शिक्षा में बदलाव का समय: यूनिवर्सिटी-इंडस्ट्री सहयोग और AI से तैयार होगा नया भारत

शिक्षा में बदलाव का समय: यूनिवर्सिटी-इंडस्ट्री सहयोग और AI से तैयार होगा नया भारत

शिक्षा में बदलाव का समय: यूनिवर्सिटी-इंडस्ट्री सहयोग और AI से तैयार होगा नया भारत
नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित इंडियन एजुकेशन कांग्रेस एंड अवॉर्ड्स में देशभर के शिक्षाविदों, नीति निर्माताओं और इंडस्ट्री लीडर्स ने एक मंच पर आकर भारत की शिक्षा व्यवस्था के भविष्य पर गहन चर्चा की।


इस वर्ष का मुख्य विषय था 'यूनिवर्सिटीज और इंडस्ट्री: स्टार्टअप कल्चर बनाना और फ्यूचर-रेडी टैलेंट तैयार करना' कार्यक्रम में इस बात पर जोर दिया गया कि तेजी से बदलती टेक्नोलॉजी, खासकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के दौर में, पारंपरिक शिक्षा मॉडल अब पर्याप्त नहीं हैं और भारत को अपने युवाओं को ग्लोबल स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए शिक्षा प्रणाली में बड़े बदलाव करने होंगे।

विशेषज्ञों की साझा राय: शिक्षा में बदलाव जरूरी 

इस चर्चा में प्रो. परिमल मांडके (VP, NIIT University), प्रो. रंजना झा (Vice Chancellor, Indira Gandhi Delhi Technical University for Women), अनुज विश्वकर्मा (CEO- Higher Education, UpGrad), शयान दासवर्मा (Director-India office & Head of Marketing, South Asia & MENA, Vita Student) और प्रो. दीपु फिलिप (Professor In Charge, Innovation & Incubation, IIT-Kanpur) जैसे प्रमुख विशेषज्ञों ने अपने विचार साझा किए। सभी वक्ताओं का मानना था कि अब समय आ गया है कि यूनिवर्सिटी और इंडस्ट्री के बीच की दूरी खत्म की जाए और एक ऐसा इकोसिस्टम बनाया जाए जहां शिक्षा केवल थ्योरी तक सीमित न रहकर वास्तविक जीवन की जरूरतों से जुड़ी हो।

पारंपरिक शिक्षा मॉडल की सीमाएं 

चर्चा की शुरुआत में यह बात सामने आई कि पिछले कई दशकों से यूनिवर्सिटीज छात्रों को तैयार करने के लिए इंटर्नशिप, सैंडविच प्रोग्राम्स, इंडस्ट्री सर्टिफिकेशन और स्किल-आधारित कोर्सेज का सहारा लेती रही हैं। हालांकि इन प्रयासों से कुछ हद तक रोजगार क्षमता में सुधार हुआ है, लेकिन आज के समय में यह मॉडल पूरी तरह से पर्याप्त नहीं है। प्रो. परिमल मांडके ने इसे “इनऑर्गेनिक मॉडल” बताते हुए कहा कि अब समय आ गया है कि हम “ऑर्गेनिक हाइब्रिड मॉडल” की ओर बढ़ें, जिसमें इंडस्ट्री सीधे क्लासरूम का हिस्सा बने।

उन्होंने आगे कहा कि यदि इंडस्ट्री कोर्स लेवल पर यूनिवर्सिटी में आए और छात्रों को पहले साल से ही रियल-टाइम प्रोजेक्ट्स पर काम करने का अवसर मिले, तो सीखने की प्रक्रिया अधिक प्रभावी हो सकती है। इससे छात्र केवल किताबों तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि उन्हें वास्तविक समस्याओं को समझने और हल करने का अनुभव मिलेगा। इस तरह की शिक्षा उन्हें तुरंत रोजगार योग्य बनाने के साथ-साथ उन्हें नवाचार के लिए भी प्रेरित करेगी।

