस्टम को लगातार सुधार सकते हैं।
आगे चलकर स्मार्ट चार्जिंग, ग्रिड के हिसाब से लोड मैनेजमेंट, समय के अनुसार बिजली की कीमत (time-of-use pricing) और रिन्यूएबल एनर्जी के साथ इंटीग्रेशन जैसे फीचर्स और महत्वपूर्ण होंगे। भविष्य का चार्जर सिर्फ बिजली देने वाली मशीन नहीं होगा, बल्कि एक स्मार्ट और इंटेलिजेंट सिस्टम होगा जो पूरे ग्रिड का अहम हिस्सा बनेगा।
Silicon Carbide (SiC) जैसी एडवांस टेक्नोलॉजी ईवी चार्जर्स की efficiency और performance को कैसे बेहतर बनाती है?
नवनीत डागा: SiC पावर इलेक्ट्रॉनिक्स में पिछले कुछ वर्षों की सबसे महत्वपूर्ण तकनीकी प्रगति में से एक है और Zenergize में हमारी इंजीनियरिंग का अहम हिस्सा है।
इसका सबसे बड़ा फायदा स्विचिंग परफॉर्मेंस में होता है। SiC MOSFETs में पारंपरिक सिलिकॉन IGBT की तुलना में लगभग 70–80% कम स्विचिंग लॉस होता है। इसका सीधा असर यह होता है कि सिस्टम की efficiency 94–95% से बढ़कर लगभग 97–98.5% तक पहुंच जाती है। बड़े स्तर पर काम करने वाले फ्लीट ऑपरेटर्स या बस OEMs के लिए यह बिजली की लागत में बड़ी बचत का कारण बनता है।
भारतीय परिस्थितियों के लिए इसका थर्मल परफॉर्मेंस भी बहुत महत्वपूर्ण है। SiC डिवाइस ज्यादा तापमान पर भी भरोसेमंद तरीके से काम कर सकते हैं, यही कारण है कि हमारे सिस्टम 55°C तक बिना क्षमता घटाए (derating के बिना) काम करते हैं।
इसके अलावा, SiC हाई-फ्रीक्वेंसी स्विचिंग को सपोर्ट करता है, जिससे चार्जर का डिजाइन अधिक कॉम्पैक्ट (छोटा और हल्का) बनाया जा सकता है, क्योंकि बड़े कंपोनेंट्स की जरूरत कम हो जाती है।
लेकिन एक जरूरी बात यह है कि SiC का पूरा फायदा तभी मिलता है जब पूरे सिस्टम को शुरुआत से ही इसी तकनीक के हिसाब से डिजाइन किया जाए। अगर इसे पुराने डिजाइन में बाद में जोड़ दिया जाए, तो इसके फायदे पूरी तरह नहीं मिलते।
हम अपने पूरे सिस्टम को इन-हाउस डिजाइन करते हैं, जिससे हम हर लेयर को SiC के अनुसार ऑप्टिमाइज़ कर पाते हैं। यही कारण है कि हमें बेहतर efficiency के साथ-साथ वास्तविक परिस्थितियों में मजबूत और भरोसेमंद परफॉरमेंस मिलता है।
स्वदेशी (indigenous) सॉल्यूशंस के लिए शुरुआती मांग बढ़ती दिख रही है। आपको बाजार से कैसा रिस्पॉन्स मिला है और यह भविष्य के अवसरों के बारे में क्या संकेत देता है?
नवनीत डागा: अब तक हमें बाजार से काफी सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली है, और सबसे खास बात यह है कि यह प्रतिक्रिया ऐसे ग्राहकों से आ रही है जो अच्छी तरह समझते हैं कि वे क्या चुन रहे हैं।
फ्लीट ऑपरेटर्स, बस OEMs और बड़े चार्ज पॉइंट ऑपरेटर्स पहले ही ऐसे चार्जर्स का अनुभव कर चुके हैं जो भारतीय परिस्थितियों में अच्छा परफॉरमेंस नहीं करते। उन्होंने गर्मी में चार्जर के धीमे होने, बिजली की समस्या के कारण चार्जिंग रुकने और विदेशी सप्लाई चेन पर निर्भर सपोर्ट में देरी जैसी समस्याएं देखी हैं।
जब उन्हें ऐसा प्रोडक्ट मिलता है जो वास्तव में भारतीय परिस्थितियों के अनुसार डिजाइन किया गया हो और जिसकी पूरी टेक्नोलॉजी उसी कंपनी के पास हो, तो उनका भरोसा बढ़ता है और बातचीत भी गंभीरता से आगे बढ़ती है।
इससे यह साफ होता है कि बाजार अब परिपक्व हो रहा है। पहले खरीद के फैसले मुख्य रूप से कीमत और उपलब्धता पर आधारित थे, लेकिन अब ऑपरेटर्स कुल लागत (total cost of ownership) और uptime पर ध्यान दे रहे हैं। अब विश्वसनीयता और घरेलू सपोर्ट क्षमता एक असली प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त बन चुकी है, न कि सिर्फ एक फीचर या स्पेसिफिकेशन।
कंपनी को मजबूत मांग मिल रही है। इससे स्वदेशी सॉल्यूशंस के लिए बाजार के अवसरों के बारे में क्या संकेत मिलता है?
