अर्कम कैपिटल (Arkam) की इंडिया स्पेसटेक रिपोर्ट 2026 के अनुसार, भारतीय अंतरिक्ष (स्पेसटेक) सेक्टर वैश्विक बाजार की तुलना में दोगुनी गति से वृद्धि करने की राह पर है और 2030 तक इसका आकार मौजूदा 13 अरब डॉलर से बढ़कर 40 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। इस तेज़ विकास के साथ भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी स्पेसटेक अर्थव्यवस्था के रूप में उभर सकता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, यह ग्रोथ भारत की कॉस्ट-इफिशिएंट इंजीनियरिंग, मजबूत मैन्युफैक्चरिंग क्षमताओं और नई पीढ़ी के उन स्टार्टअप्स के कारण होगी, जो वैश्विक ग्राहकों के लिए एडवांस्ड स्पेस टेक्नोलॉजी विकसित कर रहे हैं।
पिछले पांच वर्षों में भारत में 300 से ज्यादा स्पेसटेक स्टार्टअप्स सामने आए हैं। इनमें से कई सैटेलाइट मैन्युफैक्चरिंग, अर्थ ऑब्ज़र्वेशन, लॉन्च व्हीकल्स और इन-स्पेस सॉल्यूशंस जैसे क्षेत्रों में प्रोटोटाइप से आगे बढ़कर बाज़ार में प्रवेश कर चुके हैं।
अर्कम(Arkam) के अनुसार, इस तेजी के पीछे ISRO का लो-कॉस्ट, हाई-इम्पैक्ट मॉडल, निजी क्षेत्र के लिए खुला सहयोग, ISRO सुविधाओं तक पहुंच और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की अहम भूमिका रही है, जिससे स्टार्टअप्स का समय और लागत दोनों कम हुए हैं।
रिपोर्ट में एक मजबूत ‘टैलेंट फ्लाईव्हील’ के उभरने की बात कही गई है। कई स्पेसटेक कंपनियां ISRO, BITS और IIT मद्रास जैसे संस्थानों के पूर्व छात्रों द्वारा स्थापित की गई हैं। इसके साथ ही हर साल 25,000 से अधिक स्किल्ड इंजीनियर एयरोस्पेस और संबद्ध क्षेत्रों में इस इकोसिस्टम को मजबूती दे रहे हैं।
रिपोर्ट में कई भारतीय स्टार्टअप्स को वैश्विक स्तर पर उभरते कैटेगरी लीडर्स के रूप में चिन्हित किया गया है। स्काईरूट एयरोस्पेस, जो अर्कम वेंचर्स की पोर्टफोलियो कंपनी है, दुनिया की शीर्ष तीन प्राइवेट लॉन्च व्हीकल कंपनियों में शामिल है। कंपनी ने 2022 में भारत का पहला निजी सबऑर्बिटल मिशन पूरा किया और अगस्त 2025 में कलाम-1200 सॉलिड बूस्टर का सफल परीक्षण किया।
डिगंतारा ने भारत का पहला स्वदेशी स्पेस सर्विलांस मिशन लॉन्च किया है और दुनिया का सबसे छोटा डिजिटल स्पेस वेदर इंस्ट्रूमेंट संचालित करता है।
एक ऐतिहासिक पहल में पिक्सल-नेतृत्व वाले कंसोर्टियम (ध्रुवा स्पेस, पियर्साइट और सैटसुर) को पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत भारत के राष्ट्रीय अर्थ ऑब्ज़र्वेशन सैटेलाइट कॉन्स्टेलेशन के डिजाइन, निर्माण और संचालन की जिम्मेदारी दी गई है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि तमिलनाडु में विकसित हो रहा कुलसेकरपट्टिनम स्पेसपोर्ट स्मॉल सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (SSLV) मिशनों को अधिक प्रभावी बनाएगा। इससे ईंधन की खपत कम होगी और पेलोड क्षमता बढ़ेगी।
भारत लॉन्च व्हीकल्स की लगभग 90% जरूरतें, सैटेलाइट कंपोनेंट्स की 45% मांग, और 100% प्रोपेलेंट्स व अलॉयज़ घरेलू स्तर पर ही तैयार कर रहा है। इस इकोसिस्टम को 11,000 से अधिक वेंडर्स सपोर्ट कर रहे हैं, जो ISRO और निजी कंपनियों दोनों को सेवाएं देते हैं।
अर्कम वेंचर्स के मैनेजिंग डायरेक्टर राहुल चंद्रा के अनुसार,“ISRO की भूमिका और सरकार के समर्थन के चलते भारत वैश्विक स्पेसटेक सेक्टर का नेतृत्व करने की अनूठी स्थिति में है। अगले पांच वर्षों में इस सेक्टर में 3 से 3.5 अरब डॉलर का वेंचर कैपिटल और प्राइवेट इक्विटी निवेश देखने को मिलेगा।”
रिपोर्ट का अनुमान है कि 2030 तक भारतीय निजी कंपनियां:
हर साल 40–45 लॉन्च वैश्विक ग्राहकों के लिए करेंगी
दुनिया के एक-तिहाई अर्थ ऑब्ज़र्वेशन सैटेलाइट्स का निर्माण करेंगी
एवियोनिक्स, GNSS, SATCOM और ग्राउंड RF सिस्टम्स के प्रमुख निर्यातक के रूप में उभरेंगी