दिल्ली में इनोवेशन इकोसिस्टम का विस्तार और महिला उद्यमिता को बढ़ावा 

प्रो. रंजना झा ने इस संदर्भ में दिल्ली सरकार की पहलों का उल्लेख किया, जिसने राजधानी को एक मजबूत स्टार्टअप और इनोवेशन हब के रूप में विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने बताया कि दिल्ली में 11 इनक्यूबेशन सेंटर स्थापित किए गए हैं, जो यूनिवर्सिटीज और प्रोफेशनल संस्थानों में नवाचार को बढ़ावा दे रहे हैं। ये सेंटर हजारों छात्रों को अपने आइडियाज को स्टार्टअप में बदलने के लिए प्लेटफॉर्म और संसाधन प्रदान कर रहे हैं।

उन्होंने विशेष रूप से IGTUW इनोवेशन फाउंडेशन का जिक्र किया, जो महिलाओं द्वारा संचालित स्टार्टअप्स को बढ़ावा देने का एक राष्ट्रीय मॉडल बन चुका है। वर्तमान में यहां 50 से अधिक महिला-नेतृत्व वाले स्टार्टअप्स विभिन्न क्षेत्रों जैसे AI, हेल्थकेयर, एजुकेशन, सस्टेनेबिलिटी और डिजाइन में काम कर रहे हैं। यह पहल न केवल महिलाओं को सशक्त बना रही है, बल्कि देश के स्टार्टअप इकोसिस्टम को भी मजबूत कर रही है।

इसके साथ ही उन्होंने NEEV (New Era of Entrepreneurial Ecosystem and Vision) प्रोग्राम का भी जिक्र किया, जो स्कूल स्तर पर ही उद्यमिता की सोच विकसित करने का प्रयास कर रहा है। यह कार्यक्रम कक्षा 8 से 12 तक के लगभग 10 लाख छात्रों तक पहुंच चुका है और इसमें छात्रों को हर सप्ताह एक विशेष पीरियड के माध्यम से उद्यमिता, इनोवेशन और समस्या समाधान सिखाया जा रहा है।

टैलेंट गैप: बड़ी चुनौती

इंडस्ट्री के नजरिए से अनुज विश्वकर्मा ने एक अहम मुद्दा उठाया भारत में टैलेंट की कमी नहीं है, लेकिन “क्वालिटी टैलेंट” की कमी जरूर है। उन्होंने कहा कि कंपनियां हायर करना चाहती हैं, लेकिन कई बार उम्मीदवारों में या तो कम्युनिकेशन स्किल की कमी होती है या फिर प्रैक्टिकल टेक्निकल स्किल की। इस कारण इंडस्ट्री और अकादमिक संस्थानों के बीच एक बड़ा गैप बन जाता है।

उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि Flipkart, Myntra, Ola जैसे बड़े स्टार्टअप्स में काम करते समय सबसे बड़ी चुनौती सही टैलेंट ढूंढना रही है। इस समस्या का समाधान तभी संभव है जब यूनिवर्सिटी और इंडस्ट्री मिलकर छात्रों को रियल-लाइफ एक्सपीरियंस दें। उन्होंने AI और टेक्नोलॉजी आधारित स्किल्स के साथ-साथ सॉफ्ट स्किल्स के विकास पर भी जोर दिया।

लर्निंग के लिए सही माहौल का महत्व

शयान दासवर्मा ने इस चर्चा को एक अलग दिशा देते हुए कहा कि शिक्षा केवल क्लासरूम तक सीमित नहीं है। उन्होंने बताया कि छात्र जिस वातावरण में रहते हैं, वह भी उनके सीखने और सोचने के तरीके को प्रभावित करता है। यदि छात्रों को ऐसा माहौल मिले जहां वे खुलकर विचार साझा कर सकें, प्रयोग कर सकें और असफलता से सीख सकें, तो वे ज्यादा आत्मविश्वासी और इनोवेटिव बन सकते हैं।