नवनीत डागा: यह उस विश्वास को सही साबित करता है जो हमें शुरुआत से था कि भारत के ईवी ट्रांजिशन में आखिरकार ऐसी पावर इलेक्ट्रॉनिक्स की जरूरत होगी जो यहीं डिजाइन, विकसित और सपोर्ट की जाएं। अभी जो मजबूत शुरुआती मांग दिख रही है, वह बताती है कि यह बदलाव भविष्य की बात नहीं, बल्कि अभी शुरू हो चुका है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि खरीद कौन कर रहा है और क्यों। ये ऐसे ग्राहक नहीं हैं जो सिर्फ शुरुआत में प्रयोग कर रहे हों, बल्कि ये वे ऑपरेटर्स हैं जो 10 साल की लंबी अवधि को ध्यान में रखकर इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश कर रहे हैं।
इस तरह की मांग यह दिखाती है कि बाजार का अवसर केवल बड़ा ही नहीं, बल्कि दीर्घकालिक और संरचनात्मक (structural) है। आने वाले दशक में भारत को बहुत बड़ा चार्जिंग नेटवर्क तैयार करना होगा, और जिन कंपनियों के पास मजबूत और वास्तविक टेक्नोलॉजी क्षमता होगी, वही इस क्षेत्र को आगे बढ़ाएंगी। ज़ेनर्जाइज़ (Zenergize) इसी अवसर को ध्यान में रखते हुए अपनी मजबूत तकनीकी नींव के साथ आगे बढ़ रही है।
आने वाले 3–5 वर्षों में भारत में सफल ईवी चार्जिंग कंपनियों को क्या चीजें अलग बनाएंगी?
नवनीत डागा: मेरे अनुसार, तीन मुख्य चीजें ईवी चार्जिंग कंपनियों को अलग पहचान देंगी।
टेक्नोलॉजी का मालिकाना हक (Technology Ownership): जैसे-जैसे बाजार परिपक्व होगा और ग्राहक अधिक समझदार बनेंगे, असली टेक्नोलॉजी कंपनियों और सिर्फ असेंबली करने वाली कंपनियों के बीच अंतर साफ दिखाई देगा। ऑपरेटर्स को बेहतर uptime, तेज सपोर्ट और सिस्टम को कस्टमाइज व अपडेट करने की जरूरत होगी—जो तभी संभव है जब कंपनी के पास पूरी टेक्नोलॉजी का नियंत्रण हो।
भारतीय परिस्थितियों में साबित परफॉरमेंस (Proven Performance): गर्मी में स्थिर परफॉरमेंस, बिजली के उतार-चढ़ाव को संभालने की क्षमता और लगातार uptime अब खास फीचर नहीं, बल्कि बुनियादी जरूरत बन जाएंगे। जिन कंपनियों ने अपने प्रोडक्ट्स को शुरू से भारतीय परिस्थितियों के अनुसार डिजाइन नहीं किया है, उनके लिए बड़े स्तर पर विस्तार के बाद अपनी कमियों को छुपाना मुश्किल होगा।
बदलते इकोसिस्टम के साथ विकसित होने की क्षमता: आने वाले समय में चार्जिंग स्पीड बढ़ेगी, ग्रिड के साथ इंटीग्रेशन ज्यादा जटिल होगा और सॉफ्टवेयर की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाएगी। जो कंपनियां मॉड्यूलर, सॉफ्टवेयर-अपडेटेबल और मजबूत इंजीनियरिंग वाले प्लेटफॉर्म बनाएंगी, वे लगातार खुद को बेहतर कर पाएंगी। वहीं, जो कंपनियां थर्ड-पार्टी हार्डवेयर या विदेशी फर्मवेयर पर निर्भर हैं, उनकी सीमाएं बनी रहेंगी।
ज़ेनर्जाइज़ (Zenergize) में हम शुरुआत से ही इन्हीं मजबूत आधारों पर काम कर रहे हैं। आने वाले 3–5 सालों में वही कंपनियां आगे निकलेंगी जिन्होंने भारत के लिए सही तरीके से इंजीनियरिंग की है, न कि सिर्फ यहां अपने प्रोडक्ट्स को तैनात किया है।