पैनल चर्चा में भारत के तेजी से विकसित हो रहे बैटरी और एनर्जी स्टोरेज इकोसिस्टम पर विस्तार से चर्चा की गई। विशेषज्ञों ने बताया कि भारत का इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और एनर्जी ट्रांजिशन अब केवल चर्चाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि देश में गीगाफैक्ट्री, बैटरी मैन्युफैक्चरिंग, एनर्जी स्टोरेज और रिसाइक्लिंग के क्षेत्र में जमीनी स्तर पर तेजी से काम हो रहा है।
पैनल का संचालन ईवी उद्योग के सलाहकार विजयानंद समुद्रला ने किया, जबकि चर्चा में रिसायकलकरो (Recyclekaro) के फाउंडर और सीईओ राहुल गोगी, सिग्नी एनर्जी के फाउंडर और सीईओ वेंकट राजारमन, मिनी माइन्स के वाइस प्रेसिडेंट ऑपरेशन्स बिज़नेस डेवलपमेंट मनीष राठी, रॉबिन जैकब जोसेफ, मार्केट डेवलपमेंट – इलेक्ट्रिक व्हीकल प्लेटफ़ॉर्म, भारतीय उपमहाद्वीप, कोवेस्ट्रो ने हिस्सा लिया।
पैनल में चर्चा का मुख्य ध्यान एक मजबूत, आत्मनिर्भर और सर्कुलर बैटरी वैल्यू चेन तैयार करने पर रहा। विशेषज्ञों ने क्रिटिकल मिनरल्स, एडवांस्ड मटेरियल, सेल और बैटरी पैक मैन्युफैक्चरिंग, स्वदेशी तकनीक, टेक्नोलॉजी पार्टनरशिप, सुरक्षा और बैटरी रिसाइक्लिंग जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं पर अपने विचार साझा किए।
विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि भारत को केवल सेल मैन्युफैक्चरिंग क्षमता बढ़ाने के बजाय पूरे बैटरी इकोसिस्टम को एकीकृत रूप से विकसित करना होगा। साथ ही, चीन के साथ सीधे लागत के आधार पर प्रतिस्पर्धा करने के बजाय भारत को विश्वसनीयता, सुरक्षा, एप्लीकेशन-स्पेसिफिक इनोवेशन और घरेलू सप्लाई चेन को अपनी प्रमुख ताकत बनाना होगा।
चर्चा में यह भी सामने आया कि क्रिटिकल मिनरल्स की आयात निर्भरता कम करने के लिए घरेलू प्रोसेसिंग, रणनीतिक स्टोरेज और बैटरी रीसाइक्लिंग पर विशेष ध्यान देना जरूरी है। पैनल ने इस बात को रेखांकित किया कि भारत के लिए एक मजबूत और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बैटरी इकोसिस्टम तैयार करना इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और ऊर्जा संक्रमण के भविष्य की सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिकताओं में से एक है।
भारत में ग्लोबल स्तर पर प्रतिस्पर्धी बैटरी मैन्युफैक्चरिंग तैयार करने में सबसे बड़ी चुनौतियां क्या हैं? क्या भारत को चीन के साथ लागत के आधार पर प्रतिस्पर्धा करनी चाहिए?