उन्होंने कहा कि वर्कशॉप्स, ग्रुप डिस्कशन और पीयर लर्निंग जैसे तत्व छात्रों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे माहौल में छात्र न केवल अपने कौशल को बेहतर बनाते हैं, बल्कि टीमवर्क और लीडरशिप जैसे गुण भी सीखते हैं, जो भविष्य के लिए बेहद जरूरी हैं।

कम्पीटेंस और कॉम्प्रिहेंशन का संतुलन

चर्चा के दौरान एक महत्वपूर्ण मुद्दा “कम्पीटेंस बनाम कॉम्प्रिहेंशन” भी रहा। जहां इंडस्ट्री स्किल्स (कम्पीटेंस) पर जोर देती है, वहीं यूनिवर्सिटीज गहरी समझ (कॉम्प्रिहेंशन) विकसित करने पर ध्यान देती हैं। विशेषज्ञों का मानना था कि AI के दौर में यह संतुलन बेहद जरूरी है।

उन्होंने कहा कि आने वाले समय में कई रूटीन जॉब्स ऑटोमेट हो जाएंगी, लेकिन समस्या को समझने और उसका समाधान निकालने की क्षमता इंसानों की सबसे बड़ी ताकत होगी। इसलिए शिक्षा प्रणाली को इस तरह डिजाइन किया जाना चाहिए कि वह छात्रों में क्रिटिकल थिंकिंग, समस्या समाधान और निर्णय लेने की क्षमता विकसित करे।

स्टार्टअप्स और इनोवेशन के संदर्भ में यह भी चर्चा हुई कि केवल क्रिएटिव आइडिया होना ही पर्याप्त नहीं है। किसी भी स्टार्टअप की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह अपने आइडिया को मार्केट तक कैसे पहुंचाता है और उससे वैल्यू कैसे क्रिएट करता है।

वैल्यू और वेल्थ क्रिएशन की दिशा में कदम

प्रो. परिमल मांडके ने कहा कि जब कोई स्टार्टअप सफलतापूर्वक बाजार में अपनी जगह बना लेता है, तब वह न केवल आर्थिक रूप से सफल होता है, बल्कि समाज और देश की अर्थव्यवस्था में भी योगदान देता है। वहीं प्रो. रंजना झा ने कहा कि स्टार्टअप्स को आगे बढ़ाने के लिए सीड फंडिंग, मेंटरशिप और इनक्यूबेशन सपोर्ट बेहद जरूरी है।

उन्होंने बताया कि उनकी यूनिवर्सिटी में कई स्टार्टअप्स को सीड फंडिंग दी गई है, जिससे वे अपने प्रोटोटाइप को विकसित कर सकें और बाजार में उतार सकें। यह पहल युवाओं को न केवल आत्मनिर्भर बनने में मदद करती है, बल्कि उन्हें रोजगार देने वाला भी बनाती है।

विकसित भारत 2047 की दिशा में सामूहिक प्रयास

इस पूरे सत्र का निष्कर्ष यही रहा कि यदि भारत को “विकसित भारत 2047” के लक्ष्य को हासिल करना है, तो शिक्षा प्रणाली को पूरी तरह से बदलना होगा। यूनिवर्सिटीज, इंडस्ट्री, सरकार और स्टार्टअप्स को मिलकर एक ऐसा इकोसिस्टम बनाना होगा, जहां सीखना लगातार चलता रहे और छात्रों को वास्तविक दुनिया की चुनौतियों के लिए तैयार किया जा सके।

भविष्य का रास्ता: स्किल, इनोवेशन और सहयोग 

अंत में, सभी वक्ताओं ने इस बात पर सहमति जताई कि भविष्य उन्हीं का होगा जो सीखने के लिए तैयार हैं, बदलाव को अपनाने के लिए तैयार हैं और नवाचार के जरिए समाज में मूल्य जोड़ने की क्षमता रखते हैं। भारत के पास युवा शक्ति का विशाल भंडार है, और यदि इसे सही दिशा और अवसर मिले, तो देश वैश्विक स्तर पर नेतृत्व करने में सक्षम हो सकता है।

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