वेंकट राजारामन: भारत को केवल सेल मैन्युफैक्चरिंग पर ध्यान केंद्रित नहीं करना चाहिए, बल्कि पूरे बैटरी इकोसिस्टम को विकसित करने की जरूरत है। इसमें सेल, बैटरी पैक, पावर कन्वर्टर, एनर्जी मैनेजमेंट सिस्टम, सॉफ्टवेयर, रीसाइक्लिंग और कैथोड-अनोड जैसी तकनीकें शामिल हैं।
चीन के साथ सीधे लागत के आधार पर प्रतिस्पर्धा करना फिलहाल सही रणनीति नहीं होगी, क्योंकि चीन के पास दो दशकों का नीतिगत सपोर्ट, सब्सिडी, बड़ा घरेलू बाजार और मजबूत सप्लाई चेन है। भारत को शुरुआत में विश्वसनीयता, सुरक्षा, स्थानीयकरण और भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप एप्लीकेशन-स्पेसिफिक बैटरी डिजाइन पर ध्यान देना चाहिए।
भारत में अत्यधिक तापमान, बाढ़ और अलग-अलग जलवायु परिस्थितियां बैटरी के लिए बड़ी चुनौती हैं। इसलिए भारत के लिए विशेष रूप से डिजाइन की गई बैटरियां हमारी प्रतिस्पर्धात्मक ताकत बन सकती हैं। हमें केवल “Made in India” बैटरी नहीं, बल्कि “Made with materials made in India” बैटरी इकोसिस्टम तैयार करने पर ध्यान देना चाहिए।
भारत को अगले पांच वर्षों में किन प्रमुख मटेरियल इनोवेशन पर ध्यान देना चाहिए? साथ ही, क्रिटिकल मिनरल्स की सुरक्षा के लिए क्या रणनीति होनी चाहिए?
राहुल गोगी: लिथियम, कोबाल्ट, निकेल, मैंगनीज और ग्रेफाइट जैसे महत्वपूर्ण खनिजों के लिए भारत आज भी लगभग पूरी तरह आयात पर निर्भर है। भारत के पास कुछ खनिजों के भंडार जरूर हैं, लेकिन उन्हें बैटरी-ग्रेड सामग्री में बदलने के लिए आवश्यक प्रोसेसिंग तकनीक की कमी है।
सरकार ने नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन जैसे कदमों के माध्यम से इस दिशा में प्रयास शुरू किए हैं। इसके साथ ही, भारत में बढ़ता ई-वेस्ट और इलेक्ट्रिक वाहनों से निकलने वाली पुरानी बैटरियां क्रिटिकल मिनरल्स की रिकवरी का महत्वपूर्ण स्रोत बन सकती हैं।
भारत को एक ओर ई-वेस्ट और बैटरियों की सही चैनलाइजेशन और रिसाइक्लिंग पर ध्यान देना चाहिए, वहीं दूसरी ओर क्रिटिकल मिनरल्स का रणनीतिक स्टोरेज भी तैयार करना चाहिए। जिस तरह देश में कच्चे तेल के लिए रणनीतिक स्टोरेज की अवधारणा है, उसी तरह लिथियम, कोबाल्ट, निकेल और अन्य महत्वपूर्ण खनिजों के लिए भी क्रिटिकल मिनरल बैंक बनाने की जरूरत है।
बैटरी पैक की सुरक्षा, वजन और बड़े पैमाने पर उत्पादन में एडवांस्ड पॉलिमर और इंसुलेशन मटेरियल कितने महत्वपूर्ण हैं? क्या यह भारत के लिए तेजी से लोकलाइजेशन का अवसर हो सकता है?
रॉबिन जैकब जोसेफ: बैटरी पैक में पॉलिमर और अन्य एडवांस्ड मटेरियल की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। ये मटेरियल सुरक्षा, वजन, फायर रिटार्डेंसी, इंसुलेशन और बड़े पैमाने पर मैन्युफैक्चरिंग को प्रभावित करते हैं।
भारत में अक्सर डिजाइन तैयार होने के बाद मटेरियल का चयन किया जाता है, जबकि इसे डिजाइन प्रक्रिया के शुरुआती चरण में ही शामिल किया जाना चाहिए। जब उत्पादन मैन्युअल स्तर से बढ़कर रोबोटिक और ऑटोमेटेड मैन्युफैक्चरिंग तक पहुंचता है, तो पार्ट्स में मिलीमीटर स्तर की सटीकता जरूरी होती है।
इसलिए बैटरी पैक के डिजाइन, मटेरियल चयन और मैन्युफैक्चरिंग प्रक्रिया को एक साथ विकसित करना जरूरी है। भारत के पास पहले से ही कई इंजीनियर्ड पॉलिमर और वैश्विक तकनीकी समाधान उपलब्ध हैं, इसलिए यह क्षेत्र तेजी से लोकलाइजेशन के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर बन सकता है।
भारत को स्वदेशी तकनीक विकसित करने और विदेशी तकनीक के साथ साझेदारी करने के बीच किस तरह का संतुलन बनाना चाहिए? क्या आज की तकनीक भविष्य में अप्रचलित होने का जोखिम है?
मनीष राठी: भारत को स्वदेशी तकनीक और टेक्नोलॉजी पार्टनरशिप दोनों को साथ लेकर चलना चाहिए। टेक्नोलॉजी ट्रांसफर से भारत को मैन्युफैक्चरिंग, रिसर्च एंड डेवलपमेंट और क्वालिटी पैरामीटर्स में तेजी से क्षमता विकसित करने में मदद मिल सकती है।
किसी सिद्ध तकनीक के साथ शुरुआत करने से कंपनियों को लागत, क्वालिटी और सप्लाई चेन से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं को समझने में मदद मिलती है। इसके बाद भारत अपनी जरूरतों के अनुसार उसी तकनीक में बदलाव और सुधार कर सकता है।
स्वदेशी आरएंडडी (R&D) का मतलब हर बार बिल्कुल नई केमिस्ट्री विकसित करना नहीं है। मौजूदा कैथोड, एनोड और अन्य तकनीकों में सुधार करके लागत कम करना और परफॉरमेंस बेहतर करना भी महत्वपूर्ण इनोवेशन है। भारत को पहले सिद्ध तकनीक को अपनाकर तेजी से स्केल हासिल करना चाहिए और उसके बाद धीरे-धीरे अपनी तकनीक और सप्लाई चेन विकसित करनी चाहिए।
भारत बैटरी के लिए आवश्यक कच्चे माल की सप्लाई चेन को किस तरह मजबूत कर सकता है?
पैनल: भारत को बैटरी इकोसिस्टम को केवल सेल और पैक मैन्युफैक्चरिंग तक सीमित नहीं रखना चाहिए। क्रिटिकल मिनरल्स, रिफाइनिंग, एडवांस्ड मटेरियल, सेल निर्माण, बैटरी पैक, रीसाइक्लिंग और सेकंड-लाइफ एप्लीकेशन को एकीकृत वैल्यू चेन के रूप में विकसित करना होगा।
देश को घरेलू संसाधनों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों, रणनीतिक भंडार और रीसाइक्लिंग के माध्यम से क्रिटिकल मिनरल्स की उपलब्धता सुनिश्चित करनी होगी।
क्या भारत को चीन से प्रतिस्पर्धा करने के बजाय अपने लिए अलग प्रतिस्पर्धात्मक मॉडल विकसित करना चाहिए?
पैनल: भारत को चीन की पूरी सप्लाई चेन की नकल करने के बजाय अपनी ताकत के आधार पर मॉडल तैयार करना चाहिए। विश्वसनीयता, सुरक्षा, एप्लीकेशन-स्पेसिफिक इनोवेशन, सॉफ्टवेयर, रीसाइक्लिंग और सस्टेनेबल मैन्युफैक्चरिंग भारत की प्रमुख ताकत बन सकती हैं।
भारत के लिए घरेलू बाजार एक बड़ा अवसर है, लेकिन वैश्विक बाजार को ध्यान में रखकर उत्पाद विकसित करने से कंपनियों को बड़े स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने का अवसर मिलेगा।
भारत के बैटरी इकोसिस्टम में रिसाइक्लिंग की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है?
पैनल: रिसाइक्लिंग भारत की बैटरी वैल्यू चेन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनने वाली है। 2030 तक भारत में बड़ी मात्रा में इस्तेमाल की जा चुकी लिथियम-आयन बैटरियां उपलब्ध होंगी। इनसे लिथियम, निकेल, कोबाल्ट और अन्य महत्वपूर्ण खनिजों की रिकवरी की जा सकती है।
इससे भारत की आयात निर्भरता कम होगी और घरेलू बैटरी मैन्युफैक्चरिंग के लिए महत्वपूर्ण कच्चा माल उपलब्ध कराया जा सकेगा। रीसाइक्लिंग को केवल वेस्ट मैनेजमेंट के रूप में नहीं, बल्कि क्रिटिकल मिनरल सिक्योरिटी के एक महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में देखना चाहिए।
भारत एक मजबूत और ग्लोबल स्तर पर प्रतिस्पर्धी बैटरी इकोसिस्टम कैसे तैयार कर सकता है?
पैनल: भारत को बैटरी वैल्यू चेन के हर स्तर पर एकीकृत रणनीति अपनानी होगी। इसमें क्रिटिकल मिनरल्स की सुरक्षा, एडवांस्ड मटेरियल, सेल और पैक मैन्युफैक्चरिंग, बैटरी सुरक्षा, नई केमिस्ट्री, रीसाइक्लिंग और सेकंड-लाइफ एप्लीकेशन शामिल हैं।
भारत के लिए सबसे जरूरी है कि वह केवल मैन्युफैक्चरिंग क्षमता बढ़ाने पर ध्यान न दे, बल्कि एक ऐसा मजबूत, लचीला और सर्कुलर बैटरी इकोसिस्टम तैयार करे, जो घरेलू जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ वैश्विक बाजार के लिए भी प्रतिस्पर्धी हो।
निष्कर्ष
भारत के लिए एक मजबूत और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बैटरी इकोसिस्टम तैयार करने के लिए केवल गीगाफैक्ट्री और सेल मैन्युफैक्चरिंग क्षमता बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। क्रिटिकल मिनरल्स की उपलब्धता, घरेलू प्रोसेसिंग, एडवांस्ड मटेरियल, बैटरी पैक मैन्युफैक्चरिंग, सुरक्षा, स्वदेशी तकनीक और रीसाइक्लिंग को एक एकीकृत वैल्यू चेन के रूप में विकसित करना होगा।
विशेषज्ञों ने जोर दिया कि भारत को चीन के साथ केवल लागत के आधार पर प्रतिस्पर्धा करने के बजाय विश्वसनीयता, सुरक्षा, भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप एप्लीकेशन-स्पेसिफिक इनोवेशन और मजबूत घरेलू सप्लाई चेन पर ध्यान देना चाहिए। साथ ही, टेक्नोलॉजी पार्टनरशिप के माध्यम से तेजी से क्षमता विकसित करते हुए धीरे-धीरे स्वदेशी तकनीक और मैन्युफैक्चरिंग क्षमताओं को मजबूत करना जरूरी है।
चर्चा में यह भी स्पष्ट हुआ कि बैटरी रीसाइक्लिंग भारत की भविष्य की क्रिटिकल मिनरल सिक्योरिटी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। एक मजबूत सर्कुलर इकोनॉमी के माध्यम से इस्तेमाल की जा चुकी बैटरियों से महत्वपूर्ण खनिजों की रिकवरी की जा सकती है, जिससे आयात निर्भरता कम होगी और घरेलू बैटरी मैन्युफैक्चरिंग को मजबूती मिलेगी।
कुल मिलाकर, भारत का बैटरी भविष्य केवल सेल उत्पादन क्षमता पर निर्भर नहीं करेगा, बल्कि एक ऐसे एकीकृत, सुरक्षित, आत्मनिर्भर और सर्कुलर इकोसिस्टम पर निर्भर करेगा, जो देश की बढ़ती इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और एनर्जी स्टोरेज जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ भारत को वैश्विक बैटरी वैल्यू चेन में एक महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में स्थापित कर सके।